Opinion

CAG : कैग और कैग के मुखिया का पद वर्तमान समय में कितना निष्पक्ष रह गया है?

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Faisal Anurag

जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल पद से इस्तीफा देने के एक दिन के बाद ही गिरीश चंद्र मुर्मू को भारत के नियंत्रक एवं महालेखाकार (CAG-कैग) के पद पर नियुक्त किया गया है. इस पद के बारे में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था : “भारत का नियंत्रक और महालेखाकार संभवतः भारत के संविधान का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी है. वह ऐसा व्यक्ति है जो यह देखता है कि संसद द्वारा सीमा से अधिक धन खर्च न होने पाए. या संसद द्वारा निर्धारित मदों पर ही धन खर्च किया जाए.”

एक ऐसे समय में जब कि कैग की ऑडिट में आयी भारी कमी को ले कर विवाद जारी है, मुर्मू के लिए यह एक चुनौती भी है. मुर्मू प्रधानमंत्री मोदी की खास पसंद के अधिकारी माने जाते हैं. उपराज्यपाल के रूप में उनके दो बयानों से केंद्र के नाराज होने की चर्चा के बीच उन्हें इस पद से नवाजा गया है. मुर्मू ने कश्मीर में 4G नेटवर्क शुरू करने के लिए कहा था. कहा था कि अब इसके लिए हालात बन गए हैं. लेकिन केंद्र ने इनकार कर दिया. केंद्र के अनुसार अभी ऐसे हालात नहीं बने हैं जिससे कश्मीर के लिए इस सुविधा को शुरू किया जाए.

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दूसरा बयान जम्मू कश्मीर में चुनाव को ले कर था. दो सालों से चुनाव नहीं कराए गए हैं. मुर्मू ने कहा था कि अब चुनावों को बहुत दिनों तक टाला नहीं जा सकता है. जिस पर चुनाव आयोग ने आपत्ति व्यक्त की थी. मुर्मू पिछले एक साल से उपराज्यपाल पद पर थे. और इस दौरान कश्मीर के हालात में सुधार नहीं के बराबर हुए हैं.

कैग के पद को खाली नहीं रखा जा सकता है. राजीव महर्षि इस पद से 30 अगस्त को रिटायर हो रहे हैं. पिछले चार सालो से कैग की भूमिका को ले कर सार्वजनिक चर्चा हो चुकी है. खास कर ऑडिट रिपोर्ट की संख्या में अप्रत्याशित कमी दर्ज की गयी है. संसद में ऑडिट रिपोर्ट पेश करने में कोताही की जा रही है. इसमें कैग की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. उसकी रिपोर्ट में  90 दिनों से ज्यादा का विलंब हो रहा है. राफेल के मामले में कैग की रिपोर्ट संसद में रखे जाने को ले कर हुआ विवाद हुआ. नोटबंदी के मामले में भी कैग की भूमिका को ले कर भी सवाल किए जा चुके हैं.

कैग एक संवैधानिक संस्था और पद है. और इस संवैधानिक संस्था की जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े हुए हैं. आमतौर पर कैग से निष्पक्ष भूमिका में रहने की अपेक्षा की जाती है. लेकिन उसके सरकार के साथ प्रतिबद्ध दिखने की प्रवृति को ले कर जानकारों ने सवाल उठाए हैं. द वायर में  छपे एक आलेख में सवाल उठाया गया है कि किस तरह ऑडिट रिपोर्ट तैयार करने में देरी की जा रही है. इससे जवाबदेही प्रभावित हो रही है. विनोद राय जब कैग में थे तब औसत 200 से अधिक ऑडिट रिपोर्ट हर साल प्रस्तुत किए जाते थे.

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इसमें केंद्र और राज्यों दानों की रिपोर्ट शामिल हैं. लेकिन अब तो इसकी संख्या 73 तक सीमित हो गयी है. वित्त वर्ष 2018-19 में सीएजी ने केवल 73 रिपोर्ट तैयार किए. जिसमें केंद्र सरकार के लिए मात्र 15 थे. शेष राज्य सरकारों के लिए. 2017-18 में तो 98 रिपोर्ट तैयार हुए. जिसमें  32 केंद्र सरकार के लिए थे. यह कमी बताती है कि सरकार नहीं चाहती कि ऑडिट रिपोर्ट के परेशान कर देने वाले सवाल और तथ्य लोगों की जानकारी में आएं.

यह सामान्य बात नहीं है. इस संवैधानकि संस्था की कार्य शैली पर सवाल उठना लोकतंत्र के लिए बेहतर संकेत नहीं माना जा सकता है. केंद्र और राज्य सरकारों की वित्तीय जांच की जिम्मेदारी निभाने वाले कैग की इस सुस्ती को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

भारत का संविधान कैग की स्वतंत्रता की रक्षा करता है. हालांकि, कैग के चयन के लिए कोई निर्धारित मानदंड नहीं है. बावजूद अपेक्षा की जाती है कि कैग सरकारों से प्रभावित हुए बगैर निष्पक्ष रहेगा. और वित्तीय विवेक के आलोक में लेखजोखा का परीक्षण करेगा.

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भारत में कैग ने निष्पक्षता के मानदंड पर बड़ी लकीर खींची है.  विनोद राय के जमाने में 2G विवाद की ऑडिट रिपोर्ट भी उल्लेखनीय है. जो आगे चल कर विवादित हुई.  और उसके राजनीतिक परिणाम भी देखे गए. भारत में कैग के पद से रिटायर होने के बाद भी सरकार से लाभ के पद प्रप्त किए जाते रहे हैं. इससे यह गंभीर सवाल उठता रहा है कि आखिर एक निष्पक्ष कैग के लिए क्यों जरूरी मानदंड इजाद करने में राजनीतिक दल विफल होते हैं.

इसका उत्तर भी इसी में निहित है कि किस तरह कैग ने अतीत में राजनीतिक आकाओं के हितों का ध्यान रखा है. आमतौर पर इस पद पर जिस तरह सरकार और खास कर प्रधानमंत्री की पसंद के लोगों की नियुक्ति की जाती है, उससे सवाल उठने का मौका मिलता है.

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