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सहयोगी दलों के साथ छोड़ने से भाजपा के रणनीतिकार हैं चिंतित

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Faisal Anurag

भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक तनाव लगातार बढता जा रहा है. उसके सहयोगी दलों ने जिस तेज गति से पार्टी का साथ छोड़ना शरू किया है, उससे भाजपा के रणनीतिकार चिंतित हैं. भारतीय जनता पार्टी को नए सहयोगी दल नहीं मिल रहे हैं. एनडीए के अनेक घटक दलों ने इशारा करना शुरू कर दिया है कि अगले चुनाव में उनका रास्ता अलग होगा. रालोसपा के अलग होने के बाद अब बारी लोजपा की लग रही है. चिराग पासवान और पशुपतिनाथ पारस के बयानों का संदेश यही है कि उनकी पार्टी एनडीए में सुकून से नहीं है और अपना भविष्य उन्हें धूमिल लग रहा है.
रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह छोटे दलों का अस्तित्व खत्म करने पर तुली हुयी है. उत्तरप्रदेश में मंत्री राजभर कुशवाहा लगातार भाजपा और मोदी-योगी सरकार के खिलाफ तल्ख टिप्पणी कर रहे हैं. वे संदेश दे रहे हैं कि उनकी पार्टी ज्यादा दिनों के लिए एनडीए के साथ नहीं हैं. उनका इरादा यह है कि एनडीए उन्हें बाहर कर दे. इसके लिए वे लगातार बयान दे रहे हैं.
इसी तरह शिवसेना भी अपनी नाराजगी लगातार जाहिर कर रही है. उसने संदेश दे भी दिया है कि अगला चुनाव वह अलग रणनीति के साथ लड़ेगी, इसमें उसने अकेले चुनाव में जाने का विकल्प भी रखा है. शिवसेना के प्रवक्ता लगातार राहुल गांधी की प्रशंसा कर रहे हैं. इससे भाजपा का नेतृत्व परेशान है. शिवसेना और भाजपा का रिश्ता एक ऐसे मुकाम की ओर जा रहा है जहां दोनों के लिए साथ चलना मुश्किल दिख रहा है. रामविलास पासवान के पु़त्र चिराग पासवान ने न केवल अपने असंतोष को जाहिर किया है बल्कि राहुल गांधी की खुलकर प्रशंसा भी कर रहे हैं. भाजपा की परेशानी यह है कि उसने 2014 में उन तमाम दलों का साथ लिया था और अपनी साख को बढ़ाया था, लेकिन कुछ सहयोगियों के अलग होने और कुछ के तेवर से उसे नए सहयोगी की तलाश में परेशानी हो रही है.
हिंदी इलाकों के वोटरों के रूझान में आये बदलाव के बाद भाजपा की चिंता अपने गठबंधन को बचाए रखने की भी है क्योंकि उसे अगली बार अकेले बहुमत में आने का भरोसा नहीं है. दलित नेता रामदास अठावले ने भी व्यंग्य करना शुरू कर दिया है. भाजपा से दलितों की नाराजगी का उन्हें अहसास होने लगा है. तीन राज्यों के चुनाव परिणाम भी संकेत कर रहे हैं कि दलित और आदिवासी वोटरों में भाजपा को लेकर जबरदस्त नाराजगी है. देश के दूसरे राज्यों में भी वंचित तबके भाजपा से खासे नाराज हैं. किसान और मजदूरों की नारजगी राजनीतिक दलों के ध्रुवीकरण की नयी प्रक्रिया का कारण बना हुआ है और भाजपा के लिए असहज स्थिति बन रही है. जिन राज्यों के चुनावों ने कई मिथक मरोड़ दिए हैं. इसमें मोदी शाह की जोड़ी के अपारजेय होने का मिथ भी शामिल है.
इसके साथ यह भी राजनीतिक हलकों में महसूस किया जा रहा है कि मोदी 2014 की तरह वोटरों पर प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे हैं. राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यपद्रेश में मोदी की जहां जो भी सभा हुयी थी, उसमें भाजपा का स्ट्राइक रेट 20 प्रतिशत भी नहीं है. इससे भाजपा में भी शाह और मोदी के खिलाफ आवाज उठने लगी है. महाराष्ट्र के आरएसएस से जुड़े एक किसान संगठन ने मांग की है कि भाजपा नेतृत्व में बदलाव किया जाए. इससे भाजपा के रणनीतिकार दबाव में हैं. बिहार में भाजपा के सहयोगी दल रालोसपा का अलग होना एक बड़ा मनोवैज्ञानिक असर डालने वाली परिघटना है और लोजपा के संकेत बिहार के वोट समीकरण को प्रभावित कर रहे हैं. बिहार में जनता दल यू और भाजपा गठबंधन का दम चुनावी कामयाबी के नजरिए से बहुत कारगर होगा, इसपर भाजपा के रणनीतिकारों को ही भरोसा नहीं है.
आंध्रप्रदेश में तेलगू देशम ने एनडीए से अलग होकर देशभर में एक कारगर भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने के लिए अपनी पहल को तेज कर दिया है और दक्षिण भारत भाजपा विरोधी उन तमाम ताकतों को एकजुट करने के प्रयास में लगा हुआ है. भारत की राजनीति उस दौर से गुजर रही है जहां केवल एक दल की सरकार की संभावना बहुत कम होती जा रही है. खासकर देश के दो बड़े दलों कांग्रेस और भाजपा के लिए यह कहा जा सकता था कि किन्हीं राज्यों में उनकी अकेल दम पर भले ही सरकार बन जाए, लेकिन केंद्र में बिना मजबूत गठबंधन के उनकी चुनावी कामयाबी संभव शायद ही हो. इसलिए भाजपा अपने गठबंधन को और टूट से बचाने की दिशा में पहल कर रही है.

लेकिन बिहार में उसके लिए जदयू को किसी भी सूरत में नाराज करना खतरनाक लग रहा है. जदयू बिहार में बड़े भाई की पूरी भूमिका निभाने के लिए लगातार दबाव बना रही है. अहंकार में रालोसपा का अलगाव भले ही छोटा दिख रहा है, लेकिन राजनीति के जानकार समझते हैं कि उनके विधायकों, सांसदों का एनडीए में बने रहने के बाद भी जमीनी वोट प्रभाव के क्षरण को रोकना आसान नहीं है. अब पक्ष इस तथ्य की भी तलाश कर रहे हैं कि आखिर वह कौन से कारण हैं, जिसके चलेते भाजपा के घटक दल लगातार उनका साथ छोड़ रहे हैं और जो साथ हैं भी वे आंख तरेरने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं.

2014 में एनडीए की मजबूती का कारण देश में बना कांग्रेस विरोधी माहौल था, जो 2012 के बाद से लगातार तैयार हो रहा था. इस क्रम में यूपीए के वे कार्य भी गौण हो गए, जो आमजनों के हित में थे और अब भी जो देश में एक बड़ा दखल रखते हैं. अब हालात भाजपा विरोधी बनता जा रहा है. भाजपा के 2014 के वायदे लोग भूल नहीं पाए हैं और वे ही भाजपा के गठबंधन दलों के विलगाव के पीछे बड़ी भूमिका निभा रहे हैं.
 (लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं)

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