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सत्ता में रहे भाजपा, आजसू, जेएमएम, कांग्रेस कभी पांचवीं अनुसूची के लिए संजीदा नहीं हुए : दयामनी बारला

रघुवर सरकार टीएसपी के पैसे से आरएसएस का कार्यक्रम कर राजनीति चमका रही है

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Ranchi : राज्य के कल्याण विभाग द्वारा 10 नवंबर को रांची विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट सभागार में कराये गये संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप के व्याख्यान के बाद राज्य में पांचवीं अनुसूची पर आदिवासी अंचल में विमर्श तेज होता जा रहा है. वहीं, राजभवन के समक्ष 21 नवंबर को पांचवीं अनुसूची में प्रधान अधिकारों की रक्षा की मांग को लेकर जनांदोलनों का संयुक्त मोर्चा की ओर से महाधरना और प्रदर्शन प्रस्तावित है. पांचवीं अनुसूची पर सुलगते सवालों को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बरला ने न्यूज विंग से खास बातचीत की. पेश हैं इस बातचीत के मुख्य अंश.

न्यूज विंग : देश की आजादी के बाद भी आदिवासी अधिकार के संवैधानिक प्रावधान आखिर क्यों लागू नहीं हो पाये?

दयामनी बारला : हां, आज भी राज्य के आदिवासी संविधान प्रदत्त अधिकारों की मांग के लिए राज्य में संर्घष करने को मजबूर हैं, क्योंकि कभी भी इन अधिकारों को लागू नहीं किया गया. संविधान से मिले पांचवीं अनुसूची के अधिकार के तहत जल, जंगल, जमीन पर नियंत्रण कर उसे संचालित करने और खुद को विकसित करने के साथ-साथ अपनी भाषा-संस्कृति के विकास का अधिकार दिया गया है. लेकिन, इन सारे प्रावधानों को सरकार ने आज तक लागू नहीं किया. सरकार ग्रामसभा को कमजोर करने का प्रयास लगातार करती रही है. पेसा कानून के प्रावधानों को झारखंड में लागू नहीं किया गया. वर्तमान भाजपा सरकार ने चार मोमेंटम झारखंड का अयोजन कर हजारों कॉरपोरेट को आदिवासी-मूलवासी किसानों की जमीन देने का समझौता कर लिया है. सीएनटी, एसपीटी एक्ट के प्रावधानों का भी पालन नहीं हो रही है. गोड्डा में अडानी पावर प्लांट के लिए जमीन लूटी जा रही है.

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न्यूज विंग : राज्य बनने के बाद यहां जितनी भी सरकारें बनीं, उन्होंने क्या अपनी जिमेदारी निभायी?

दयामनी बारला : पांचवीं अनुसूची के नाम पर राज्य में आदिवासियों को गुमराह किया जा रहा है. पांचवीं अनुसूची के संरक्षक राज्यपाल होते हैं, लेकिन पांचवीं अनुसूचित क्षेत्र में जमीन की लूट खुलेआम चल रही है. विस्थापन और किसानों की जमीन की लूट झारखंड का सच बन गया है. जंगल काटे जा रहे हैं, लेकिन राजभवन इसे नियंत्रित नहीं कर रहा है. ऐसे में झारखंड के आदिवासी-मूलवासी पांचवीं अनुसूची की मांग के लिए अपना संघर्ष जारी रखे हुए हैं.

न्यूज विंग : क्या संविधान प्रदत्त पांचवीं अनुसूची के अधिकारों को राज्य में लागू करने की राजनीतिक दलों की प्राथमिकता नहीं है?

दयामनी बारला : राज्य गठन को भी 18 साल हो गये हैं. संविधान प्रदत्त अधिकारों को लागू नहीं किया गया है. राज्य में सबसे ज्यादा भाजपा और आजसू ने राज किया. साथ ही, झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भी सत्ता का स्वाद लिया, कांग्रेस ने भी सत्ता में भागीदारी की, लेकिन राज्य बनने के बाद आज तक किसी भी राजनीतिक दल ने पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को लागू करने के लिए पहल नहीं की. आदिवासियों-मूलवासियों के अधिकारों के लिए किसी ने काम नहीं किया. सबने सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए झारखंडी भावना का इस्तेमाल किया है. किसी भी राजनीतिक दल ने ग्रामसभा को मजबूत करने की पहल नहीं की. आज वही काम भाजपा कर रही है. भाजपा भी झारखंडी भावनाओं का उपयोग कर वीर शहीदों के सम्मान की बात कर रही है. लेकिन, पांचवीं अनुसूची के लिए जल, जंगल, जमीन के अधिकार को लागू करने के लिए किसी ने काम नहीं किया, बल्कि सभी दलों ने इसे खत्म करने का प्रयास किया.

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न्यूज विंग : केंद्र सरकार की ओर से टीएसपी (ट्राइबल सब-प्लान) का पैसा विकास कार्यों के लिए भेजा जाता है. उस पैसे का उपयोग कर क्या आदिवासी क्षेत्र का विकास नहीं किया जा रहा?

दयामनी बारला : ट्राइबल सब-प्लान के तहत शिक्षा, स्वास्थ्य और गांव के विकास के लिए संसाधन केंद्र से आता है, लेकिन उन पैसों से हाईवे बनाया जा रहा है, जेल बनायी जा रही है, एयरपोर्ट बनाया जा रहा है. हाल के दिनों में ट्राइबल सब-प्लान के पैसे से आरएसएस के कार्यक्रम का आयोजन भी भाजपा सरकार ने की है. सत्ता में बैठी भाजपा टीएसपी के पैसे से अपनी राजनीति चमका रही है.

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न्यूज विंग : क्या टीएसी सदस्य पांचवीं अनुसूची को लेकर संजीदा नहीं हैं?

दयामनी बारला : टीएसी सदस्य पांचवीं अनुसूची के तहत कार्य हो, इसे नहीं समझ सके हैं. एक-दो सदस्य कोशिश करते हैं, लेकिन नाकाम हो जाते हैं. झारखंड की राजनीति देश की राजनीति की चल रही है, जहां साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति हो रही है. सिर्फ पैसा बनाने के लिए जनता के सवालों को हल नहीं किया जा रहा है. सरकार और झारखंडी राजनीतिक दल अगर पांचवीं अनुसूची को लेकर संजीदा होते, तो राज्य में आदिवासी क्षेत्र का बेहतर विकास होता.

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