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Opinion

बेटे आकाश विजयवर्गीय पर कार्रवाई, पर मीडिया की औकात पूछने वाले पिता का क्या करेंगे मोदी

Surjit Singhप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो जुलाई को कहा कि जिसका भी बेटा हो, कार्रवाई होनी चाहिए. मनमानी नहीं चलेगी. पार्टी में ऐसे लोगों के लिये जगह नहीं होनी चाहिये. प्रधानमंत्री का यह बयान आकाश विजयवर्गीय को लेकर है.आकाश विजयवर्गीय,…

व्लादिमीर पुतिन क्या सही बोल रहे हैं? उदारवाद का अंत हो गया है?

Holier Changरूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का एक साक्षात्कार सुर्ख़ियों में है. इसमें उन्होंने कहा है कि उदारवाद बेकार हो गया है.फ़ाइनेंशियल टाइम्स को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि शरणार्थियों, प्रवासियों और एलजीबीटी जैसे…

अब आदिवासी समाज को अपने पक्ष में करने के लिए संघर्ष कर रही है भाजपा

Faisal Anuragझारखंड में आदिवासियों को अपने पाले में लाने का राजनीतिक संघर्ष तेज होता जा रहा है. राज्य की इस सबसे बड़ी आबादी के सहारे राजनीतिक कामयाबियों को हासिल करने के लिए भारतीय जनता पार्टी का आक्रामक रुझान उसकी गतिविधियों से स्पष्ट…

हूल दिवस पर विशेषः सिद्धो, कान्हू, चांद, भैरव और बजाल के सपनों के देश की रक्षा कौन करेगा

Pravin Kumarहूल दिवस के अवसर पर इतिहास की विवेचन करते हुए हम उन वर्तमान चुनौतियों से रू-ब-रू हो सकते हैं, जिसका सामना झारखंड और आदिवासी समाज कर रहा है. आदिवासी अस्मिता के संदर्भ में हुलगुलानों की स्मृति उन संदेशों को बारबार ध्वनित करती है…

पूर्व IPS संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट्ट के नाम एहसान जाफरी की बेटी का पत्र

2002 के गुजरात दंगे में मारे गये पूर्व सांसद एहसान जाफरी की बेटी निशरीन जाफरी हुसैन ने पूर्व आइपीएस संजीव भट्ट की पत्नी श्वेता भट्ट को एक पत्र लिखा है. ये पत्र उनके फेसबुक वॉल पर पोस्ट किया गया है. इसमें उन्होंने मौजूदा भारत और उसके लोगों…

दुविधाग्रस्त विपक्षी दलों के समक्ष अस्तित्व का गहराता संकट

Faisal Anuragझारखंड की राजनीति की त्रासदी यह बनती जा रही है कि अनेक दल एक ऐसे मनोविज्ञान के शिकार होते दिखे, जिसमें हताशा से निकलने की राह ही नहीं दिख रही है. लोकसभा चुनाव के पहले तक झारखंड में सत्तारूढ खेमा जनांदोलनों और विपक्षी दलों के…

आखिर मोदी को रह-रह कर आपातकाल क्यों याद आता है?

Anil Jain44 साल यानी करीब साढ़े चार दशक पुराने आपातकाल के काले कालखंड को हर साल 25-26 जून को याद किया जाता है. लेकिन पिछले पांच वर्षों से उस दौर को कुछ ज्यादा ही याद किया जा रहा है. सिर्फ़ सालगिरह पर ही नहीं बल्कि हर मौक़े-बेमौक़े याद…

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में हम इमरजेंसी से क्या सबक ले सकते हैं

Faisal Anuragनागरिकों के लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार भारत की राजनीति का एक ऐसा पहलू हैं, जो समय के साथ अपनी ताकत का बारबार अहसास करते हैं. इंदिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी की घोषणा कर नागरिकों के जीने के अधिकार तक को जिस तरह खत्म…

‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ वाली सरकार की असलियत सामने आयी

Girish Malviya'न खाऊंगा न खाने दूंगा' कहने वाली सरकार की असलियत कल सामने आ गयी है, कल एक सवाल के जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को देश में बढ़ रहे विलफुल डिफाल्टर की जानकारी सामने रखना पड़ी...जिसमें पता चला कि मोदी सरकार 1 के…