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बीजेपी फिर जातियों का व्यापक गठबंधन बनाने के लिए है प्रयासरत

1989 के बाद से भी अब तक के सभी चुनावों में जाति का गठबंधन ही विभिन्न राजनीतिक समीकरणों के माध्यम से व्यक्त होता रहा है.

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Faisal Anurag

जति वह हकीकत है, जो भारत के हर चुनाव में अहम हो जाती है. भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर जहां जातियों का व्यापक गठबंधन बनाने के लिए प्रयासरत है, वहीं विपक्षी दलों के गठबंधनों ने कई चुनावी समीकरण को प्रभावित किया है. 1989 के बाद से भी अब तक के सभी चुनावों में जाति का गठबंधन ही विभिन्न राजनीतिक समीकरणों के माध्यम से व्यक्त होता रहा है. 2014 में उत्तरप्रदेश और बिहार के गैर-सवर्ण जातियों के बीच बड़ी सेंध डाला था. भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग का एक ऐसा प्रयोग किया जिसमें मंडलोत्तर राजनीति में व्यापक बदलाव नजर आया.

2019 के चुनाव के पहले सामाजिक समीकरण का भाजपा सूत्र दरकता नजर आ रहा है. उत्तर प्रदेश और बिहार में जहां भाजपा के अनेक सहयोगियों के अलग होने या विरोध से जाहिर होता है कि नए सामाजिक राजनीतिक समीकरण आकार ग्रहण कर रहे हैं. मंडलवादी राजनीति एक नया आकार ग्रहण करती दिख रही है. इससे जातिगत ध्रुवीकरण के तेज होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. उत्तरप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच हुए गठबंधन की तपिश राजनीतिक गलियारों में महसूस की जा रही है. भारतीय जनता पार्टी की कार्यसमिति की बैठक पर इस गठबंधन का असर साफ दिखा.

भाजपा ने 2014 के चुनाव में गैर यादव, गैर जाट पिछड़ों और दलितों के एक बड़े तबके को अपनी तरफ आकर्षित किया था. और उस चुनाव में 43 प्रतिशत वोट हासिल कर 73 सीटों पर जीत हासिल किया था. बसपा और सपा को भी लगभग इतना ही वोट उस चुनाव में मिला था, लेकिन सपा मात्र 5 सीटें ही जीत पायी थी, जबकि बसपा का खाता भी नहीं खुला था. 2014 में कांग्रेस विरोधी लहर था और मोदी ने अपने को पिछडी जाति का घोषित कर पिछड़ों के गैर यादव जातियों में दखल दिया था. 2019 में एक ओर जहां 14 की तरह का लहर नहीं है, वहीं मोदी की छवि भी दलितों और पिछड़ों  में अगड़ा समर्थक होने की बनी है. चुनावी वायदों को पूरा नहीं करने के कारण सत्ता विरोधी रूझान भी है और भाजपा के रणनीतिकार इसे समझ रहे हैं.

सवर्ण आरक्षण का समर्थन बसपा और सपा ने भी किया है, लेकिन गैर सवणों के एक बड़े तबके में आरक्षण को इस तरह की प्रक्रिया से खत्म करने की दिशा में उठाया गया कदम भी समझा जा रहा है. इसकी अभिव्यक्ति सोशल मीडिया पर खुलकर की जा रही है. गरीबी की जो अधिकतम आर्थिक सीमा आठ लाख सालाना आय का मुद्दा गहरा रहा है. पिछड़ों के क्रीमीलेयर का आर्थिक आधार तो तय है, उसे  उठाकर अनेक पिछड़ों के विचारक जाति जनगणना कर रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं, ताकि आरक्षण की पूरी अवधारणा को एक बार फिर से बहस में लाया जाए. आरक्षण गरीबी उन्मूल का कोई कार्यक्रम नहीं रहा है. इसे प्रतिनिधत्व का वह आधार बताया गया है, जो सदियों से वंचना के शिकार जातियों और समूहों, जो कालक्रम में शैक्षणिक रूप से पिछड़ गए हैं, को विशष अवसर प्रदान करता है. अमेरिका जैसे देशों ने भी अफरमंटिव एक्शन के माध्यम से अपने देशों के वंचितों और उत्पीड़ितों को विशेष अवसर दिया है.

