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‘ऑफेंस इज द बेस्ट डिफेंस’ की पॉलिसी अपना रही बीजेपी

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Faisal Anurag

अपनी कमीज सफेद हो या नहीं लेकिन दूसरे की कमीज पर दाग ही दाग का आरोप मढ़कर अपना बचाव करने
की नयी राजनीतिक परंपरा देश में जारी है. दिल्ली से लेकर रांची तक यह परंपरा देखी जा सकती है. अपनी सरकार की
गलतियों पर चर्चा से बचने का यह तरीका सत्तारूढ़ दलों को इसलिए भा रहा है क्‍योंकि वे मानते हैं कि जनता
की याददाश्‍त कमजोर होती है तथा बारबार कहे गए झूठ को सच के रूप में स्‍थापित किया जा सकता है.

दुनिया के महान मीडिया विचारक नोम चोमस्‍की ने मीडिया के संदर्भ में जिसे मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट कहा था उसे
भारतीय शासक बखूबी अपनी ताकत बनाने में लगे हैं. यही कारण है कि अपने कार्यकाल की तमाम विफलताओं के
लिए पूर्ववर्ती शासकों को दोषी बताया जा रहा है. अभी हाल ही में नीति आयोग के सदस्‍य राजीव कुमार ने
भारत की गिरती जीडीपी के लिए रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की नीतियों को कारक बता दिया. राजीव
कुमार ने कहा कि अर्थव्‍यवस्‍था में आयी कमजोरी के लिए नोटबंदी या जीएसटी दोषी नहीं है बल्कि राजन की
नीतियां हैं. उन्‍होंने तो यहां तक कह दिया कि फिर नोटबंदी की जा सकती है, क्‍योंकि नोटबंदी का मकसद था
समाज की सफाई. प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा करते हुए जो कुछ कहा था उससे उलट राजीव कुमार और
वित्त मंत्री जेटली कह रहे हैं. जेटली ने नोटबंदी के संदर्भ में यही किया जब रिजर्व बैंक ने कहा कि 99.3 प्रतिशत
प्रचलन से बाहर किए गए नोट वापस आ गए हैं. जेटली ने नोटबंदी के मकसद को ही बदल दिया.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया पोस्ट के बैंकिंग कार्यक्रम की शुरूआत करते हुए बैंको की हालत के लिए 2014 के
पहले दिए गए बैंक लोन को दोषी ठहरा दिया. उन्‍होंने इस तरह 2014 से दिए गए लोन और एनपीए के सवालों को
दरकिनार करने का प्रयास किया और साथ ही बैंक लोन लेकर 2014 के बाद शुरू हुई विदेश भागने की प्रक्रिया से
पल्‍ला झाड़ लिया. यही नहीं प्रधानमंत्री मोदी सत्‍ता में आने के बाद से ही पिछले 70 सालों की चार्चा करते रहे
और उनकी कोशिश रही है कि 70 सालों को देश की बबार्दी के कारण साबित किया जाए. वे खासकर नेहरू पर
हमला करते रहे हैं. वे भूल जाते हैं कि आजादी मिलने के समय भारत के क्‍या हालात थे और उसके बाद भारत ने
किस तरह अपने पैर पर खड़ा होकर दुनिया के समाने एक मिसाल पेश किया.

मोदी के कहने का अर्थ साफ-साफ यह है कि देश में जो कुछ भी हो रहा है वह 2014 के बाद से ही हो रहा है.
लेकिन इस क्रम में 2014 के बाद की नाकामयाबियों की जब कभी चर्चा होती है विमर्श को तुरंत 2014 के पहले के
शासकों की ओर करने का प्रयास किया जाता है. नए शासक मानने लगे हैं कि वे इस तरह मतदाताओं के समाने
विपक्षी दलों की छवि को धूलि करने में सफल हो जाएंगे. एक और नया फिनोमिना यह बना दिया गया है कि
2014 में किए गए वादे 2022 तक ही पूरे होंगे. इस कथन से सरकार की कोशिश 2019 के चुनावों के लिए
मतदाताओं को अपने पक्ष में करना है और उनकी तकलीफों को नजरअंदाज भी करना है. राजनीति का यह नया
ग्रामर है जिसमें शासक मानते हैं कि वे तो कोशिश कर रहे हैं लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों की नीतियां अब भी बाधक हैं.
हालांकि वे अपने अनुकूल नीतियों को बनाने और पहले की नीतियों में बदलाव करते रहे हैं. लेकिन चार साल बीत जाने
के बाद भी उन्‍हें लगता है कि उनकी बात पर मतदाता भरोसा कर लेंगे.

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केंद्र से शुरू हुआ यह प्रयोग राज्‍यों में भी आजमाया जा रहा है. झारखंड इसमें काफी आगे है. जब कभी किसी
विवाद में सरकार फंसती है तो सरकार और भारतीय जनता पार्टी पूर्ववर्ती सरकारों पर हमला करने लगती है और
यह साबित करती है कि आज जो कुछ खराब है वह पुरानी सरकार की ही देन है. अब राज्‍य में अफसरों का बड़े
पैमाने पर तबादला हुआ और सरकार पर आरोप लगे तो भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्‍ता बचाव में आ गए.
प्रवक्‍ता ने कहा कि कांग्रेस और झामुमो की सरकारों के समय तबादला उद्योग बन गया था. प्रवक्‍ता का
आरोप है कि हेमंत की सरकार में म्‍यूजिकल चेयर की तरह अफसरों का तबादला किया गया. 15 दिनों में 304
तबादलों के बाद विवाद पैदा हुआ है. रघुवर सरकार पर इन तबादलों को लेकर विपक्ष आरोप लगा रहा
है. सवाल इनता है कि क्‍या विपक्ष के किसी भी आरोप को इसी तरह खारिज किया जा सकता है. क्‍या यह प्रक्रिया
स्‍वस्‍थ्‍य है. असल में सरकारों को अपना पक्ष रखने में दिक्कतें हो रही हैं इससे यही जाहिर होता है. सरकार
या भाजपा अफसरों के तबादले के पीछे की मंशा साफ नहीं कर पायी है क्‍योंकि अनेक अफसर समय से पहले
ही बदल दिए गए हैं.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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