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भैया हमको तो चमकानी है अपनी-अपनी राजनीति, जनता जाए भांड में

Gyan Ranjan

Ranchi: झारखंड सहित अमूमन पूरे देश की राजनीति फिलवक्त पिछड़ों को आरक्षण, जातिगत जनगणना और रोजगार के मुद्दे पर आकर सिमट गयी है. कोई भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है जो इन मुद्दों की आग में हाथ नहीं सेंक रहा है. झारखंड में तो और भी विचित्र हाल है. सत्ता में बैठे दल ही इस मुद्दे को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे हैं. विपक्ष को बैठे बिठाए मुद्दा दिया जा रहा है. इस मुद्दे पर कहीं कोई काम नहीं हो रहा है बस सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी राजनीति चमका रहे हैं. भले ही जनता भांड में जाये.

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पिछड़ों को आरक्षण का मुद्दा बना हॉट केक

झारखंड में जनसंख्या के हिसाब से देखा जाय तो सबसे बड़ी आबादी पिछड़ों की है. जाहिर है सबसे बड़ा वोट बैंक पिछड़ी जाति का है. सभी राजनीतिक दल अब पिछड़ों को साधने में लगा हुआ है. कैसे पिछड़ों का हितैषी बना जाय इसपर राजनीति चरम पर है. केंद्र सरकार ने  पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा और मेडिकल की पढाई में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देकर पासा फेंक दिया है. इतना ही नहीं मोदी कैबिनेट के दुसरे विस्तार में पिछड़ी जाति के 27 लोगों को जगह देकर अपना पलड़ा मजबूत कर लिया है. इसके बाद से ही पिछड़ों के नाम पर राजनीति शुरू हो गयी है. झारखंड में भी यह आग सुलगने लगी. सभी राजनीतिक दलों ने विधानसभा चुनाव के समय अपने-अपने घोषणा पत्र में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया था. एक वर्ष से ज्यादा समय तक इस बात को लेकर कोई आवाज नहीं उठी लेकिन जैसे ही केंद्र सरकार ने पिछड़ों को साधना शुरू किया, सभी दलों के कान खड़े हो गए.

 

झारखंड की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा जब सत्ता में थी उस समय उसे पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण की बात याद नहीं आई. जबकि पांच वर्षों तक झारखंड में भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सरकार चलाई है. कई निर्णय सरकार के द्वारा लिए गए. इस मुद्दे पर उस समय की डबल इंजन की सरकार ने कोई काम नहीं किया. वर्त्तमान में भाजपा विपक्ष की भूमिका में है और पिछड़ों के नाम पर राजनीति चमकाने में जुट गयी है. हेमंत सरकार में कांग्रेस प्रमुख सहयोगी दल है. आलम यह है कि सरकार में रहने के बाद भी कांग्रेस पार्टी को इस मामले में अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना प्रदर्शन करना पर रहा है. विधानसभा से लेकर सड़क तक कांग्रेस ने इस मुद्दे पर राजनीति की. लेकिन कभी भी कैबिनेट की बैठक में मुख्यमंत्री के समक्ष पिछड़ों की आवाज को नहीं उठाया. झामुमो ने भी अपने घोषणा पत्र में पिछड़ों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का बढ़-चढ़कर वादा किया था. झामुमो के एक भी विधायक ने इस मामले को नहीं उठाया. पार्टी की तरफ से केंद्रीय महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य का सिर्फ इतना बयान आता है कि सरकार बहुत जल्द इसपर निर्णय लेगी. लेकिन पार्टी कोटे के किसी मंत्री ने इस मामले पर अबतक जुबान नहीं खोली है.

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होती है रोजगार की बात, स्थानीय और नियोजन नीति का है इंतजार

रोजगार के वादे के साथ हेमंत सोरेन सत्ता में आये हैं. सरकार के एक वर्ष पूरे होने पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने वर्ष 2021 को रोजगार वर्ष घोषित किया था. इस कार्य में हेमंत सरकार कछुए की गति से चल रही है. रोजगार के लिए सबसे जरूरी है नियोजन नीति और स्थानीय नीति. पिछली सरकार के स्थानीय और नियोजन नीति को वर्तमान सरकार ने रद्द कर दिया है. अबतक सरकार ने नयी स्थानीय और नियोजन नीति नहीं बनायी है. हाल में ही समाप्त हुए विधानसभा के मॉनसून सत्र में सरकार ने निजी क्षेत्रों की नौकरी में स्थानीय को 75 प्रतिशत आरक्षण का बिल पास किया है. लेकिन सवाल अब भी जिन्दा है कि स्थानीय कौन. यह सवाल सदन में सत्ता पक्ष के विधायक बंधू तिर्की और विपक्ष के नीलकंठ सिंह मुंडा, भानु शाही और अमर कुमार बावरी ने भी उठाया था. मगर सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आया. यानि इस मामले में भी सभी पार्टियां सिर्फ राजनीति ही चमका रही है. रोजगार के मामले में भी झारखंड के युवा ठगे जा रहे हैं.

 

भाषा को लेकर विपक्ष का वार तो सत्ता पक्ष में टकराव

झारखण्ड कर्मचारी चयन आयोग में 12 क्षेत्रीय भाषाओं को स्थान दिया गया है. इसमें हिंदी सहित कई अन्य भाषाओं को स्थान नहीं दिया गया है. इसको लेकर भाजपा ने सरकार पर वार तो कर ही रही है सत्ता पक्ष में भी टकराव है. हेमंत सरकार की प्रमुख सहयोगी दल कांग्रेस के कई विधायकों ने इस मामले पर अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद की है. मजेदार बात यह है कि कांग्रेस के विधायक इसका विरोध तो कर रहे हैं लेकिन जब कैबिनेट की बैठक में यह प्रस्ताव आया था उस समय कांग्रेस कोटे के चार में से एक भी मंत्री ने इसका विरोध नहीं किया था. इस मामले पर भी सिर्फ और सिर्फ राजनीति ही हो रही है जबकि झारखंड के लाखों युवा सरकार की इस नीति से कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा देने से वंचित रह जायेंगे.

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