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#Budget_Session 31 जनवरी से, अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर घिरी सरकार के लिए बजट सत्र आसान नहीं होने वाला

NewDelhi :   31 जनवरी, शुक्रवार से बजट सत्र शुरू हो रहा है. बजट सत्र दो हिस्सों में 3 अप्रैल तक चलेगा. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण एक फरवरी, शनिवार को 2020-21 का बजट पेश करेंगी. जान लें कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर घिरी सरकार के लिए ये बजट आसान नहीं होने वाला है.

केंद्र सरकार को विपक्ष के हमलों का सामना करना होगा. खबर है कि लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष की ओर से कई मसलों पर सवालों की लंबी लिस्ट तैयार की गयी है, जिनका जवाब गृह मंत्रालय को देना होगा. बजट से अलग सरकार के  लिए सबसे बड़ी समस्या CAA, NRC पर जारी संग्राम पर है.

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देश के कई हिस्सों में नागरिकता संशोधन एक्ट(CAA) और नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजन(NCR) के मसले पर विरोध प्रदर्शन जारी है. पिछले सत्र में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नागरिकता संशोधन एक्ट को पेश किया था, जिसके बाद से ही विपक्ष हमलावर है.

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  सरकार की सबसे बड़ी चुनौती गिरती हुई अर्थव्यवस्था  

बजट सत्र में सरकार की सबसे बड़ी चुनौती गिरती हुई अर्थव्यवस्था को सुधारने की है. लगातार गिरती जीडीपी, बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई को लेकर विपक्ष सरकार को घेर रहा है, ऐसे में ये बजट सत्र सरकार के लिए आसान नहीं होने वाला है. अर्थव्यवस्था के अलावा CAA, NRC, जम्मू-कश्मीर में पाबंदी समेत कई ऐसे मामलों पर विपक्ष हमला करने के लिए तैयार है.

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लोकसभा की वेबसाइट पर जो सवालों की लिस्ट दी गयी है, उसमें 4 फरवरी को पूछे जाने वाले सवालों की जानकारी दी गयी है. इसमें नागरिकता संशोधन एक्ट पर मचे घमासान, नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजन के स्टेटस, डिटेंशन सेंटर्स और शरणार्थियों को नागरिकता देने की प्रक्रिया के बारे में पूछा जायेगा.

बजट पेश होने के बाद जब सवाल-जवाब का सिलसिला शुरू होगा तो लोकसभा सांसद अब्दुल खलीक के द्वारा गृह मंत्रालय से नागरिकता की प्रक्रिया को लेकर प्रश्न दागा जायेगा. जिसमें CAA के बाद नागरिकता के लिए कितनी एप्लीकेशन आयी हैं, इनमें किन राज्यों के लिए अधिक एप्लिकेशन आयी हैं.

इसके अलावा असम के नेता प्रद्युत की ओर से डिटेंशन सेंटर पर सवाल पूछा जायेगा, जिसमें क्या सरकार ने कोई डिटेंशन सेंटर बनाये हैं. अगर ऐसे सेंटर बने हैं तो उनकी लोकेशन क्या है, इसके साथ ही NRC के तहत आगे सेंटर बनाने की क्या योजना है. लोकसभा के अलावा राज्यसभा में भी गृह मंत्रालय से जुड़ें प्रश्न लिस्टिड हैं.

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सीनियर सिटिजन्स बड़ी बेसब्री से बजट का इंतजार कर रहे हैं

देशवासी बजट का  खासतौर पर सीनियर सिटिजन्स बड़ी बेसब्री से इस बजट घोषणा का इंतजार कर रहे हैं ताकि उन्हें पता चल सके कि उनके बटुए में और ज्यादा पैसे आएंगे या नहीं। बीते सालों में, जॉइंट इंडियन फैमिली ने न्यूक्लियर फैमिली का रास्ता खोल दिया है.  इसका मतलब है कि आज अधिक से अधिक सीनियर सिटिजन्स आत्मनिर्भर तरीके से अपनी सेविंग्स और इनकम के भरोसे अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं.

पिछले साल किये गये इकनॉमिक सर्वे के अनुसार, भारत में बड़े-बुजुर्गों की हिस्सेदारी यानी 60 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों की संख्या 2011 में 8.6% से लगातार बढ़ते हुए 2041 तक 16% यानी लगभग दोगुनी हो जायेगी। ऐसी परिस्थिति में, उपयोगी बजट सम्बन्धी घोषणाओं के माध्यम से इस वर्ग के लोगों की जरूरतों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है.

इनकम टैक्स कानून के अनुसार, सीनियर सिटिजन्स को दो समूहों में बांटा गया है.  सीनियर सिटिज़न्स और सुपर सीनियर सिटिज़न्स.  इनमें से प्रत्येक समूह के लिए टैक्स सम्बन्धी कानून भी अलग-अलग हैं.  सीनियर सिटिज़न्स यानी 60 से 80 साल की उम्र के लोगों के लिए 3 लाख रुपये की इनकम तक टैक्स माफ है.

सुपर सीनियर सिटिज़न्स यानी 80 साल से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए 5 लाख रुपये की इनकम तक टैक्स माफ़ है.  रिटायर्ड लोग चाहते हैं कि यह अंतर ख़त्म हो जाये.  क्योंकि कई लोगों के पास, पेंशन और इन्वेस्टमेंट को छोड़कर इनकम का कोई अन्य साधन नहीं है.  उनका मानना है कि सबके लिए 5 लाख रुपये की छूट सीमा तय की जानी चाहिए.

कारोबार की ऊंची लागत को कम करने का आग्रह

जिंस बाजार प्रतिभागियों के शीर्ष संगठन कमोडिटी पार्टिसिपेंट्स ऑफ इंडिया (सीपीएआई) ने सरकार से बजट में कारोबार की ऊंची लागत को कम करने का आग्रह किया है. उसका कहना है कि ऊंची लागत के कारण सौदों में भारी कमी आयी है.
इससे पूंजी की स्थिति पर असर पड़ा है और शेयर के खरीद-फरोख्त करने पर आने वाली लागत बढ़ गयी है.  वित्त मंत्रालय को दिये प्रस्तुतीकरण में सीपीएआई ने कहा कि भारत में विभिन्न परिसंपत्तियों में लेनदेन की लागत अमेरिका, चीन और सिंगापुर में लेनदेन की लागत से चार से 19 गुना अधिक है.

संगठन ने सरकार से कहा है कि एसटीटी को व्यय मानने के बजाय पहले भुगतान किया गया रिफंड नहीं होने वाला कर मानना चाहिए या फिर आयकर की धारा 88 ई के तहत इसपर छूट दी जानी चाहिए जैसा कि 2008 तक व्यवस्था रखी गयी थी.

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