Opinion

क्या बिहार में तीसरा मोर्चा कर सकता है बड़ा उलटफेर!

Faisal Anurag

क्या बिहार में एनडीए और महागठबंधन दोनों के अंदर सबकुछ सहज नहीं है और  विधानसभा चुनाव महागठबंधन के पहले किसी बड़े उलटफेर की संभावना बन रही है? दोनों गठबंधनों के हिस्सेदारों की बेचैनी को देखा जाये तो एक ही जबाव मिलेगा कि छोटे दलों के बीच अपनी साख और सम्मान को लेकर कड़वाहट जैसे हालात हैं.

इसके साथ ही एक तीसरा मोर्चा बनने की भी संभावना है. जिसमें जदयू और राजद से नारज दल शामिल हो सकते हैं. इसके संकेत तो मिलने लगे हैं. यशवंत सिन्हा की बिहार में सक्रियता के कई मायने निकाले जा रहे हैं और प्रशांत किशोर तो पहले से ही युवाओं को संगठित करने का प्रयास कर रही है. लॉकडाउन के बाद बिहार में राजनीतिकगर्मी बढ़ने लगी है और भाजपा के ऑनलाइन प्रहार का राजद भी कुशलता से जबाव दे रहा है.

नीतीश कुमार की अगुवाई में एनडीए के भीतर असहजता को ​लोक जनशक्ति पार्टी के चिराग पासवान ने बढ़ा दिया है. उन्होंने अपने पार्टी नेताओं को किसी भी हालात का सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा है. रामविलास पासवान ने भी कहा है चिराग पासवान का जो निर्णय होगा, उसमें हमारा कोई वश नहीं है.

पार्लियामेंट्री बोर्ड जो फैसला करेगी वो मान्य होगा. चिराग पार्टी को अच्छे ढंग से चला रहे हैं.  हालांकि रामविलास पासवान ने यह भी कहा है कि पार्टी नवबंर तक एनडीए में बनी रहेगी. यह बेहद दिलचस्प और अपने भीतर कई निहितार्थ छुपाए हुए है. चिराग पासवान के बारे में कहा जाता है कि उनकी महत्वकांक्षाएं बडी हैं और पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद से वे बिहार की राजनीति में प्रभावी भूमिका की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि राजनीतिक प्रेक्ष्क मानते हैं कि चिराग पासवान एनडीए के अंदर ही ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी के लिए माहौल बना रहे हैं.

कुछ ही दिनों में बिहार में विधानपरिषद के 12 सीटों पर मनोनयन होना है. इसमें सत्तापक्ष अपने लोगों को जगह देता है. हालांकि मनोनयन का प्रावधान समाज के उस तबके के प्रतिनिधित्व के लिए रखा गया है, जो विभिन्न क्षेत्रों में अपने योगदान और विचारों के लिए जाने जाते हैं. लेकिन राज्यसभा और विधानपरिषद का मनोनयन पार्टी हितों और अपने नेताओं और नजदीकियों को जगह देने का जरिया बन गया है.

इस बार नीतीश कुमार इसमें बडी हिस्सेदारी चाहते हैं. खबरों के अनुसार, वे 12 में 7 सीट अपने लिए चाहते हैं और पांच भाजपा के लिए. इससे चिराग की नाराजगी बढ़ी है. चिराग का सुझाव है कि लोकसभा चुनाव में बंटे सीटों के अनुसार ही सभी घटक दलों को प्रतिनिधित्व दिया जाए. उन्होंने   पांच-पांच सीटें जदयू और भाजपा को और दो लोजपा को दिए जाने का सुझाव दिया है. विधानसभा चुनाव के पहले यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जदयू-भाजपा इस संदर्भ में क्या तय करते हैं. लेकिन मात्र यही चिराग को कितना संतुष्ट कर पाएगा यह तो वक्त ही बताएगा.

तेजस्वी यादव ने यह कहकर कि गठबंधन का स्वरूप जुलाई अंत तक स्पष्ट होगा, अटकलों को बढ़ा दिया है. सभी जानते हैं कि जीतन राम मांझी किस ओर जाएं इसे लेकर दुविधा में हैं. उनके नीतीश कुमार के साथ जाने की संभावना भी बनी हुई है.

मांझी ने कहा है कि महागठबंधन को लेकर वे अगले दो चार दिनों में कुछ फैसला लेंगे. उपेंद्र कुशवाहा हालांकि खामोश हैं, लेकिन उनकी खामोशी ही असजहता पैदा कर रही है. मुकेश सहनी इस समय खुलकर बात कर रहे हैं. लेकिन गठबंधन की मजबूती के लिए प्रयास करने की बात कर रहे हैं. तेजस्वी ने लालू प्रसाद के 15 साल के शासन के दौरान हुए गलतियों के लिए जनता से माफी मांगी थी. इससे राजद को लग रहा है कि वह उस आधार को फिर से पा सकेगा जो नीतीश कुमार के पास चला गया है.

बिहार की राजनीतिक में जाति का एक बड़ा पहलू है और उसे साधन के नजरिए से गठबंधन को नया रूप देने का कोई नजारा भी देखने को मिल सकता है. वामपंथ का बिहार में अपना महत्व है, उसके पास वोट आधार भी है. राजद में यह चर्चा आम है कि इस बार वाम दलों का राजद से तालमेल हो सकता है.

यदि ऐसा होता है तो गठबंधन के भीतर सीट वितरण के लिए कठिनाई पैदा हो सकती है. तेजस्वी ने साफ कह दिया है कि पिछले विधानसभा चुनाव से इस बार राजद ज्यादा सीटों पर लड़ेगा. पिछली बार वह 100 सीटों पर चुनाव लड़ा था. कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी गोहिल का यह बयान भी आया है कि तेजस्वी यादव राजद के मुख्यमंत्री पद का चेहरा हैं, गठबंधन का नेता कौन होगा यह चुनाव परिणाम के बाद तय किया जाएगा.

इन दोनों गठबंधनों से अलग कई और समूह भी सक्रिय हैं. इनमें यशवंत सिन्हा और प्रशांत किशोर भी हैं. ये बड़ी भूमिका तो निभाते नहीं दिख रहे हैं, लेकिन गठबंधनों के लिए परेशानी बन सकते हैं. यशवंत सिन्हा की नरेंद्र मोदी से नारजगी तो सर्वविदित है. लेकिन मात्र इसी पूंजी के सहारे वे बिहार जैसे प्रदेश की राजनीति में कोई बड़ी भूमिका नहीं निभा सकते हैं.

बिहार की राजनीति दो धरातलों पर बंटी हुई है. इससे बाहर का राजनीतिक समूह किसी एक घटक को नुकसान तो पहुंचा सकता है, लेकिन वह प्रभावी ताकत बनकर शायद ही बिहार की राजनीति में उभरे.

ऐसी स्थिति में दोनों ही गठबंधनों की निगाह असंतुष्ट नेताओं पर है. नीतीश कुमार ने राजद में दरार डालकर उनके विधानपार्षदों को अपने पक्ष में जरूर किया है, लेकिन उन नेताओं का इतना

सामाजिक प्रभाव नहीं हैं कि वे कोई बड़ी दरार पैदा कर सकें. रघुवंश प्रसाद सिंह को लेकर कई तरह के आंकलन बिहार में किये जा रहे हैं. लेकिन वे क्या निर्णय लेते हैं यह भविष्य की गर्त में है. हालांकि वे भी मनोवैज्ञानिक प्रभाव ही पैदा कर सकेंगे न कि कोई बड़ा सामाजिक प्रभाव.

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