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21 वीं सदी के भारत में काम नहीं कर सकती बूस्टर डोज

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Rajesh Das

India has always aped the west after the British left the country. We thought that Industrialisation will solve all our worries post independence but it couldn’t. The Government has experimented with innumerable development models but the results are far from satisfactory.

There can not be any decision more insane than giving booster dosage to automobiles & its allied industries. The Government does more harm than good by making such a move that will actually put the country down in the economic ladder.

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काश देश के अर्थशास्त्री समझ पाते कि जो गलतियां पश्चिम के देशों ने 50 वर्ष पूर्व किये हैं, भारत अब उन्हीं गलतियों को दुहरा रहा है. अगर भारत में 18वीं सदी में औद्योगीकरण हुआ होता तो शायद यह बेहद सफल भी होता, लेकिन नीति निर्माता इस बात को ना तब समझे थे और ना ही अब समझ सके हैं.

उन्होंने आजादी के बाद कृषि को औद्योगीकरण के मुकाबले बहुत कम तवज्जो दी, नतीजा हम सबके सामने है. और ये गलती इतनी बड़ी थी कि इसे अब बदला भी नहीं जा सकता.

उसी प्रकार जब दुनिया के बड़े देश निजी कारों की अवधारणा से दूर भाग रहे हैं, तो भारत फिर से उन्हीं गलतियों को दुहरा रहा है. भारत का भविष्य शेयर मोबिलिटी में है, साइकिल में है, वाकेबल शहरों में है, तो फिर सरकार इस बात को क्यों नहीं समझ रही है.

सरकार शायद डर भी रही है, और उनके द्वारा इस प्रकार के लिये गये निर्णय, उनके देश की इकोनॉमी को लेकर भयभीत होने का एक संदेश भी देता है. अगर सरकार दूरदर्शी नजरिये से सोचने के काबिल हो तो उन्हें यह सोचना चाहिए कि आज तो वे ऑटो इंडस्ट्री को बूस्टर डोज दे देंगे मगर कल क्या करेंगे जब इलेक्ट्रिक गाड़ियां सड़कों पर उतरेंगी. क्या मेकेनिकल पुर्जे बनाने वाली उनकी सहायक कंपनियां और उन्हें बेचने वाले बच सकेंगे, क्या आज के दौर के गाड़ियों की मरम्मत करने वाले गरीब और मेहनतकश मजदूर बच सकेंगे?

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इन सब सवालों से बड़ा मुद्दा यह भी हैं कि क्या सरकार गलत वादे भी करती है, कि जब उनके मंत्री माननीय श्री नितिन गड़करी जी ने 2015 में ब्रजिलिया में यह वादा किया था कि वर्ष 2020 तक वे सड़क दुर्घटना से हो रही मौतों की संख्या को आधा कर देंगे, तो क्या इन्हीं आर्थिक उपायों और ऑटोमोबाइल केंद्रित नजरिये से इसे पूरा किया जायेगा. शायद भारत की वित्त मंत्री माननीय श्रीमती निर्मला सीतारमन जी को गड़करी जी को इस वादे का पता ना हो.

दूसरा जरूरी मुद्दा यह भी है कि भाजपा की सरकार ने अपने संकल्प पत्र में राष्ट्रीय शहरी मोबिलिटी मिशन बनाने की बात कही थी किंतु बजट में इसका कोई साफ जिक्र नहीं था, तो क्या हम यह मान लें कि वर्तमान सरकार पब्लिक ट्रांसपोर्ट या शेयर मोबिलिटी को लेकर उतनी गंभीर नहीं है जितना गंभीर वो ऑटो सेक्टर को बूस्टर डोज देने के लिए हैं.

सरकार अगर बूस्टर डोज देना ही चाहती है तो उन्हें पैराडाईम शिफ्ट करना होगा जहां ऑटो इंडस्ट्री के प्रति अपने स्वभाविक आकर्षण को त्यागकर, उन्हें लोगों को केंद्र में रखकर नीतियां बनानी होंगी जो स्थायी भी होंगी और ज्यादा टिकाऊ भी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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