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झारखंड को विकास पथ पर लाने के लिए सक्रिय जन अभिक्रम, सशक्त विपक्ष और गतिशील सत्ता की जरूरत है 

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Pravin Kumar

आदिवासी जब-तब दर्द से गाते हैं, पहाड़ों और जंगलों में किसने हमसे छीन लिया हमारा चैन. हमारा परिवार भूख से तड़पता है. हमारे बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं. मवेशियों को चराने और जंगल से लकड़ी लाने में गुम हो गया है बचपन. बच्चे रो-रो कर परेशान हैं. फिर भी हम खमोश हैं. कहां चला गया हमारे पुरखों का आह्वान जिसमें सम्मान और स्वशासन के लिए लड़ने, जीने व मरने की बात कही गयी थी.

किसने छीन लिये हमारे गांवों और जंगलों से हमारे सुमधुर गीतों के बोल. किस ने लूट लिया हमारे लय और ताल को, किसने पहरा लगा दिया है हमारे बच्चों की आजादी पर, जगंल हाथ से छीन लिया जा रहा, फिर भी बेबस, बेघर होने को हम है मजबूर… यह दशा झारखंड आदिवासी अंचल की है.

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खासकर खनन इलाकों में जैसे गुमला, लोहरदगा जिला के बॉक्साइड खनन इलाके के आदिवासी आज कराह रहे हैं. यह कहना है नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेज विरोधी केन्द्रीय जन संघर्ष समिति के महासचिव जेरोम कुजूर का.

वर्षों से अदिवासी अंचल में विकास की बाट जोह रहे लोगों की जुबान से इस तरह के गीत गुनगुनाये जाते हैं. गांव से पेट की आग बुझाने के लिए काम की तलाश में जब शहर आते हैं तो तब यह दर्द और बढ़ जाता है.

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दूसरी ओर लोकसभा चुनाव की सरगर्मी के बीच राजनीति में उभर रहे नकारात्मक सवालों के कारण ग्रामीण अंचल में चुनाव को लेकर उदासीनता के साथ-साथ एक खीझ भी पैदा कर रही है.

राज्य के ऐसे हालात में चुनावों के समय इस पर संजीदगी के साथ विचार-विमर्श करने की बजाये जोड़तोड़ से चुनाव जीतने और समुदायों की ताकत को कमजोर करने का प्रयास, क्या लोकतंत्र की संस्थागत प्रक्रिया को कमजोर नहीं बनाता है.

चुनाव के दौर में जनमानस की आकांक्षाओं तो आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता और न ही दस्तावेजों के सहारे इसे खंगाला जा रहा. वाचिक परंपराओं और शैलियों में जो जनश्रुतियां है, वे आज के इतिहास की प्रमुख सामग्री बनती जा रही है.

लेकिन राजनीतिक संदर्भ में यदि इसे समझने का प्रयास करें तो कहा जा सकता है कि लोकमानस की प्रवृतियों को आधार बनाकर ही एक बेहतर राजनीति की वकालत की जा सकती है.

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नकारात्मक आधार पर की जा रही राजनीति से किसी बेहतर कल का निर्माण संभव नहीं है. चुनाव के समय सामायिक सफलताओं के लिए जिस तरह के अवसरवाद को राजनीतिक दल अपना रहे हैं. चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष उससे न तो भ्रष्टाचार का खात्मा संभव है और न ही सामाजिक तौर पर विघटनकारी प्रक्रियाओं को रोका जा सकता है.

लोकसभा 2014 के चुनाव में उम्मीद की गयी थी कि राज्य और देश के वंचित समूहों के लिए विकास का मार्ग प्रशस्त होगा. लेकिन पिछले पांच सालों में विकास के ये विषय सरकारी विज्ञापन में ही दिखे. प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आने के लिए ‘सबका साथ-सबका विकास’ का नारा दिया था, जो कम-से-कम झारखंड में पूरा होता नहीं दिख रहा है.

राज्य में 19 जानें भूख से चली गयीं. कुपोषण झारखंड में एक बेहद गंभीर सवाल है. आज भी आदिवासी समाज अपना पेट भरने के लिए राज्य से पलायन कर रहे हैं.

इन सवालों से अलग विपक्ष भी 2019 चुनाव में विकास की कसौटी से दूर समाज को बांटने की प्रवृति और भाजपा के भय के नाम पर राजनीति झारखंड में भी दिखने लगी है.

आज की राजनीति में जो चल रहा है इसे ही महत्वपूर्ण माना जाता है. खूब चौड़ी सड़कों से पर्यटन का आनंद तो लिया जा सकता है, लेकिन लोगों के पेट में अनाज नहीं पहुंचाया जा सकता और न ही साफ पानी.

क्या हजारों लोगों को दिमागी मलेरिया से मरने के लिए अभिशप्त हो रहे तथा गांवों में सस्ते दाम पर अनाज का न पहुंचना या बच्चे की शिक्षा की गारंटी का अभाव केवल सताधारी दल की विफलता है. या सभी राजनीतिक दल की विफलता मानी जाए.

यदि सत्तारूढ़ समूह इसके लिए अपराधी है तो विपक्ष क्या कर रहा था. राजनीति का मतलब कीमती गाड़ी, सुरक्षा गार्ड ओर आरामदेह जिंदगी क्यों माना जाने लगा है.

हमारा मध्यमवर्ग ऐसी राजनीति को खूब कोसता है, लेकिन उसके सपनों में भी जिंदगी का यही पक्ष हावी है. तो क्या इस बात को नहीं सोचा जाना चाहिए कि मर्ज केवल ऊपरी तौर पर ही घातक नहीं है, बल्कि उसने आंतरिक संरचनाओं को भी प्रभावित कर दिया है.

आखिर राजनीति में मुद्दों को आधार बनाने से क्यों बचा जा रहा है. झारखंड में चुनाव घोषित होते ही सत्ता की दावेदारी कर रहे गठबंधनों का जो चेहरा सामने है. उससे कोई उम्मीद पैदा होती है क्या ? यदि नहीं तो क्यों?

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राजनीतिक परिपेक्ष्य में झारखंड आज जहां पर खड़ा है, उसके लिए जिम्मेवार कौन है. लेकिन जनता क्या करें. जिनके पास विचार और प्रतिबद्धता है, वो या तो मुख्य मुकाबले से बाहर हैं या फिर एक-दो स्थानों पर ही जीत का दावा कर सिमट जाते हैं.

वे सभी गठबंधन समझौतों के बोझ और अपने ऐसे इतिहास के साथ है, जिससे बदलाव की उम्मीद बेमानी है. फिर भी जनता को तय करना है कि उसके बच्चे स्कूल जाएं, समाज में सांप्रदायिक या सामाजिक विभाजन खत्म हो और दो शाम घर का चूल्हा जल सके.

इसके लिए सक्रिय जन अभिक्रम, सशक्त विपक्ष और गतिशील सत्ता की जरूरत होगी. साथ ही राजनीति में विचार और विमर्श की अहमियत बनाने की दिशा में पहल करने होगी. और राजनीतिक दलों से एजेंडों के प्रति वचनबद्धता लेने का अभियान चला कर सीमित संभावनाओं के बीच ही भविष्य की राह तलाशनी होगी.

ये लेखक के निजी विचार हैं

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