Opinion

क्या लोकतंत्र में किसी को ऐसे चुप कराया जा सकता है?

Faisal  Anurag

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरूण मिश्रा ने राजस्थान विधानसभा स्पीकर की याचिका पर सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल से पूछा कि क्या जनता के द्वारा चुना हुआ व्यक्ति अपनी असहमति भी जाहिर नहीं कर सकता. उन्होंने यह भी कहा कि असहमति को दबाया नहीं जा सकता. लोकतंत्र में क्या किसी को इस तरह चुप कराया जा सकता है? राजस्थान विवाद में स्पीकर के आदेश पर अमल करने से हाईकोर्ट की रोक के सवाल पर सुनवाई के दौरान जस्टिस मिश्र ने यह गंभीर सवाल उठाया है. मामला सामूहिक दलबदल का है. भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची इस तरह के दलबदल की इजाजत नहीं देती है.

1985 में दलबदल कानून के बनने के समय भी चुने हुए प्रतिनिधियों के स्वतंत्र फैसला लेने के अधिकार की चर्चा हुई थी. अब एक नयी बहस इससे उठ खडी हुई है. अनेक कानूनविद मानते हैं कि संविधान के प्रावधानों को पूरी तरह लागू किया जाये. दूसरी तरफ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि लोकतंत्र में असहति का अधिकार बुनियादी है और उसकी हिफाजत हर कीमत पर की जानी चाहिए. लेकिन भारतीय राजनीति में जिस तरह एक महामारी के वायरस की तरह दलबदल की लाइलाज बीमारी का दौर जारी है, उसमें राजनीतिक शुचिता और चुनावी जनादेश की भी अहमियत है.

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लोकतंत्र में लोगों की राय से बहुमत प्राप्त दलों के प्रतिनिधियों के साथ उस जनादेश का तत्व अंतरनिहित है जो लोकतंत्र में स्थायीत्व और मजबूती के लिए अनिवार्य है. इसे भी खारिज नहीं किया जा सकता है.

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जस्टिस अरूण मिश्र, जिनका कार्यकाल मात्र दो माह से भी कमी बचा हुआ है, असहमित के अधिकार संबंधी टिप्प्णी महत्वपूर्ण है. यह केवल चुने गये लोगों के लिए ही नहीं है बल्कि उनके लिए भी है जो सरकार की नीतियों से असहति प्रकट करते हैं और उन आंदोलनों से भी है जो किसी भी सरकार के किसी नीति या फैसले के विरोध में उठ खड़े होते हैं. किसी भी लोकतंत्र के लिए लोगों के इस तरह असहमत होने के अधिकारों की गारंटी भी संविधान देता है और वह किसी चुने हुए व्यक्ति के असहमित के अधिकार से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण भी है.

दुनिया में लोकतंत्र का विकास आंदोलनों के गर्भ से ही हुआ है. यहां तक कि आधुनिक लोकतंत्र स्वयं में औद्योगिक क्रांति की उपज है. फ्रांस की राज्य क्रांति ने उसका मार्ग प्रशस्त किया था. फ्रांस की राज्यक्रांति ही स्वतंत्रता,समानता और बंधुत्व जैसे आधुनिक मूल्यों की आवाज को दुनियाभर में स्थापित किया था. भारत में भी आधुनिक लोकतंत्र स्वतंत्रता आंदोलन के गर्भ से निकला हुआ एक कीमती उपहार है.

इन तमाम बातों के बावजूद दलबदल ने जिस तरह के मवाद से भारतीय राजनीति को तकलीफदेह बना दिया है उसके कारण चुनी गयी सरकारों के स्थायित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है. खास कर विपक्ष के दलों की सरकारों को. दलबदल के दो नये रूप विकसित हुए हैं. एक है इस्तीफा का और दूसरा है सामूहिक तौर पर इस्तीफा कराने का. कर्नाटक और मध्यप्रदेश में इन दोनों प्रयोगों से जिस तरह सरकारों को गिराया गया उसका कितना सरोकार चुने गए प्रतिनिध्यिों के असहमित के कारण था और कितना प्रलोभनों के कारण.

यह बता पाना भी संभव नहीं है. इसके पहले गोवा सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में जिस तरह विधायकों की खरीदफरोख्त का खेल हुआ, यदि वह लोकतंत्र के लिए धब्बा नहीं है तो और क्या है. 2015 में बिहार के जनादेश के हाइजेक किये जाने का तमाशा हुआ उसे भी याद किये जाने की जरूरत है.

इसके साथ यह संदर्भ भी उठ खड़ा हुआ है कि राजनीतिक असहमित को हल करने की लोकतांत्रिक प्रक्रिया क्या हो सकती है. देश ने देखा है कि किस तरह आंदोलनों के माध्यम से सरकार की नीतियों का विरोध करने वालों के खिलाफ देशद्रोह के मामले दर्ज किये गये हैं और उसकी सुनवाई भी नहीं हो पा रही है. वरवर राव जैसे देश के बड़े कवि के साथ जिस तरह का व्यवहार हुआ है उसकी चर्चा हो चुकी है.

लोकतंत्र में हिंसा की वकालत करना गलत है, लेकिन गैरहिंसक तरीके से अपनी बात कहने का अधिकार संविधान हरेक को देता है. यह अधिकार चुने गये प्रतिनिशियों का भी है. लेकिन उनके साथ जनादेश का बंधन भी है जो एक एजेंडा और रोउमैप लेकर चुनाव लडते हैं और जीत के कुछ समय बाद ही बिना किसी सवाल को उठाए हुए बदलबदल कर लेते हैं, क्योंकि उनके नेता ने दलबदल का मन बना लिया होता है. यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए प्रियकर नहीं हो सकती और उसके विकास की गति को आगे नहीं ले जा सकती है.

इन संदर्भों को ध्यान में रखकर ही तय किया जाना चाहिए कि जनादेश और असहति के अधिकार के बीच समन्वय किस तरह का होगा और दलबदल करने के साथ ही किसी रिसॉर्ट में बंधक बनने को क्या कहा जा सकेगा.

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