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गठबंधन के नाम पर भाजपा ले रही है नहीं लेने वाले फैसले

FAISAL ANURAG

भारतीय जनता पार्टी का आत्मविश्वास डगमगाया हुआ है. गठबंधन साधने के नाम पर भाजपा जिस तरह के  कदम उठा रही है, उससे जाहिर होता है कि भाजपा लोकसभा चुनाव में अपनी जीत को लेकर सशंकित है. पाकिस्तान पर एयर स्ट्राइक के बाद भाजपा ने जिस तरह इस घटना का राजनीतिकरण किया, उससे लगा कि भाजपा चुनावी वायदों के बोझ से डरी हुई है. और उन सवालों को विमर्श से बाहर रखना चाहती है. यदि प्रधानमंत्री के भाषणों को देखा जाए तो पुलवामा के बाद इन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल को अपने चुनावी फायदे की ओर करने का भरपूर प्रयास किया है. यहां तक कि 21 विपक्षी दलों को साझा बयान जारी कर कहना पड़ा कि सेना और शहीदों को राजनीतिक मुद्दा बनाने से भाजपा परहेज करे. इसके बाद मोदी ने विपक्ष पर हमला यह कहते हुए किया कि वे लोग पाकिस्तान के पोस्टर ब्वॉय बन गये हैं. खास कर उन्होंने राहुल गांधी को निशाने पर लिया. जवाब में राहुल ने राफेल के सवाल पर ट्विट कर कहा कि दरअसल मोदी ही पाकिस्तान के पोस्टर ब्वॉय हैं, क्योंकि उनकी सरकार की नीति और अनिल अंबानी का हित साधने के कारण राफेल हवाई जहाज लाने में विलंब मोदी ने ही किया है.

इन हालातों के बीच भाजपा ने झारखंड में अपनी सीटिंग सीट आजसू के लिए छोड़कर गठबंधन किया है. यह चौंकाने वाला तथ्य इस अर्थ में है कि गिरिडीह लोकसभा क्षेत्र 1977 के बाद से भाजपा की परंपरागत सीट है. भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में भी गिरिडीह में बेहतर प्रदर्शन किया था. दूसरी ओर आजसू बेहद कमजोर राजनीतिक स्थिति में है. पिछले लोकसभा चुनाव में उसे बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा था. और आजसू के अध्यक्ष सुदेश महतो भी 2014 से अब तक 3 चुनाव हार चुके हैं. इसके साथ ही लोहरदगा उपचुनाव में भी हार का सामना किया था. सुदेश महतो भारतीय जनता पार्टी के साथ लंबे समय से गठबंधन में हैं. लेकिन उपचुनावों में हार के बाद वे भाजपा के साथ संबंधों की समीक्षा की बात करते रहे हैं. भाजपा ने उनके बयानों को  तबज्जों भी नहीं दिया. लेकिन भाजपा ने तालमेल कर लिया. इससे भाजपा के लोग भी चकित हैं. भाजपा के भीतर ही गिरिडीह में कई दावेदार उभर आये थे. भाजपा जिन सीटों पर अपनी जीत पक्की मान कर चल रही थी उसमें गिरिडीह अहम है. भाजपा का यह कदम बताता है कि भाजपा अपनी तमाम चुनावी तैयारियों के बाद भी जीत को लेकर निश्चिंत नहीं हो पा रही है. इस हालात में आजसू ने एक लोकसभा सीट हासिल  कर राजनीतिक कामयाबी हासिल की है.

भाजपा ने बिहार में भी जदयू से गठबंधन करने के बाद अपनी जीत वाली कई सीटों को छोडा है. लेकिन बिहार से झारखंड का मामला भाजपा के लिए अलग इसलिए है कि भाजपा के लिए झारखंड राजनीतिक ताकत का इलाका है. राजनीतिक प्रेक्षक अब भी मान रहे हैं कि अनेक ऐसे सवाल हैं, जिसके कारण भाजपा  परेशान है. इसमें आरक्षण का सवाल सबसे ऊपर है. आदिवासी, दलित ओर पिछड़ों के बड़े तबके में यह महसूस हो रहा है कि भाजपा देर-सबेर आरक्षण को उनसे पूरी तरह छीन लेगी.

किसान और खेती और बेरोजगारी के सवाल भी हैं. इसके असर को कम कर आंका नहीं जा सकता. 2014 के चुनावी वायदे भी भाजपा का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं. नोटबंदी के कारण तबाह हुई ग्रामीण अर्थव्यवस्था का दर्द भी ग्रामीण अंचलों के राजनीतिक निर्णय को प्रभावित कर रहा है. इसे राजनीतिक दलों के रणनीतिकार बखूबी  समझ रहे हैं.

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