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उपचुनाव : दुमका की पिच तय करेगी JMM और BJP की ‘जय या क्षय’

  • बसंत सोरेन और डॉ लुईस मरांडी पर टिकी है दोनों के दलों की साख की नैया

Nitesh Ojha

Jharkhand Rai

Ranchi : दुमका विधानसभा सीट पर तीन नवंबर को होनेवाला उपचुनाव महज उपचुनाव न रहकर जेएमएम और भाजपा की प्रतिष्ठा का विषय बन चुका है. एक तरफ जेएमएम ही नहीं, बल्कि खुद दुमका सीट छोड़नेवाले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की प्रतिष्ठा उनके भाई बसंत सोरेन के रूप में दांव पर लगी है, तो दूसरी तरफ 2019 में दुमका की जनता द्वारा नकार दी गयीं डॉ लुईस मरांडी के लिए फिर से यहां की जनता के दिलों में जगह तलाशने का भाजपा ने जोखिम उठाया है.

एक तरफ बसंत सोरेन अपनी पहली ही राजनीतिक गेंद पर छक्का मारने दुमका की पिच पर उतरे हैं, तो दूसरी तरफ इसी पिच पर लंबी पारी खेल चुकीं डॉ लुईस मरांडी पिछली हार से हार न मानकर यह साबित करने फिर से मैदान में हैं कि उन्होंने पिछले नौ महीने में अच्छी-खासी ‘नेट प्रैक्टिस’ कर ली है और अब वह फॉर्म में हैं.

दोनों प्रत्याशी अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए यहां लगातार जनसंपर्क अभियान चल रहे हैं. यह उपचुनाव जेएमएम और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ-साथ व्यक्तिगत रूप से डॉ लुईस मरांडी के अलावा भाजपा के लिए किसी एसिड टेस्ट से कम नहीं है. ऐसे में आइये हम जानने की कोशिश करते हैं बसंत सोरेन और डॉ लुईस मरांडी के उन पक्षों के बारे में जो इस उपचुनाव में दुमका की जनता को जीतने में उनकी मदद कर सकते हैं. हम उनके उन पक्षों पर भी नजर डालेंगे, जो उनके लिए इस उपचुनाव में नुकसानदेह साबित हो सकते हैं. तो आइये नजर डालते हैं उनके उन प्लस प्वॉइंट्स और माइनस प्वॉइंट्स पर.

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लुईस मरांडी : प्लस प्वॉइंट्स

  • डॉ लुईस मरांडी के चुनाव प्रचार में इस बार भाजपा पूरी तरह से एकजुट होकर काम कर रही है. पार्टी के अंदर उनका विरोध नहीं के बराबर है. पिछले चुनाव में पार्टी के अंदर उनका छिटपुट विरोध था.
  • प्रदेश के तीन पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा (दोनों आदिवासी समाज के बड़े चेहरे) और रघुवर दास सहित गोड्डा के चर्चित सांसद निशिकांत दुबे, प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश ने पार्टी की प्रत्याशी डॉ लुईस मरांडी के पक्ष में पूरी ताकत झोंक दी है. ये लगातार दुमका के दौरे पर हैं और यहां की जनता पर लगातार डोरे डाल रहे हैं.
  • डॉ लुईस मरांडी के लिए दुमका सीट जानी-पहचानी हुई है. यहां उनकी पकड़ भी रही है. इस सीट से वह चुनाव जीतती रही हैं.
  •  2019 के चुनाव में डॉ लुईस मरांडी दुमका की जनता के दिलों से उतर गयीं और जनता ने हेमंत सोरेन पर विश्वास जताते हुए उन्हें अपने दिलों में जगह दी. लेकिन, हेमंत सोरेन ने बरहेट सीट पर बने रहना मुनासिब समझा और दुमका सीट छोड़ दी. ऐसे में दुमका की जनता के सेंटिमेंट्स को अपने पक्ष में करने का डॉ लुईस मरांडी के लिए यह अच्छा मौका है.
  • इस उपचुनाव में जदयू भी भाजपा के समर्थन में आ गयी है. इससे डॉ लुईस मरांडी को जदयू के साथ की मजबूती भी हासिल है.

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लुईस मरांडी : माइनस प्वॉइंट्स

  • 2019 का चुनाव हारने के बाद परिस्थितियां उनके लिए अभी भी नहीं बदली हैं. ऐसे में वोटर्स को अपने पक्ष में करना उनके लिए बड़ी चुनौती है.
  • उनके मंत्री के कार्यकाल में उन पर क्षेत्र के लोगों से कटने का आरोप लगता रहा है. यह इस उपचुनाव में उनकी राजनीतिक सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है.
  • भाजपा ने विधानसभा चुनाव पूर्व सीएम रघुवर दास के चेहरे पर लड़ा था. इससे भी क्षेत्र के लोगों, विशेषकर आदिवासी समाज, ने सत्ता के खिलाफ खूब वोटिंग की थी.

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बसंत सोरेन : प्लस प्वॉइंट्स

  • जेएमएम प्रत्याशी बसंत सोरेन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भाई हैं. ऐसे में पार्टी सुप्रीमो शिबू सोरेन सहित तमाम सोरेन परिवार और उनकी पकड़ बसंत सोरेन के लिए काफी फायदेमंद साबित होगी.
  • हेमंत सोरेन सरकार में जेएमएम को कांग्रेस और आरजेडी का समर्थन मिला है. ऐसे में बसंत सोरेन को अन्य दो दलों के साथ वाम दल का भी समर्थन हासिल है.
  • उपचुनाव में अक्सर यह देखा जाता है कि जिस पार्टी की सत्ता राज्य में होती है, उसके प्रत्याशी को थोड़ा संबल जरूर मिलता है.
  • डॉ लुईस मरांडी इस सीट पर कई बार आजमायी जा चुकी हैं. जनता अब तक उन्हें जान चुकी है. लेकिन, बसंत सोरेन युवा चेहरा हैं और डॉ लुईस मरांडी की तुलना में एकदम फ्रेश हैं. इस लिहाज से भी जनता आजमायी हुई पुरानी नेत्री के बजाय नये-नवेले युवा चेहरे को आजमाने पर विचार कर सकती है.

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बसंत सोरेन : माइनस प्वॉइंट्स

  • माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का दुमका सीट से विधायिकी छोड़े जाने का फैसला इस उपचुनाव में जेएमएम को घाटे में डाल सकता है. ऐसे में दुमका के वोटर्स के सेंटिमेंट्स को अपने पक्ष में बनाये रखना बसंत सोरेन के लिए बड़ी चुनौती है.
  • दुमका में पिछली बार संभ्रांत वर्ग (जिसमें अग्रणी जाति, सर्विस क्लास के लोग शामिल हैं) के लोगों को हेमंत सोरेन का पूरा समर्थन मिला था. यह समर्थन उन्हें रघुवर के चेहरे को देखते हुए मिला था. इस उपचुनाव में बसंत को लेकर यह समर्थन हासिल करना एक बड़ी चुनौती होगी.
  • पहली बार चुनाव लड़ रहे बंसत सोरेन का अनुभव भी डॉ लुईस मरांडी की तुलना में काफी कम है.

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