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कंबल घोटालाः #IAS मंजूनाथ भजंत्री ने जब कार्रवाई शुरू की तो रघुवर सरकार ने उन्हें परेशान कर तबादला कर दिया

Akshay Kumar Jha

Ranchi: सिमडेगा डीसी रहे मंजूनाथ भजंत्री का तबादला सरकार की तरफ से झारक्राफ्ट के एमडी पद पर हुआ. उस वक्त सरकार को यह नहीं पता था कि यही मंजूनाथ भजंत्री एक दिन सरकार के लिए बड़ी सिरदर्द बननेवाले हैं. इससे पहले पूरे झारक्राफ्ट पर तत्कालीन सीईओ रेणु गोपीनाथ पणिक्कर का अघोषित अधिकार था.

उनके इशारे पर ही झारक्राफ्ट का एक भी पत्ता सरक पाता था. युवा आइएएस मंजूनाथ भजंत्री ने जब कार्यालय आना शुरू किया तो उन्हें यहां चल रही चीजों के बारे में पता चलना शुरू हुआ. उन्हें इस बात का इल्म हुआ कि उन्हें यहां बस एक मुहर की तरफ इस्तेमाल होना है. जो करना है वो रघुवर सरकार की कृपापात्र रेणु गोपीनाथ पणिक्कर करेंगी.

एजी कार्यालय ऑडिट में मशगूल था. झारक्राफ्ट का माहौल देख कर अंदर ही अंदर घुटनेवाले आइएएस अफसर मंजूनाथ भजंत्री को अचानक एक मौका मिला. महालेखाकार (एजी) की ऑडिट झारक्राफ्ट में चल रही थी. कंबल बनाने से लेकर कंबल बांटने तक के एक के बाद एक आपत्तियों की चिट्ठी मंजूनाथ भजंत्री के टेबल पर अपना रास्ता बनाने लगी. फिर क्या था. आपत्तियों का जवाब झारक्राफ्ट के लिए सिरदर्द बनता जा रहा था.

सीईओ रेणु गोपीनाथ पणिक्कर परेशानी में पड़ गयीं. आखिर वो इनका जवाब दें भी तो कैसे. इसी बीच एमडी मंजूनाथ भजंत्री ने धीरे-धीरे अपनी शक्तियों का इस्तेमाल शुरू किया. लेकिन मंजूनाथ भजंत्री रांची के लिए नये थे. यहां की ब्यूरोक्रेसी के लिए भी नये थे.

उन्होंने कुछ काबिल और सीनियर अधिकारियों से इस मामले पर बात करनी शुरू की. सरकार में दूसरे नंबर के अधिकारी से मुलाकात कर क्या करना चाहिए पूछा. वो सही दिशा में आगे बढ़ने लगे.

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सीईओ का पावर सीज किया तो इनकी कुर्सी ही बदल दी

घोटाले का पर्दाफाश हो. आरोपियों पर कार्रवाई हो. इस दिशा में आइएएस मंजूनाथ भजंत्री आगे तो बढ़ने लगे, लेकिन वो यह नहीं जान रहे थे कि इस बात की कीमत उन्हें अपनी कुर्सी ही नहीं बल्कि राज्य छोड़ कर चुकानी पड़ेगी.

मंजूनाथ भजंत्री ने सीईओ रेणु गोपीनाथ पर नकेल कसनी शुरू कर दी. इस बीच बात मीडिया में आ गयी. यह साबित होने लगा कि रेणु गोपीनाथ को सरकार का वरदहस्त है. इसलिए झारक्राफ्ट में उनकी तूती बोलती थी.

ऊंगली शीर्ष नेतृत्व पर उठने लगी. फिर क्या था. रेणु गोपीनाथ के न चाहते हुए भी उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. ऐसे में भला अब मंजूनाथ भजंत्री कैसे बच सकते थे. वो सीधा सरकार के निशाने पर थे. सरकार के सबसे पावरफुल कमरे में उन्हें शीर्ष नेतृत्व की तरफ से कहा भी गया. जब कंबल गरीबों के बीच बंटा है, तो फिर घोटाला कैसा. इसलिए जाने दिया जाये. एक सीनियर आइएएस अधिकारी ने मंजूनाथ भजंत्री को धमकी भरे लफ्जों में भी चेताया. लेकिन वो नहीं माने.

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पहले उद्योग विभाग फिर कृषि विभाग के लगे चक्कर

सिमडेगा डीसी फिर झारक्राफ्ट का एमडी अब अचानक से एक साधारण अधिकारी बन कर उद्योग विभाग पहुंच गया. बतौर संयुक्त सचिव काम करने लगा. फिर कुछ ही दिनों में कृषि विभाग भी पहुंचा दिया गया. सरकार की बात न मानने की खामियाजा पूरी तरह से भुगत रहे थे.

फिर एक बार किसी केस को लेकर उन्हें राज्य के महाधिवक्ता से पास जाना पड़ गया. बताया जाता है कि बंद कमरे में महाधिवक्ता और उनके बीच काफी गरमा-गरमी हुई. दरअसल महाधिवक्ता की कोई बात वो पचा नहीं पाये. रिएक्ट करना ही पड़ा. पहले से तनाव में चले रहे इस आइएएस अधिकारी के पास अब खोने को कुछ नहीं था. सो इन्होंने राज्य ही छोड़ना मुनासिब समझा.

इसे बदकिस्मती ही कहेंगे कि आज मंजूनाथ भजंत्री जैसे साफ छवि के अधिकारी राज्य में नहीं हैं. वो नीति आयोग में काम कर रहे हैं. इधर, सरकार चली गयी. जांच में साबित हुआ कि कंबल घोटाला हुआ है. अब नये सरकार की बारी है. देखना दिलचस्प होगा कि घोटाले को संरक्षण देनेवालों के साथ नयी सरकार क्या करती है.

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