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दिल्ली चुनाव: शाहीनबाग के बहाने भाजपा की कोशिश फिर से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को परवान चढ़ाना है

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Faisal Anurag

दिल्ली में एक बार फिर चुनाव में सांप्रदायिकता के कार्ड को हावी बनाने के प्रयास तेज हो गये हैं. इस अभियान का नेतृत्व अमित शाह खुद कर रहे हैं. दिल्ली में अब तक दिये गये तमाम चुनावी भाषणों में शाह का सबसे ज्यादा जोर शाहीनबाग को लेकर है.

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शाहीनबाग के बहाने उनकी कोशिश धु्रवीकरण को परवान चढाना है. लोकसभा चुनाव के बाद अब तक हुए तमाम विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रचार एजेंडा का मुख्य स्वर धुवीकरण ही रहा है. शाहीनबाग से उठे सवालों को दरकिनार करने के अभियान में गुहमंत्री के अलावे मंत्रिमंडल के कई सदस्य शामिल हैं.

रविशंकर प्रसाद तो लगातार प्रेस से बात करते हुए शाहीनबाग के खिलाफ तीखा बयान दे रहे हैं. उनका ताजा बयान शाहीनबाग को ले कर ही है, जिसे वे देश तोड़ने की साजिश बता रहे हैं. और कांग्रेस को निशाने पर ले रहे हैं. अमित शाह और नरेंद्र मोदी भी सीएए और एनआरसी विरोधी आंदोलन के लिए विपक्षी दलों पर ही हमला कर रहे हैं.

दिल्ली के चुनाव को विकास के एजेंडा से अलग-थलग कर जिस तरह भावनात्मक सवालों के साथ खड़ा किया जा रहा है, इसका नतीजा तो 11 फरवरी को ही आयेगा. लेकिन मतदाताओं के रुझान बता रहे हैं कि वे इससे असहमत हैं.

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मतदाता शिक्षा और स्वाथ्य के साथ ही दिल्ली के विकास और सुविधाओं पर ज्यादा चर्चा कर रहे हैं. आम आदमी पार्टी के प्रचार अभियान का केंद्रीय पहलू उसके पांच साल के काम पर केंद्रित है. आम आदमी पार्टी ने रिपोर्ट कार्ड और भविष्य के लिए गारंटी कार्ड जारी किया है. आम आदमी पार्टी के नेता खास कर अरविंद केजरीवाल का आत्मविश्वास किसी भी अन्य प्रतिद्वंदी की तुलना में निर्णायक दिख रहा है.

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दिल्ली के चुनाव में जिस तरह के नारे पदों पर बैठे मंत्री लगा रहे हैं. उसकी खूब चर्चा हो रही है. आम आदमी पार्टी के विधायक के तौर पर कपिल मिश्रा के अनेक वीडियो वायरल हैं. जिसमें वे नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत आरोप लगाते सुने जा सकते हैं.

वहीं कपिल मिश्र भाजपा के उम्मीदवार हैं और एक सांप्रदायिक ट्विट के माध्यम से पाकिस्तान और मुसलमान के खिलाफ बात करते हैं. पाकिस्तान हर चुनाव में भाजपा का एक ऐसा मुद्दा बना हुआ है, जिसे वह वोट धुवीकरण का आसान तरीका मानते हैं. हालांकि बिहार के 2015 के चुनाव में अमित शाह का यह फार्मूला असफल हो चुका है.

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और हाल के तमाम विधानसभा चुनावों में से अधिकांश में वह भाजपा की कामयाबी की गारंटी नहीं बन सका है. बावजूद दिल्ली के चुनाव में इसे पूरे जोर-शोर से एक बार फिर से आजमाया जा रहा है. चुनाव आयोग ने कपिल मिश्र को 48 घंटे तक प्रचार करने पर रोक लगा कर प्राथमिकी दर्ज कराने का आदेश दिया है.

