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कैग की रिपोर्ट से साबित होता है कंबल घोटाला, पर सरकार जांच के नाम पर कर रही लीपापोती, साल बीत गया, नहीं हुई कोई कार्रवाई

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Akshay/Chhaya

Ranchi: विधानसभा के पटल पर गुरुवार को कैग की सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर रिपोर्ट रखी गयी. रिपोर्ट में चर्चित कंबल घोटाले का भी जिक्र है. कैग की इस रिपोर्ट से पुख्ता होता है कि झारखंड में कंबल घोटाला हुआ है. बावजूद इसके सरकार पूरे मामले को जांच को मकड़जाल में फंसा कर लीपापोती करने में लगी है. एक साल हो गया लेकिन कंबल घोटाले की आरोपी झारक्राफ्ट की तत्कालीन सीओ रेणु गोपीनाथ पाणिक्कर पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं हुई है.

ऐसे हुआ कंबल घोटाला

कैग की रिपोर्ट में यह साफ है कि किस तरह धागों की ढुलाई, परिवहन, वितरण से लेकर हर स्तर पर लूट हुई. साल 2016-17 तक कंबल वितरण के नाम पर करोड़ों की राशि की गड़बड़ झारक्राफ्ट ने की. 29.48 करोड़ की राशि खर्च करने का कोई उचित प्रमाण कैग को भी नहीं मिल पाया. रिपोर्ट के बाद यह साफ हो गया है कि स्वयं सहायता समूह और बुनकरों को रोजगार देने के नाम पर झारक्राफ्ट ने जम कर लूट मचायी.

हर स्तर बनाए गए गलत दस्तावेज

एनएएन वूलन मिल्स और उन्नति इंटरनेशनल को 15.54 करोड़ मूल्य के 18.64 लाख किलोग्राम धागे की आपूर्ति करने का आदेश दिया गया. जिसमें 15.24 लाख किलोग्राम धागे की आपूर्ति झारक्राफ्ट के इरबा स्थित आपूर्ति केंद्रीय भंडार में करना था. झारक्राफ्ट ने श्रम विभाग को आश्वासन दिया था कि केंद्र में पांच तकनीकी कर्मचारी रहेंगे, जो धागों की गुणवत्ता का परीक्षण करेंगे. लेकिन इन सबके बावजूद पानीपत से सीधे धागों को झारक्राफ्ट के 27 कलस्टरों में भेज दिया गया. कैग की रिपोर्ट में बताया गया है धागों को सीधे कलस्टरों में भेजने के लिये कोई कारण नहीं बताया गया है. वहीं कलस्टरों में धागों के परीक्षण के लिये कोई तकनीकी कर्मचारी नहीं था.

झारक्राफ्ट कार्यालय से नहीं मिले प्रमाण

धागा प्राप्ति और भंडार से संबधित कोई प्रमाण झारक्राफ्ट कार्यालय से प्राप्त नहीं हुए. बिक्री चालान वहीं प्राप्त हुए जहां एनएचडीसी या विक्रेताओं की खरीदारी पर आधारित थे. साथ ही धागों की प्राप्ति और मात्रा को उचित स्थान तक पहुंचाया गया या नहीं इसका भी कोई प्रमाण नहीं मिला.

निविदा प्रक्रिया में शामिल हुए बिना चार फर्मों को मिला काम

मार्च 2017 में झारक्राफ्ट की ओर से धागों और उत्पादों के परिवहन के लिये सुपर हरियाणा रोड लाइंस और स्पीड फास्ट कुरीयर और कार्गो सर्विसेज पानीपत को चुना गया. इसके बावजूद डीजीएम हैंडलूम ने दो फर्मों के बजाय चार अन्य फर्मों को परिवहन कार्य दिया. इन फर्मों में हरियाणा गुड्स ट्रांसपोर्ट, हरियाणा ट्रांसपोर्ट, हरियाणा गोल्डन् रोड लाइन करनाल और श्री गणेश ट्रांसपोर्ट हैं. ये चारों फर्म किसी भी निविदा में शामिल नहीं हुए. रिपोर्ट में साफ लिखा गया है कि डीजीएम हैंडलूम ने चार अयोग्य फर्मों का चयन परिवहन के लिये कैसे किया इसका कोई प्रमाण नहीं. भुगतान के समय झारक्राफ्ट एमडी (प्रबंध निदेशक) की ओर से स्पष्टीकरण मांगा गया. जिसमें यह बताया गया था कि आपात स्थिति और जिले के डीसी के दबाव के कारण ऐसा किया गया.

बताया 261 किमी की रफ्तार से चली गाड़ी

परिवहन चालानों और वाणिज्य कर विभाग की ओर से जारी रोड परमिट जांच में भारी अनियमितता पायी गयी है.

