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भाजपा ना सिर्फ खुलकर कर रही सेलेक्टिव राजनीति बल्कि बना रही इसका माहौल

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न्यायालय के फैसलों को जिस तरह चुनौती दी जा रही है वह लोककंत्र के लिए घातक है. न्याय तथ्यों के आधार पर होता है, लेकिन उसे आस्था का सवाल बनाने की पूरी कोशिश भारत के वैज्ञानिक और लोकतांत्रिक चेतना के लिए भी एक गंभीर चुनौती है. यह चुनौती सत्तारूढ़ दल और उसकी अनुशंगी इकाइयां दे रही हैं. भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने केरल में कहा कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसा आदेश नहीं देना चाहिए, जो लोगों की आस्था के खिलाफ हो और जिसे लोग माने ही नहीं. आजादी के बाद पहली बार सत्तारूढ़ दल का कोई अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के बारे में ऐसी टिप्पणी कर रहा है और आस्था के नाम पर स्त्री विरोधी मानसिकता का समर्थन कर रहा है. इमरजेंसी  के जमाने में भी इस तरह की टिप्पणी करने का साहस किसी भी दल के नेता में नहीं था.

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यहां तक कि उस जमाने में अदालतों की स्वायत्त प्रभावित करने की सीमित कोशिशों के बीच अदालतों ने अपनी गरिमा को नष्ट नहीं होने दिया. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जब इंदिरा गांधी के खिलाफ दायर चुनाव याचिका को सही कहा और उन्हें दोषी करार दिया था. तब इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट को प्रभावित करने का प्रयास किया था और इसकी जबरदस्त आलोचना हुई थी.

बाद में इंदिरा गांधी ने जजों की वरीयता को नजरअंदाज कर एक कनीय जज को सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया था. इसके विरोध में तीन जजों ने इस्तीफा दे दिया था और अदालतों की गरिमा लोकतांत्रिक आंदोलन का हिस्सा बना था. लेकिन, उस एक घटना के बाद अदालतों को प्रभावित करने की प्रक्रिया में सत्तारूढ़ दल को कामयाबी नहीं के बराबर ही मिली थी.

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इमरजेंसी के बाद भारत की अदालतों ने लोकतंत्र की हिफाजत के एक प्रमुख घटक के रूप में अपनी भूमिका का निर्वाह किया और माना गया कि ज्यादतर मामलों में अदालतों की स्वतंत्रता बरकार रही. अदालतों के फैसलों को सड़कों से तब भी चुनौती नहीं दिया गया था. भारतीय जनता पार्टी महिला हितों के पक्ष में बोलती रही है. खासकर प्रधानमंत्री मुस्लिम महिलाओं की गरिमा को लेकर अक्सर बात करते रहते हैं.

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भाजपा ने हाजी दरगाह में महिलाओं के प्रवेश के अदालती आदेश के पक्ष में जोरदार बातें कीं, लेकिन केरल के सबरीमाला मामले में भाजपा अध्यक्ष ने पूरी राजनीतिक प्रक्रिया को न केवल सांप्रदायिक बनाने का प्रयास किया, बल्कि एक ओर तो अदालत को ही चुनौती दे दी, दूसरी ओर भारत के फेडरल ढांचे में राज्य सरकार के कामकाज को प्रभावित करने का प्रयास किया. केरल सरकार को बर्खास्त करने की धमकी देकर अमित शाह ने अपने इरादे को सार्वजनिक किया. इसका मतलब निकाला गया कि भाजपा विरोधी दलों की सरकारों को स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करने देना चाहती और उस पर केंद्रीय सत्ता की एक तलवार लटकाए रखना चाहती है.

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यह पूरी घटना इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि 2019 के चुनावों का समय बिल्कुल नजदीक है और भाजपा अपना यह इरादा साफ कर रही है कि वह धर्म विशेष के ध्रुवीकरण को ही अब जीत का सहारा मान रही है. अमित शाह केरल में अपनी ताकत के विस्तार के साथ हिंदी पट्टी में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज कर रहे हैं.

इस घटना के बाद बाबरी मस्जिद राम भूमि के मालिकाने के विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के तीन माह बाद सुनवाई के फैसले के बाद जिस तरह आरएसएस, भाजपा और उसकी अनुश्रंगी इकाइयों ने प्रक्रिया दी है वह गंभीर मामला है. केंद्र के एक मंत्री तो खुलेआम धमकी दे रहे हैं. केंद्र पर अध्यादेश लाने का दबाव बढाया जा रहा है. आरएसएस प्रमुख पहले ही कह चुके हैं कि इस मामले में केंद्र कानून बनाकर मंदिर बनाने का रास्ता प्रश्स्त करें. केंद्र सरकार की ओर से हालांकि इसपर कोई टिप्पणी नहीं आयी है, लेकिन भाजपा प्रवक्ताओं ने आरएसएस प्रमुख की बातों का समर्थन कर साफ कर दिया है कि आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच इसपर ठन सकती है. भाजपा के तमाम घटक मान रहे हैं कि केवल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही 2019 में भाजपा की संभावना को पुश्ट कर सकते हैं. इन्हें साफ लग रहा है कि भारतीय मतदाताओं के बड़े तबके में केंद्र सरकार को लेकर नाराजगी है और उन्हें ध्रुवीकृत करके ही भाजपा को वोट देने के लिए तैयार किया जा सकता है. भाजपा के सामने इस संदर्भ में एक और सवाल उठा है कि जब तीन तलाक के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया तो भाजपा ने उसे अपनी कामयाबी के बतौर पेश किया, लेकिन सबरीमाला के सवाल पर उसका रूख बदल गया. इससे जाहिर होता है कि भाजपा सेलेक्टिव राजनीति न केवल खुल कर रही है बल्कि वह इसके लिए माहौल भी बना रही है. भाजपा इसे लोकसभा चुनाव के लिए तैयारी के रूप में इस्तेमाल कर रही है. मुद्दा यह है कि क्या केवल चुनाव के लिए अदालतों को इस तरह नजरअंदाज करना जायज है. इससे जो संदेश निकलता है, उससे भविष्य के बेहद अंधकारमय होने का अंदेशा भी उभर रहा है.

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