Opinion

कालखंडों का अंतराल और विपक्षी गठबंधन की हार

FAISAL ANURAG

वह भी एक दौर था जब देश भर के अनेक दलों ने एक बड़ा गठबंधन बनाया और भारत के मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि वे इंदिरा गांधी का विकल्प बन सकते हैं और उनकी नीतियों को चुनौती देते हुए अलग आर्थिक नीतियों का एजेंडा पेश किया. इस गठबंधन में जनसंघ, जन संगठन और स्वतंत्र पार्टी की प्रमुख भूमिका थी.

यह 1971 के चुनावों का दौर था. 1967 के चुनाव में गैर कांग्रेसवाद ने उत्तर भारत के सभी बड़े राज्यों में अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया था. उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल जैसे राज्यों में पहली बार कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया गया. लेकिन वे स्थायी विकल्प नहीं बन सके और 1969 में हुए मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस की सत्ता वापसी हो गयी. इंदिरा गांधी 1967 में प्रधानमंत्री बनने के बाद बेहद कमजोर दिख रही थी. उनके पास न तो नेहरू जैसा बहुमत था और न ही नेहरू की तरह वे लोकप्रिय थीं.

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1967 में उन्हें यदि कम्युनिस्टों का समर्थन न मिलता तो सत्ता से बाहर कर दी गयी होतीं. इन्हीं विपरीत परिस्थितियों में इंदिरा गांधी ने अपनी अलग पहचान बनायी. कांग्रेस के दिग्गज नेताओं से नाता तोड़ा और राजनीति में अपनी अहमियत बनाने में सफल हो गयीं. 1971 के चुनाव में उनके पास पाकिस्तान को विभाजित कर देने की सफलता थी और प्रीवी पर्स का खात्मा कर उन्होंने अपनी अमीरी विरोधी छवि बनायी थी.

इसके साथ ही बैंको के नेशनलाइजेशन ने उनकी एक प्रगतिशील छवि के निर्माण में बडी भूमिका निभायी थी. विश्व राजनीति में अमरीका को कई बार चुनौती दे कर इंदिरा गांधी न केवल गुट निरपेक्ष देशों की सर्वमान्य नेता बनी थीं बल्कि समाजवाद के प्रयोग और वैचारिक जीत के वैश्विक दौर में अपनी पहचान उसके दोस्त के रूप में बनाने में कामयाब हुई थीं.

1971 में गठबंधन की ताकतें बुरी तरह हार गयीं थी और इंदिया गांधी भारी बहुमत हासिल करने में सफल हुई थीं. उस समय लोकसभा की सदस्य संख्या 518 होती थी. उसमें लगभग 44 प्रतिशत वोट शेयर के साथ इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 352 सीट पर जीत हासिल की थी.

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2019 के चुनाव में इसे याद करने का अर्थ यह है कि तब के और उसके बाद के घटनाक्रमों के बाद आए भारतीय राजनीति के ट्रेंड को गहराई से विश्लेषित किया जाए. 2019 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी 38 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 543 सदस्यों वाली लोकसभा में 301 सीटों को कब्जे में किया है. भारत की राजनीति में किसी भी गैर-कांग्रेस दल की यह सबसे बड़ी जीत है.

वहीं इस चुनाव ने भारत की राजनीति में उभरे कई नये ट्रेंड भी साफ दिख रहे हैं. 2014 के चुनाव की तुलना में 2019  में कई नयी प्रवृतियों ने दस्तक दी है. नरेंद्र मोदी की इस बड़ी जीत का विश्लेषण लगातार जारी है. नरेंद्र मोदी ने उस दौर में एक ऐसे नेता की छवि बनायी है जो अपने ही दम पर पूरे देश में भाजपा की जीत का कारक है.  1989 के चुनावों के बाद स्थापित कई अवधारणाओं को यह चुनाव ध्वस्त कर चुका है.

मोदी को जहां अपनी इस बड़ी जीत की उम्मदों को बरकरार  रखने की चुनौती है वहीं विपक्ष को अपने अस्तित्व के साथ अपनी राजनीति के बचाव और विस्तार की चुनौतियों से जूझना होगा. यह चुनाव 1971 की तरह ही गठबंधन की ही जीत की गारंटी के मिथक को तोड़ने में कामयाब रहा है. साथ ही सामाजिक शक्तियों की तुलना में उन सामाजिक समूहों को अपने पक्ष में करने में कारगर रहा है जो विपक्ष के विभिन्न राजनीतिक दलों की ताकत के रूप में स्वीकृत है.

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भाजपा ने तो 2014 में भी सोशल इंजीनियरिंग कर ओबीसी, दलित और आदिवासियों को अपने पक्ष में किया है. तब कहा गया था कि इन समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक वोटों के बिखराव के कारण हिंदी पट्टी में भाजपा जीतने में कारगर हुई थी. 2019 के चुनाव की शुरुआत के साथ यह धारणा बन रही थी कि पिछले पांच सालों के अनुभवों के कारण भाजपा को इन तबकों का समर्थन खोना पडेगा.

छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश और राजस्थान विधानसभा के चुनावों में इन ताकतों का भाजपा से लगाव साफ दिखा था. इस बीच भाजपा गठबंधन से कई ऐसी पार्टियां बाहर निकल गयीं थी जिन्हें इन ताकतों का प्रतिनिधि मान लिया गया था. लेकिन भाजपा ने न केवल इस अवधारणा को गलत प्रमाणित किया है बल्कि सामाजिक न्याय के प्रतिनिधि राजनीतिक दलों को भारी नुकसान पहुंचा दिया है.

भाजपा की इस कामयाबी की कहानी न केवल ऐसे क्षेत्रीय दलों के पराभव से विकसित हुई है बलिक उसने कांग्रेस को भी बिल्कुल हतप्रभ कर दिया है. 2014 में कांग्रेस बुरी तरह हारी थी. और 2019 में उस हार की प्रवृति को न केवल बरकार रखा है बल्कि कांग्रेस के गढ़ें में भी भाजपा को मिली जीत बताती है कि कांग्रेस को नये तरीके से सोचना होगा.

चुनाव में सामाजिक न्याय के सहारे राजनीतिक परचम लहराने वाले दलों की पराजय के बावजूद यह निष्कर्ष सही नही है कि वे सवाल खत्म हो गये हैं, जिसे लोहिया और अंबेडकरवादी दल उठाते रहे हैं. बिहार में राजद की करारी हार और यूपी में गठबंधन की एक तरह की विफलता बताती है कि उन दलों को जरूर जनता ने इस बार नकारा है.

बावजूद इसके उन सवालों को नजरअंदाज करना देश और लोकतंत्र के लिए घातक ही होगा जो सामाजिक अन्याय को दूर करने की मांग करता रहा है. इस सवाल की प्रासंगिकता पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक है. 1971 की भारी जीत को 1977 में एक और गठबंधन ने, जिसने बाद में जनता दल का आकार लिया, जीत हासिल की. इस इतिहास को विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए.

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