लेकिन वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने जिस तरह का हिंसक नारा भीड़ से लगवाया है, वह बेहद चिंताजनक है. देश के गद्दारों को गोली मारो, जैसे नारे लगा कर अनुराग ठाकुर ने अनेक सवाल खड़े कर दिये हैं. चुनाव आयोग ने इस पर तुरंत तो कार्रवाई नहीं की, लेकिन उसके संज्ञान में यह मामला है.

देखना है कि चुनाव आयोग इस तरह के धार्मिक व घृणास्पद के नारों पर क्या और कब कार्रवाई करता है. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति ने गांधी की अहिंसा को खूब याद किया. और मोदी ने मन की बात में भी.

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लेकिन मोदी सरकार का ही एक मंत्री इस तरह के हिंसक नारे लगाता है. और मोदी की इस पर कोई टिप्पणी नहीं आती. इससे उनके गांधी के अहिंसा को याद करने के इरादे पर कुछ लोग संदेह कर रहे हैं.

सीएए आंदोलन के बाद से भाजपा के अनेक मंत्रियों ने जिस तरह की बातें की है, वह आपत्तिजनक की ही श्रेणी में आती हैं. वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेष ने लिखा है:

केंद्र का एक राज्यमंत्री राष्ट्रीय राजधानी की एक चुनाव सभा में अपने समर्थकों से गोली मारो, का नारा लगवाता है!

दूसरा केंद्रीय राज्यमंत्री यूपी की सभा में बड़े मंत्री जी के सामने कहता है

जेएनयू जैसी युनिवर्सिटी में 10 फीसदी रिजर्वेशन पश्चिम यूपी के हमारे युवाओं को दिलवा दीजिए. फिर वहां नारा लगाने वालों का इलाज हो जायेगा, सब ठीक हो जायेगा!

तीसरा नमूना देखिये

राज्य का एक मंत्री कहता है, जो मोदी और योगी के विरोध में नारे लगायेगा, उसे जिंदा दफन कर देंगे!

एक प्रदेश का पार्टी अध्यक्ष कहता है, जिसने सीएए एनआरसी के विरोध में प्रदर्शन किया, उसे यूपी और असम में हमारी सरकारों ने कुत्तों की तरह मारा! आप इसे धर्म, संस्कृति और सियासत कहेंगे? हमने तो बचपन से ही पढ़ा था मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना! समझना कठिन है (या आसां हैं) कि इन मंत्रियों को किसने पढ़ाया और इन्होंने क्या पढ़ा?

अमित शाह ने तो यहां तक कहा कि इतने जोर से बटन दबायें कि करंट शाहीनबाग को लगे.

इस बीच अमित शाह ने अब एक और नई बात कह दी है. सीएए के तहत नागरिकता के लिए धर्म का प्रमाणपत्र जरूरी होगा. अब तक सरकार कह रही थी कि सीएए उन गैर मुसलमानों के लिए है जो पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिसतान में धार्मिक प्राताड़ना के शिकार हो भारत आये हैं.

सवाल है कि आखिर भाग कर आये  लोग किस तरह अपने धर्म का प्रमाणपत्र दे पायेंगे. दुनिया भर में जिस तरह की प्रतिक्रिया हो रही है, उससे भारत की परेशानी बढ़ ही रही है. लोकसभा अध्यक्ष ने अब यूरोपियन यूनियन संसद के अध्यक्ष से आग्रह किया है कि वह इस सवाल पर किसी भी तरह के प्रस्ताव पर बहस की अनुमति नहीं दें.

क्योंकि यह भारत के संसद के खिलाफ होगा. यूरोपियन यूनियन में कुल पांच प्रस्ताव विचार के लिए रखे गये हैं. जिस पर जल्द ही बहस हो सकती है. इन प्रस्तावों का मुख्य स्वर भारत से बड़ी संख्या में लोगों के स्टेटलेस होने की आशंका है.

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