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ब्रिटेन की गृहमंत्री ने माफी मांगी, कनाडा के रक्षा मंत्री लाइन में लगे… और हमारे मंत्री ब्लेम गेम में व्यस्त !

Surjit Singh

पिछले पांच दिनों की दो खबरें हमें चौंकाती है. और हमें सोचने पर मजबूर करती है, हमारे देश की सरकार व मंत्रियों के बारे में. उनके काम करने के तरीकों के बारे में, लोगों को फालतू की बातों में उलझाने की काबिलियत के बारे में. जनता के प्रति उनकी जिम्मेदारी का अहसास ना हो पाने के बारे में और गलती को ना मानने के बारे में.

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Sanjeevani

पहली खबर 12 अप्रैल की है. न्यूज-18 के वेबसाइट पर छपी है.

पहली खबर है-

डॉक्टर्स को वक्त पर PPE  न दे पाने पर ब्रिटेन के गृहमंत्री प्रीति पटेल ने देश से माफी मांगी. (इस खबर को पूरा पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें).

दूसरी खबर 16 अप्रैल की है.

लॉकडाउन-कनाडा के रक्षा मंत्री हरजीत सिंह सज्जन सामान लेने के लिए लाइन में लगे. (इस खबर को पूरा पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें)

अब आप जरा सोचिये. क्या आपने पिछले एक माह के भीतर देश के गृह मंत्री अमित शाह को कहीं देखा. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (आर्थिक पैकेज घोषणा वाले दिन को छोड़ कर) और देश के स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्द्धन को कही देखा.

देश के दूसरे मंत्रियों की तो बात की छोड़ दें. क्या किसी ने भी इस बात के लिए अफसोस जताया हो कि जरुरी कदम देर से उठाये गये. डॉक्टरों को PPE किट या मास्क की जरुरत को पूरा नहीं कर पाने के लिये वह क्षमा चाहते हैं.

पिछले एक माह के भीतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चार मर्तबा देश को संबोधित किया. क्या कभी यह पाया कि कोरोना से बचाव की जंग में वह यह बता रहे हों कि देश के लोगों को बचाने के लिये सरकार क्या-क्या कर रही है. क्या कभी बताया कि क्यों विदेशों से आने वाले लोगों की ठीक से जांच नहीं की जा सकी.

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क्या केंद्र सरकार के किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति ने यह बताया कि तबलीगी जमात के हजारों लोग दिल्ली के निजामुद्दीन में कैसे जुटे ? इसके लिये कौन जिम्मेदार है ? 17 मार्च को सूचना मिलने के बाद भी गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस ने तबलीगी जमात के लोगों को क्यों नहीं दिल्ली में ही रोक दिया?  आखिर किसी गलती से जमात के लोग देश के दूसरे हिस्सों में पहुंचे ?

आप कहेंगे लॉकडाउन करके संक्रमण को रोका गया. लेकिन क्या देश को लोगों और चिकित्साजगत को इस लॉकडाउन का फायदा मिला. नहीं मिला. यह लॉकडाउन तब और सफल होता, जब इस दौरान देश व राज्यों की सरकारें बड़े पैमाने पर लोगों की जांच करती.

तब और सफल हो जाता, जब पहली लॉकडाउन या लॉकडाउन-2 को लागू करने से पहले प्रवासी मजदूरों, किसानों के बारे में एक निति बनायी जाती.

पर, हो क्या रहा है. दिल्ली में जब मजदूर जुटे तो राजनीतिक पार्टियां, मीडिया और सोशल मीडिया पर अरविंद केजरीवाल को विलेन बनाया गया. अब महाराष्ट्र, गुजरात समेत देश के अन्य राज्यों में भी वहीं हो रहा है. इसे लेकर राजनीति हो रही है.

हमारी सरकार ने एक और काम किया. वह यह कि देश में कोरोना फैलाने की पूरी जिम्मेदारी तबलीगी जमात के उपर डाल दी. मतलब सरकारें, कुछ करे नहीं, समय पर अलर्ट ना हो, जरुरी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध ना कराये, जांच में तेजी ना लाये और अपनी विफलता के लिये टार्गेट तलाश करती रहे.

हमारे राजनेता यह सब करते हैं और सत्ता में बने रहने में सफल होते हैं, क्योंकि हम खुद जरुरी सवालों को छोड़ कर कभी हिंदु-मुस्लिम, कभी भारत-पाकिस्तान, कभी अमीर-गरीब, कभी तबलीगी जमात में व्यस्त रहते हैं. जरुरत है हम अपनी निष्क्रियता को खत्म करें औऱ सरकार से उनकी विफलताओं पर सवाल करना शुरू करें. जो सवाल करते हैं, उनके साथ खड़े हो, चाहे वह कोई भी हो. तभी एक स्वस्थ लोकतंत्र को हम जीवित रख पायेंगे.

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