Opinion

असहमति को राष्ट्रविरोधी कहना लोकतंत्र पर हमला है

Faisal Anurag

दुनिया भर में लोकतंत्र के हालात पर चिंता प्रकट की जा रही है. भारत सहित दुनिया के कई देशों में प्रतिरोध से निपटने के जो तरीके सरकारें अपना रही हैं, उसके खिलाफ आवाज भी बुलंद होने लगी है. फ्रांस में जहां श्रमिकों के आंदोलनों को कुचलने के लिए वहां के राष्ट्पति इमैनुएल मैक्रोन की सरकार जिस तरह का कदम उठा रही है, उसकी भारी आलोचना लोकतंत्रवासी कर रहे हैं.

हांगकांग में प्रदर्शनों के दमन के प्रयासों की चर्चा तो हो ही चुकी है. पाकिस्तान में भी इमरान खान सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाकर उन आवाजों को रोकने की कोशिश कर रहे हैं, जहां उनकी आर्थिक और अन्य नीतियों से परेशान हो रही है.

इसे भी पढ़ेंःसरकार की नीतियों से श्रमिक वर्ग को करेंगे जागरूक, CAA से श्रमिकों को सबसे ज्यादा नुकसान: पीके गांगुली

शाहीनबाग में सुप्रीम कोर्ट के वार्ताकार संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन भी प्रतिरोध के अधिकार की गारंटी की बात कर रहे हैं. इसके अलावे अन्य कई देशों में भी इस तरह की आवाज उठ रही है.

भारत में इस बहस को सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश चंद्रचूड़ ने एक नया आयाम दिया है. भारत में लोकतंत्र की  हालत को लेकर चिंता केवल सडकों पर हीं नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट के जज भी व्यक्त करने लगे हैं. जस्टिस चंद्रचूड़ ने गुजरात में एक व्याखयान देते हुए कहा कि असहमति लोकतंत्र की आत्मा है.

असहमति को राष्ट्रविरोधी कहना लोकतंत्र पर हमला है. जस्टिस चंद्रचूड़ का इस बात को कहना न केवल सांकेतिक है, बल्कि केंद्र की मोदी सरकार पर एक गंभीर टिप्पणी भी है. तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने साझा प्रेस कॉन्फ्रेस कर लोकतंत्र की प्रक्रिया पर ही चिंता जतायी थी और संविधान और लोकतंत्र की हिफाजत करने के लिए भारत के लोगों का आह्वान किया था.

जिन चार जजों ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को किया था, वे सभी रिटायर हो गए हैं. उनमें एक गगोई तो मुख्य न्यायधीश भी बने. शेष तीन जजों ने रिटायर होने के बाद भी लोकतंत्र और संविधान को लेकर कई  बार चिंता प्रकट की है.

जस्टिस च्रंद्रचूड़ ने अपने अनेक फैसलों से सरकारों को परेशान किया है. उनके फैसलों को भारतीय संविधान और लोकतंत्र को मजबूत बनाने के नजरिये से देखा जाता है. देश के वर्तमान माहौल में इस तरह की साफगोई से बात करना बताता है कि उच्च स्तरी पर भी असंतोष है.

इसे भी पढ़ेंःवादा जो किया है तो निभाइये इरफान जीः बीजेपी

देश में सरकार के खिलाफ बोलने वालों को देशद्रोही कहने का प्रचलन आम हो गया है. देश में अनेक लोग राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों का हवाला देकर गिरफ्तार किये गये है. डॉ. कफील खान का मामला ताजा है.

अखिल गगोई से जो प्रवृति प्रारंभ हुई  थी वह नॉर्मल हो रही है. उत्तर प्रदेश में तो संविधान, राष्ट्रीय झंडा और गांधी के नाम पर गाजीपुर से दिल्ली तक की जा रही पैदल यात्रा करने वाले 15 से भी कम उम्र के युवकों को जिस तरह गिरफ्तार किया गया, वह किसी भी सरकार के इरादे को स्पष्ट करता है.

उन सभी युवाओं को जमानत मिल चुकी है. लेकिन देश भर में दहशत फैलाने का अभियान जारी है. जामिया के मामले में जो ताजा सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक हुए हैं, वह दिल्ली पुलिस के तमाम दावों को झूठ बता रहे हैं. अमित शाह तक अब दिल्ली पुलिस को संयम से काम लेने की नसीहत दे रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए अनेक जजों और चीफ जजों ने देश के हालात पर चिंता जाहिर की है. खास कर लोकतंत्र को लेकर. जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने व्याख्यान में कहा कि राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल कर असहमतियों पर अंकुश लगाना डर की भावना पैदा करता है, जो कानून के शासन का उल्लंधन है.

अब तक कई बुद्धिजीवी, कलाकार और आम लोग इस तरह की बात करते रहे हैं, जिसे जस्टिस चंद्रचूड़ न केवल पुष्ट कर रहे हैं. बल्कि इस व्याख्यान के माध्यम से केंद्र सरकार को आत्मपरीक्षण करने का इशारा भी करते हैं.

बीबीसी के अनुसार, जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि असहमति का संरक्षण करना यह याद दिलाता है कि लोकतांत्रिक रूप से एक निर्वाचित सरकार हमें विकास एवं सामाजिक समन्वय के लिए एक न्यायोचित औजार प्रदान करती है, वे उन मूल्यों एवं पहचानों पर कभी एकाधिकार का दावा नहीं कर सकती, जो हमारी बहुलवादी समाज को परिभाषित करती हैं.

जस्टिस चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी ऐसे वक्त पर आयी है जब नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और एनआरसी के कारण देश के कई हिस्सों में व्यापक स्तर पर प्रदर्शन हो रहे हैं.

उन्होंने कहा कि सवाल करने की गुंजाइश को खत्म करना और असहमति को दबाना, सभी तरह की प्रगति-राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक बुनियाद को नष्ट करता है. इस मायने में असहमति लोकतंत्र का एक सेफ्टी वॉल्व है.

हाल के सालों में चार जजों  की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद पहली बार इतनी तल्खी से बात किसी सींटिंग जज ने की है.

लोकतंत्र को मजबूती देना और संविधान का अक्षरशः पालन करना भारत के नागरिकों का दायित्व है. लेकिन जिन राजनीतिक दलों को जिम्मेवारी लोकतंत्र को बेहतर और नैतिक बनाने की है, उनकी भूमिका भी कई सवालों से घिरी हुई है.

खास कर दलबदल कानून की जिस तरह सार्वजनिक अवज्ञा होती है और संविधान की दसवीं अनुसूची का भी हूबहू पालन के करने की बजाय कुछ कानूनी कमजोरियों को न्यायसंगत ठहराने की पहल देश के लोकतंत्र के निरंकुश होने की आशंका ही पैदा करता है.

इसे भी पढ़ेंःभाजपा ने पूछा, #AIMIM नेता वारिस पठान के बयान पर क्यों चुप हैं तथाकथित लिबरल?

Telegram
Advertisement

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Related Articles

Back to top button
Close