भारत की चुनावी राजनीति में यह सवाल सामाजिक धरातल पर निर्णायक भूमिका निभाता रहा है. यूपी का गठबंधन यह संकेत दे रहा है कि वह गैर-यादव और गैर-जाट, पिछड़ों और दलित जातियों को एक व्यापक सत्ता हिस्सेदारी देने के लिए बना है. गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों में जमीन पर एक गठबंधन की सामाजिक एकता ने वोटों के बिखराव को न केवल रोका, बल्कि अपने वोट आधार को व्यापक किया. आदित्यनाथ और केशव मौर्य के गृह क्षेत्र में भाजपा की पराजय से जो राजनीतिक संदेश उभरा था, वह इस गठबंधन की पूर्वपीठिका और सामाजिक आधार के रूप में दिख रहा है.

हिंदी पट्टी के तीन राज्यों हुए विधानसभा चुनावों में भी यह साफ दिखा है कि भाजपा के वोट आधार से इन समूहों का मोह भंग हुआ है और वे भाजपा विरोधी खेमे में मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज   करायी है. लोकसभा की पूर्वाग्रह पीठिका से उभरे सामाजिक समूहों के इस असंतोष ने भाजपा के रणनीतिकारों में हड़कंप मचा दिया और सवर्ण आरक्षण की त्वरित कार्रवाई बताती है कि भाजपा अपने सवर्ण आधार को एकजुट करने के लिए उद्धत है. लेकिन यूपी के चुनावी समीकरण में कांग्रेस को शामिल नहीं कर सपा-बसपा ने साफ कर दिया है कि वह अपने कोर वोट आधार पर ही चुनावी जीत के लिए तत्पर हैं और वह उन नाराज वोटरों को भी आकर्षित करने की कोशिश करेगा, जो सरकार की नीतियों से नाराज हैं.

मुस्लिम वोट के बीच कांग्रेस को अलग किए जाने की पहली प्रतिक्रिया सकारात्मक नहीं हुयी है. मुस्लिमों के संगठन कह रहे हैं कि वे पर्याप्त मुस्लिम प्रतिनिधत्व के साथ ही भाजपा को हराने वाले विश्वसनीय गठबंधन की जरूरत है. कांग्रेस के वोट आधार की उपेक्षा को इस गठबंधन के लिए एक बड़ी कमजोरी के रूप में भी देखा जा रहा है. इसके साथ ही लोक दल और पीस पार्टी के साथ एक दो छोटे दलों को विश्वास में नहीं लिए जाने के सवाल का सामना भी सपा और बसपा को करना पड़ रहा है. इस गठबंधन का असर देश के दूसरे राज्यों में होने वाले संभावित गठबंधन को कौन सा आकार देगा, इसपर भी चर्चा जोरों पर है. भाजपा के लिए उहापोह की यह राजनीतिक हालत राहत दे सकती है, जनता दल के नेता तेजस्वी यादव की लखनऊउ यात्रा को लेकर बिहार के गठबंधन के आकार की भी चर्चा होने लगी है. राजद बिहार में बड़ी भूमिका निभाने की बात कर रहा है. लेकिन यूपी और बिहार में एक बड़ा फर्क भी है. एक बात तो साफ हो गयी है कि चुनाव के पहले कई तरह के गठबंधन भिन्न राज्यों में बनेंगे और भाजपा चाहती भी यही है. भाजपा चुनाव में सीधा टकराव  से बचना चाहती है और अनेक गठबंधन बहुकोणीय टकराव ही संकेत है. जातिगत समीकरण के अहम होने के बाद भी इस तरह के चुनावी संघर्ष जाति आकांक्षाओं को कितना पूरा कर सकेगा, यह भविष्य ही तय करेगा.

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