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पाकिस्तान के खिलाफ वार लड़नेवाले कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद छोड़ी थी कांग्रेस

सिद्धू से पंगा लेना पड़ा महंगा, कैप्टन अमरिंदर सिंह की जीवन यात्रा

Naveen Sharma

Ranchi : पंजाब के मुख्यमंत्री पद से शनिवार को इस्तीफा देनेवाले कैप्टन अमरिंदर सिंह की अब तक की जीवनयात्रा काफी रोमांचक और दिलचस्प रही है. कैप्टेन ने अपने अब तक के जीवन में कई रंग देखे हैं. भारतीय सेना की तरफ से पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में भी शामिल रहे हैं. उसके बाद सेना छोड़ कर राजनीति में हाथ आजमाया. राजनीति में भी अमरिंदर ने जबरदस्त सफलता हासिल की है और पंजाब के मुख्यमंत्री की गद्दी तक का सफर तय किया था.

कुछ दिन पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाये जाने के बाद से ही पंजाब कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गयी थी.

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कैप्टेन और सिद्धू खुलकर एक दूसरे के खिलाफ आ गये थे. अमरिंदर ने सिद्धू को अध्यक्ष बनाये जाने के खिलाफ पार्टी में गोलबंदी शुरू कर दी थी.

वहीं सिद्धू ने भी अपने समर्थन में पार्टी के कई विधायकों और नेताओं को कर लिया था. वहीं दूसरी तरफ पार्टी आलाकमान का साथ मिलने की वजह से सिद्धू की स्थिति मजबूत होती चली गयी और नौबत यहां तक आ गयी कि आखिरकार कैप्टेन अमरिंदर सिंह को पंजाब के सीएम की गद्दी छोड़नी पड़ी.

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पटियाला के राज घराने से है ताल्लुक

अमरिंदर ब्रिटिश भारत के समय में देश की सबसे बड़ी रियासतों में से एक पटियाला के राज घराने से ताल्लुक रखते हैं. कैप्टन अमरिंदर सिंह का जन्म 11 मार्च 1942 को तत्कालीन पटियाला रियासत के शाही परिवार में हुआ था.

ये महाराजा यादविंदरसिंह के पुत्र हैं. उनकी शुरुआती शिक्षा कसौली के वैलहैम बॉयज़ स्कूल, स्नावर स्कूल और दून स्कूल में हुई. उनके परिवार में पत्नी परनीत कौर, पुत्र रनिंदर सिंह और पुत्री जय इंदर कौर हैं.

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पत्नी परनीत कौर रहीं हैं विदेश राज्य मंत्री

परनीत कौर वर्ष 2009 से 2014 तक केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री रहीं. श्रीमती कौर और सिमरनजीत सिंह मान की पत्नी सगी बहनें हैं. कैप्टन अमरिंदर की बहन हेमिंदर कौर का विवाह पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह के साथ हुआ था.

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पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में सिख रेजिमेंट में थे कैप्टेन

अमरिंदर सिंह राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और भारतीय सैन्य अकादमी में जाने के बाद वे वर्ष 1963 में सेना में भर्ती हुए थे, लेकिन वर्ष 1965 में इस्तीफा दे दिया. वर्ष 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ने पर वह पुन: सेना में भर्ती हो गए तथा कैप्टन के रूप में सिख रेजीमेंट में युद्ध में भाग लिया था.

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कांग्रेस में शामिल हुए, 1980 में लोकसभा के लिए चुने गए

इसके बाद में वह कांग्रेस में शामिल हो गए तथा वर्ष 1980 में लोकसभा के लिए चुने गए, लेकिन अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर सैन्य कार्रवाई “ऑपरेशन ब्लू स्टार” होने पर उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. बाद में वे शिरोमणि अकाली दल (शिअद) में शामिल हो गए तथा तलवंडी साबो हलके से चुनाव जीत कर विधायक बने तथा कृषि एवं पंचायत मंत्री रहे.

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1998 के विधानसभा चुनाव में पटियाला से चुनाव हारे

वर्ष 1992 में उन्होंने शिअद भी छोड़ दिया और अलग से शिरोमणि अकाली दल (पंथिक) का गठन किया, लेकिन वर्ष 1998 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की करारी शिकस्त तथा स्वयं भी पटियाला से चुनाव हारने पर उन्होंने पार्टी का 1998 में कांग्रेस में विलय कर दिया.

वह वर्ष 1999 से 2002 तथा 2010 से 2013 तक पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष तथा वर्ष 2002 से 2007 तक राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे.

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अमृतसर लोकसभा सीट से अरुण जेटली को हराया

वर्ष 2014 के आम चुनावों में कैप्टन सिंह ने अमृतसर लोकसभा सीट से अरुण जेटली को एक लाख से अधिक मतों से पराजित किया था. उन्होंने पटियाला से तीन बार, समाना और तलवंडी साबो से एक-एक बार विधानसभा में प्रतिनिधित्व किया.

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अंग्रेजी में दो किताबें भी लिखी हैं कैप्टेन ने

वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र उन्हें पुन: प्रदेश पार्टी की कमान सौंपी गई तथा उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने गत 11 मार्च को आए विधानसभा चुनाव नतीजों में 77 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की तथा 16 मार्च को उन्हें राज्य के 26वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई.

कैप्टन सिंह एक अच्छे लेखक भी हैं जिन्होंने अंग्रेजी में दो किताबें लिखी हैं. उनकी लिखी किताबों के नाम क्रमश: ‘ द लास्ट सनसेट’ और ‘द राइज एंड फॉल ऑफ द लाहौर दरबार’ हैं.

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