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बुद्ध भारत की आध्यात्मिक विरासत के अनमोल रतन

बुद्ध पूर्णिमा पर विशेष

Naveen sharma

Ranchi : गौतम बुद्ध भारत की आध्यात्मिक विरासत के सबसे चमकते हीरे हैं. ईसा पूर्व 563 में जन्मे सिद्धार्थ के महात्मा बुद्ध बनने की कहानी काफी प्रेरक है.

सिद्धार्थ जब रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकले थे तो रास्ते में पहले एक बीमार फिर एक वृद्ध और उसके बाद एक मृत व्यक्ति को देखकर उनके मन में कई तरह के सवाल उठते हैं. इसी तरह के सवाल मुझे भी परेशान करते हैं. सिद्धार्थ ने इन सवालों का जवाब पाने के लिए अपनी पत्नी व बच्चे को सोता हुआ छोड़ एक रात राजमहल छोड़ दिया.

सिद्धार्थ ने अपने सवालों के जवाब पाने के लिए कई वर्षों तक यहां-वहां खाक छानी. कई गुरुओं के सम्पर्क में रहे. कई वर्षों तक तपस्या की. इसके बाद उन्हें बोधगया में ज्ञान की प्राप्ति हुई. उन्होंने अपने ज्ञान व शिक्षा के प्रचार के लिए काफी भ्रमण किया.

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उन्होंने अपने अनुभवों के बल पर मध्यम मार्ग को अपनाने की शिक्षा दी. यानि वीणा के तारों को इतना ढीला भी मत छोड़ दो कि वो आवाज ही ना निकाल पाएं और ना ही तारों को इतना कसो की वे टूट जायें.  यानि अति किसी बात की अच्छी नहीं. इसलिए भगवान बुद्ध ने लोगों को मध्यम  मार्ग अपनाने का उपदेश दिया. उन्होंने दु:ख उसके कारण और निवारण के लिए अहिंसा पर बहुत जोर दिया. जीवों पर दया करने का उपदेश दिया. बुद्ध ने हवन और पशुबलि की जमकर निंदा की.

बुद्ध इसलिए भी लोकप्रिय रहे क्योंकि उन्होंने आम आदमी से उसकी ही भाषा में संपर्क स्थापित करने का महत्व जाना. इसलिए उन्होंने पाली भाषा को अपनाया. इसके कारण उनके उपदेश आम लोगों तक पहुंचे और कई लोग उनके अनुयायी बनते गए. एक और बात बुद्ध ने लोगों के आम आचार व्यवहार पर कोई खास बदलाव पर जोर नहीं दिया यहां तक की मांसाहार छोड़ने को भी नहीं कहा.

उन्होंने चार आर्य सत्य तथा अष्टांगिक मार्ग का अनुसरण करने का निर्देश दिया.

आज भारत में भले ही बौद्ध धर्म के अनुयायियों की संख्या कम है लेकिन श्रीलंका, म्यनमार, थाईलैंड, कोरिया जापान व चीन में बौद्ध धर्म को माननेवाले की संख्या काफी है. बौद्ध धर्म का विदेश में प्रचार प्रसार सम्राट अशोक के शासन काल में ही शुरू हो गया था. उन्होंने अपने बेटी संघमित्रा और बौद्ध भिक्षुओं को श्रीलंका भेजा था. इसके बाद भी बौद्ध धर्म को भारत में कई राजाओं का संरक्षण मिला. खासकर हर्षवर्धन का शासन विशेष रूप से उल्लेखनीय है. उनके समय में प्रसिद्ध बौद्ध सभा हुई थी.

बुद्ध की मृत्यु के बाद बौद्ध धर्म में भी मतभेद ऊभरे. इसलिए यह दो संप्रदायों में बंट गया. पुरानी परंपरा और सिद्धांत को मानने वाले हीनयान कहलाए और नए विचारों के लोग महायान संप्रदाय के. ये महायान ही ज्यादा प्रचार पा सका.

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