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क्या सुरक्षा सलाहकार राजनीतिक बयान दे सकता है ?

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Faisal Anurag

क्या सुरक्षा सलाहकार राजनीतिक बयान दे सकता है. यह बेहद गंभीर मामला है. क्या संस्थाओं की राजनीतिक प्रतिबद्धता का यह दौर लोकतंत्र के लिए खतरनाक नहीं है. अजित डोभाल ने जिस तरह गठबंधन राजनीतिक प्रहार कर प्रकरांतर से भारतीय जनता पार्टी के लिए वकालत की है, इसका निहितार्थ किसी से छुपा हुआ नहीं है.

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भारत की राजनीति 1989 के बाद से ही गठबंधन के दौर में है. इस तरह एक भी सरकार केवल अपनी बहुमत के आधार पर नहीं बनी है. 2014 में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत जरूर मिला, लेकिन वर्तमान सरकार भी गठबंधन की ही है. मोदी सरकार एनडीए की सरकार है न कि केवल भाजपा की और एनडीए में लगभग दो दर्जन घटक हैं. भारत की राजनीति में एकदलीय सरकार का अंतिम मौका राजीव गांधी की सरकार थी. नरेंद्र मोदी की सरकार एनडीए में प्रभावी और वर्चस्व अपने बहुमत के कारण रखती है, लेकिन वह केवल एकदल की सरकार नहीं है. 2019 में भी केवल एक के बहुमत के आसार नहीं दिख रहे हैं. राजनीतिक तौर पर भाजपा अपने गठबंधन को और मजबूत करने की कोशिश कर रही है. यह दिगर बात है कि 2014 के कई सहयोगी उसका साथ छोड़ चुके हैं और कुछ और के अलग होने की भी संभावना बनी हुई है. कांग्रेस भी भाजपा के खिलाफ मजबूत गठबंधन बनाने का प्रयास कर रही है. गैरएनडीए दलों में यह धारणा मजबूत हुई है कि उन्हें एकजुट गठबंधन बना कर ही लड़ना चाहिए ताकि वे एनडीए को परासत कर सके.

ठीक चुनाव के पहले डोभाल ने एक कार्यक्रम में कहा कि भारत को कमजोर गठबंधन सरकार नहीं चाहिए. उनका आशय साफ है कि वे भाजपा के लिए राजनीतिक पैरवी कर रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि डोभाल एक नौकरशाह से ज्यादा राजनीतिक फैसलों में भूमिका निभाते रहे हैं. मोदी सरकार ने भी डोभाल की शक्तियों को बढ़ा दिया है और उन्हें आज सभी नौकरशाह रिपोर्ट कर रहे हैं. सुरक्षा सलाहकार अब तक गैर राजनीतिक भूमिका ही निभाता रहा है, लेकिन डोभाल ने इस सीमा को तोड़ दिया है.

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भारतीय जनता पार्टी को 2019 के चुनावों में हर ताकत का इस्तेमाल करने का संकेत दे चुकी है. भाजपा सरकार के खिलाफ आर्थिक फ्रंट पावर विफलता के जिस तरह के आरोप लग रहे हैं, उससे भाजपा के भीतर राजनीतिक बेचैनी दिख रही है. 2014 के वायदों के मोर्चे पर भाजपा की भूमिका से युवा,किसान,मजदूर,मध्यवर्ग और मेहनतकश, छोटे और मझोले व्यापारियों में निराशा है. उनके विभिन्न आंदोलनों से यह दिख रही है. किसानों ने पिछले कुछ समय में जिस तरह दिल्ली में बड़े-बड़े प्रदर्शन किए हैं,उससे जाहिर होता है कि किसानों में न्यूनतम मूल्य और स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू नहीं किए जाने के कारण रोष है. भाजपा कोशिश भी कर रही है कि वह इन तबकों का गुस्सा जल्द खत्म करे. दूसरी ओर आरएसएस और भाजपा ने राम मंदिर के सवाल को उठाकर एक बार फिर भारतीय राजनीति के विमर्श को 90 के दशक में ले जाने की कोशिश की है. दलित और पिछडों में भी आरक्षण को लेकर अनेक संदेहतर के संदेह है. आरक्षण को लेकर भाजपा और आरएसएस से जुड़े संगठनों के लोगों के कुछ बयानों ने इस संदेह को पुख्ता बनाया है. आरक्षण खत्म करने की वकालत जिस तरह खुलकर की जाने लगी है, उससे आदिवासी,दलित और पिछड़ों में नाराजगी है. इन तबकों के प्रबुद्धजन कह रहे हैं कि आरक्षण के सवाल को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. यह कोई भीख नहीं बल्कि देश के निर्माण की प्रक्रिया का ही हिस्सा है.

इसी साल अप्रेजल में दलितों के स्वत:स्फूर्त बंद के बाद से राजनीतिक हलकों में खासकर सत्ताधारी तबकों में यह धारणा बनी है कि जमीन पर जिस तरह का आक्रोश है, उसे रोकना जरूरी है. केंद्र सरकार ने इसी दबाव में कानून भी बनाकर एसटी-एससी संरक्षण के सवाल में दखल दिया. इससे कुछ राज्यों में भाजपा के कोर वोट आधार में बढ़ी नारजगी ने भी भाजपा को अपने गठबंधन आधार को मजबूत बनाने की पहल के लिए दबाव बनाया है.

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भारतीय समाज आज जिस दिशा में सोच रहा है, उसमें एक दल की सरकार की संभावना कम ही है. 2014 में भाजपा ने जिन आधारों के सहारे बहुमत हासिल किया उसे बनाए रखने की उसके समक्ष गंभीर चुनौती है, ऐसी स्थिति में साफ दिख रहा है कि 2019 के चुनाव एकतरफा नहीं होने जा रहे हैं और सत्तारूढ गठबंधन को बढ़त हासिल करने के लिए अपने 2014 के वोट आधारों की नाराजगी दूर करने की गंभीर चुनौती से जूझना होगा.

दुनिया में जिन देशों में संसदीय लोकतंत्र हैं, वहां भी अधिकांश देशों में इस समय गठबंधन सरकारों का ही दौर है. सामाजिक तौर पर जब समाज के विभिन्न तबकों में उभार होता है, तब इसी तरह के गठबंधन की राजनीति उभरती है. दुनिया के जिन देशों में भी गठबंधन की सरकारें हैं, वे भी अपने राष्ट्रीय हित को मजबूत रख रही है.

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