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ब्रदर्स एकेडमी ने 12वीं के लिए अलग से डिजाइन किया सिलेबस, विशेषज्ञों ने कहा- खेल रहा छात्रों के भविष्य से

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Ranchi : 12 वीं के छात्रों को अपनी ओर खींचने के लिए ब्रदर्स एकेडमी ने अलग से सिलेबस डिजाइन किया है. ताकि 11वीं के छात्र भी इनके चंगुल में फंस सकें. आईआईटी और मेडिकल में दाखिले के नाम पर ये सीबीएसई के गाइड लाइन को दरकिनार करते हुऐ बच्चों में प्रतिस्पर्धा उत्पन कराते हैं. सीबीएसई ने देश भर में हो रही इस तरह की कोशिशों पर नाराजगी पहले की जतायी है.

सीबीएसई ने पाया है कि कोचिंग संस्थानों द्वारा अलग से सिलेबस डिजाईन करने के कारण बच्चे आईआईटी जैसी परीक्षा में तो सफल हो जा रहे हैं, लेकिन उनका एकेडमिक स्कोर खराब हो जाता है. ऐसे में ब्रदर्स एकेडमी ने सीबीएसई के नियमों को नजर अंदाज कर 11वीं के रेगुलर छात्रों में प्रतिस्पर्धा पैदा करने के लिए अलग से सिलेबस डिजाइन की है. हमने इस विषय पर कई विशेषज्ञों से बात की. विशेषज्ञों ने इसे न सिर्फ गलत कहा है बल्कि कोचिंग संस्थान के इस गतिविधि को अनैतिक और ठगी का कारोबार बताया है.

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सीबीएसई के सिलेबस की क्या है विशेषता

सीबीएसई बच्चों के मानसिक स्तर, उम्र का स्तर, आर्थिक एवं समाजिक स्तर को देखकर बच्चों के लिए सिलेबस एवं कोर्स बनती है. ऐसे में कोचिंग संस्थान इन नियमों को नजर अंदाज कर सिलेबस तैयार करते हैं ताकि बच्चों में प्रतिस्पर्धा बने और उनका धंधा बेहतर रूप से चल सके.

क्या कहते हैं शिक्षा विशेषज्ञ

केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक पीएन सिंह के मुताबिक इस तरह के कोर्स का डिजाइन सीबीएसई और अन्य बोर्ड के नियमों के खिलाफ है. इस तरह के कोर्स डिजाइन छात्रों को उनके पाठ्यक्रम से अलग करता है और उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रतिर्स्पधा की ओर ले जाता है, जो कि गलत है.

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बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व डीन डॉ प्रशांत कुमार ने बताया कि अयोग्य शिक्षकों के द्वारा इस तरह का कोर्स बनाया जाना गलत है. कोचिंग संस्थानों के लिए सरकार को अलग से नियम और कानून बनना चहिए, ताकि शिक्षा जगत में इसका प्रतिकूल असर पड़ सके. प्रोफसर डॉ एके नाग ने बताया कि कोई बोर्ड 10वीं एवं 12वीं का सिलेबस बच्चों को मानसिक स्तर को देखकर बनाती है.

बोर्ड का उदेश्य बच्चों को स्वार्गिण विकास होता है ताकि बच्चे आगे चलकर नैतिक शिक्षा के बल पर बेहतर इंसान बन सकें, ऐसे में कोचिंग संस्थानों द्वारा अलग से सिलेबस तैयार करना उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बनाता है. गणित के शिक्षक डॉ एमपी सिंह ने बताया कि सरल से कठीन पाठ्यक्रम में जाने के लिए बच्चों को उनके लेबल के अनुरूप बोर्ड सिलेबस तैयार करती है ताकि बच्चों को पाठ्यक्रम रोचक लगे. लेकिन हाल के दिनों में आईआईटी एवं मेडिकल की प्रतिस्पर्धा बच्चों में कोचिंग संस्थानों द्वारा इतनी तेजी से फैलाया जा रहा है कि बच्चे मनोरोगी होते जा रहे हैं.

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क्या कहते हैं मनोचिकित्सक

रिनपास के मनोचिकित्सक श्रीशांत सिन्हा ने बताया कि 10वीं के बाद इस देश में दो तरह से सिलेबस हाल के दिनों में आ गये हैं. एक सीबीएसई का दूसरा कोचिंग संस्थानों का. सीबीएसई बच्चों के पाठ्यक्रम के आधार पर सिलेबस तैयार करता है और कोचिंग संस्थान बच्चों में प्रतिस्पर्धा को लेकर सिलेबस तैयार करता है. इन दिनों के बीच बच्चें जब अपने को रखकर देखते हैं तब वे मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं.

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