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‘राष्ट्रवादी’ एजेंडों के सहारे राज्यों में चुनाव जीतने की भाजपा की कवायद अब विफल साबित हो रही है

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Faisal  Anurag

हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में भाजपा के राष्ट्रवादी और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के तमाम प्रयास भी उसे बहुमत नहीं दिला सके. झारखंड चुनाव की शुरूआत होते ही भाजपा नेताओं ने ध्रुवीकरण के प्रयास शुरू कर दिये हैं. गोड्डा से सांसद निशिकांत दूबे के बयान से यह जाहिर हो रहा है.

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विकास के तमाम दावों के बावजूद भाजपा को पूरा भरोसा नहीं है कि सिर्फ उसी के सहारे वह 2014 के चुनाव परिणाम भी दोहराने में कामयाब होगी. निशिकांत दूबे ने आरक्षण की सुविधा से उन आदिवासियों के तबके को वंचित करने की मांग दोहरायी है, जिन्होंने धर्म बदल लिया है.

इसी के साथ भाजपा एनआरसी के मुद्दे को चुनावों में इस्तेमाल करती नजर आ रही है. साथ ही अमित शाह ने झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनाव का शंखनाद करते हुए राम मंदिर का जिक्र जोरदार तरीके से किया. इससे जाहिर होता है कि शाह को झारखंड के जमीनी मुद्दों से अधिक राम मंदिर के मुद्दे पर अधिक भरोसा है. और इसी के सहारे भाजपा यहां के वोट बैंक को आकर्षित कर सकती है.

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Vision House 17/01/2020

गृहमंत्री अमित शाह ने पूरे देश में एनआरसी लागू करने की बात कही है. आरएसएस ने इस सवाल पर नागरिकों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाने की बात कही है. आरएसएस एनआरसी के माध्यम से हिंदुओं के साथ हुए ऐतिहासिक भेदभाव को सुधारने का अवसर है.

आरएसएस मानता है कि आजादी के बाद खास कर 1971 इस तरह के भेदभाव हुए है. अमित शाह ने तो कहा है कि एनआरसी के कारण किसी धर्म के व्यक्ति को डरने की जरूरत नहीं है. लेकिन राज्यसभा में उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने स्वीकार किया है कि धार्मिक उत्पीड़न के कारण पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांगलादेश से आने वाले हिंदुओ, बौद्धों, जैनों, ईसाइयों, पारसियों और सिखों को भारतीय नागरिकता दी जायेगी.

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ऊपरी तौर पर तो इस बयान को ले कर भाजपा जो कहना चाहती है, वह स्पष्ट नहीं है. लेकिन इसके निहितार्थ को ले कर भारत के अनेक समुदायों का आशंकित होना लाजमी है. असम के अनुभव ओर पूर्व की बेचैनी के बाद भी ऐसा जान पड़ता है कि भाजपा इसे चुनावी नजरिये अहम मान रही है.

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देश की आर्थिक विकास गति के लगातार गिरने और उसके संकटग्रस्त हाने के काले बादलों के बीच भाजपा का इस मामले पर लगातार जोर देना सामान्य परिघटना तो नहीं है. एनआरसी को ले कर अमरीका सहित कई देशों के नागरिक अधिकारों के संगठनों की आशंकाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

झारखंड में भाजपा ने धर्म परिवर्तन कानून के माध्यम से आदिवासी समुदाय के भीतर अपने वोट आधार को मजबूत करने का प्रयास किया है. इससे उसे कितना लाभ होगा, यह तो चुनाव परिणाम के बाद ही कहा जा सकता है.

लोकसभा चुनाव में देखा गया कि आदिवासी इलकों में भाजपा की सफलता और वोट हासिल करने के मामले में वह गति नहीं रही जो उसे गैर आदिवासी इलाकों में हासिल हुआ है. भाजपा ने आदिवासी सुरक्षित जिन पांच सीटों में से तीन पर जीत हासिल की है, उसमें भी जीत का अंतर बहुत ज्यादा नहीं है. आदिवासी समुदायों के भीतर धर्म परिवर्तन कानून का बहुत असर लोकसभा चुनाव में नहीं दिखा है.

पिछले पांच सालों में आदिवासी इलाकों के लोगों का आक्रोश विभिन्न रूपों में उभर कर सामने आता रहा है.  आदिवासियों के आंदोलन का ही असर था कि रघुवर दास सरकार को सीएनटी और एसपीटी कानून में संशोधन को वापस लेना पड़ा था. इसके साथ ही आदिवासियों ने विभिन्न तरीकों से सरकार की नीतियों के खिलाफ अपने गुस्से और नारजगी का इजहार किया है.

यह एक गंभीर चुनौती है. जो भाजपा के लिए परेशानी का बड़ा सबब है. आदिवासियों के लिए 28 विधानसभा सीट सुरक्षित हैं.

सरकार के विकास संबंधी दावों के बावजूद रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल पर लोग संतुष्ट नहीं हैं. बेरोजगारी बेहद गंभीर दौर में है. मनरेगा जैसी योजनाओं को ले कर भी ग्रामीण इलाकों में कई तरह की चर्चा है. अभी तक तो राजनीतिक दलों के चुनाव अभियान में झारखंड की इन समस्याओं के निदान का ब्लूप्रिंट नहीं दिख रहा है.

भाजपा भी यह नहीं बता पा रही है इन तबकों की उन्नति के लिए उसने क्या किया है. हालांकि प्रचार सामग्रियों में जो दावे किये गये हैं, जमीनी हकीकत इससे बहुत अलग है.

पिछले अनेक चुनावों से यह देखा जा रहा है कि भावनातमक मुददे वोटरों की नारजगी पर हावी हो जाते हैं. लोकसभा चुनाव में तो इसी के कारण भाजपा 2014 की कामयाबी को दोहराने में सफल रही. और उसने अपने वोट प्रतिशत में भारी इजाफा किया.

लेकिन हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम बताते हैं कि लोकसभा चुनाव के वोट शेयर को भाजपा बचा नहीं पायी. यहां तक कि 2014 के चुनाव में विधानसभा में हासिल वोट प्रतिशत ओर सीट ही बचा पायी. झारखंड में एक तरफ भाजपा को लोकसभा चुनाव में हासिल वोट शेयर को बचाने की बड़ी चुनौती है, तो विपक्ष को इस वोट शेयर में सेंध लगाने की.

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Mayfair 2-1-2020

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