  • 27 जुलाई 2017 से 10 सितंबर 2017 के दौरान 12 वाहनों ने पानीपत से झारखंड की यात्रा एक से पांच दिनों में की. इन वाहनों की दूसरी यात्रा के पूर्व दो बार वापसी की रिपोर्ट कैग को मिली. ऐसे में यह बताया गया है कि इन वाहनों ने 48 से 261 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से वाहन चलाया. जो कि भारत में ट्रकों की औसत यात्रा गति 20 से 40 किमी से काफी अधिक है.
  • 27 जून 2017 से 30 जून 2017 में आठ वाहनों का उपयोग धागों के परिवहन के लिये किया गया. झारक्राफ्ट में उपलब्ध इन वाहनों के चालान, वाहन संख्या और वाणिज्य कर विभाग से जारी रोड परमिट से इन वाहनों की संख्या मेल नहीं खाते. रिर्पोट में साफ कहा गया है कि इन वाहनों का इस्तेमाल धागों की आपूर्ति के लिये नहीं किया गया.
  • विभिन्न कलस्टरों में धागे पहुंचाने के लिये जिन वाहनों का प्रयोग किया गया, उसमें भी फर्जीवाड़ा है. अलग अलग वाहनों के नकली परिवहन चालान बनाये गये थे. झारक्राफ्ट की ओर से प्राप्त दस्तावेज में पाया गया कि तीन वाहनों ने अलग अलग जिला के दो कलस्टर में एक ही दिन यात्रा की. इसके साथ ही परिवहन चालान के अनुसार वाहनों ने कलस्टर से पानीपत तक वस्तुओं की ढुलाई की. जो कि एक दिन में असंभव है.
  • जनवरी 2017 से जून 2017 तक 92 रोड परमिट का उपयोग किया गया. लेकिन किसी में भी परमिट में सीटीडी चेक पोस्ट अधिकारियों की न मुहर है और न हस्ताक्षर. जबकि झारखंड वैल्यू एडेड टैक्स 2006 के तहत रोड परमिट को सीटीडी अधिकारी हस्ताक्षर करेंगे और मुहर लगायेंगे. कैग ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि धागों और कंबलों के आवागमन से संबधित रिपोर्ट जो झारक्राफ्ट की ओर से दिया गया, वो काल्पनिक है. क्योंकि रोड परमिट का उपयोग कंबल वितरण से संबधित नहीं था.

वाहनों के चालान और टोल डेटा में नहीं हो पाया मिलान

कैग ने झारखंड से पानीपत तक आधे तैयार कंबलों के परिवहन और टोल प्लाजा के डेटा से मिलान किया. जिसमें भारी अनियमितता पायी गयी. झारखंड से पानीपत के लिये सबसे सरल मार्ग एनएच दो है. जो सासाराम और दाहर टोल प्लाजा से होकर पानीपत जाता है. लेकिन झारखंड से पानीपत जाने वाले 83 ट्रकों में एक भी ट्रक इस मार्ग से नहीं गया. जबकि इन वाहनों ने कुल 127 यात्राएं की. 127 में से सासाराम पार करने वाली यात्राओं की संख्या नौ है. जबकि सासाराम के बाद भागन टोल प्लाजा पार करने वाली यात्राओं की संख्या जीरो है.

  • पानीपत से तैयार कंबल झारखंड लाने के लिये 46 ट्रकों ने 57 यात्राएं की. रिपोर्ट में बताया गया है कि किसी भी वाहन ने पानीपत से आते हुए टोल प्लाजा पार कर झारखंड प्रवेश नहीं किया. इसमें दाहर टोल प्लाजा पार करने वाली यात्राएं जीरो, भागन टोल प्लाजा पार वाली यात्राएं जीरो और भागन टोल प्लाजा पार करने के बाद सासाराम पार करनेवाली यात्राओं की संख्या जीरो है. जबकि इन वाहनों से 4,49,762 कंबल ट्रांस्पोर्ट किए जाने थे.

कैग ने माना झारक्राफ्ट रहा विफल

कंबल घोटाला और झारक्राफ्ट की ओर से बुनकरों को रोजगार देने के आश्वासन को कैग ने विफल माना है. झारक्राफ्ट की ओर से 88, 868 मानव दिवस का काम बुनकरों को देना था. जिसमें झारक्राफ्ट विफल रहा. वहीं कंबल वितरण के नाम पर 18.84 लाख किलोग्राम ऊनी धागे की खरीद के लिये 13.56 करोड़ का भुगतान, 2.39 करोड़ की मजदूरी, ढुलाई की लागत 1.36 करोड़, जनवरी 2018 तक 1.10 करोड़ के परिवहन लागत को कैग ने अनियमितता और धोखा बताया है.

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