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Birthday special : निर्मल वर्मा को लोकप्रिय मैगजीन धर्मयुग का संपादक बनाये जाने की भी चली थी चर्चा

Naveen Sharma

Ranchi : निर्मल वर्मा हिंदी साहित्य में सुबह की ताजा व सकूनदायी हवा के झोंके की तरह थे जिसे ऊर्दू में नसीम कहा जाता है. वे अपने नाम की मानिंद प्यारे और खूबसूरत दिखनेवाले पहाड़ी शख़्सियत थे.

निर्मल वर्मा ने हिंदी साहित्य को एक नया मोड़ दिया. वो एक अलग तरह की भाषा, परिवेश और कथानक लेकर आए. कुछ कुछ अज्ञेय की तरह ही निर्मल वर्मा को पढ़ने के लिए मेहनत करनी होती है क्योंकि इनकी भाषा भी थोड़ी क्लिष्ट कही जा सकती है.

निर्मल वर्मा के लेखन से मेरा परिचय 1996-98 के दौरान हुआ था. उन दिनों मैं दिल्ली में रह कर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा था. एक वैकल्पिक विषय हिंदी था और हिंदी साहित्य में रूचि भी.

इस वजह से निर्मल वर्मा के उपन्यास और कहानी संग्रहों से इसी दौर में होकर गुजरा. मैंने उस दौरान लाल टीन की छत, एक चिथड़ा सुख, चिड़ों पर चांदनी और कौवे और काला पानी किताबें पढ़ी थीं. उनका अंतिम उपन्यास अंतिम अरण्य भी पढ़ा था.

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शिमला में हुआ जन्म, दिल्ली में पढ़ाई

निर्मल वर्मा का जन्म तीन अप्रैल 1929 को शिमला (हिमाचल प्रदेश) में हुआ. उनकी हायर सेकेंडरी शिमला से ही पूरी हुई. इसके बाद दिल्ली के चर्चित सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इन्होंने इतिहास विषय में एम.ए. किया. कहानी लेखन का बीज कॉलेज जीवन में ही पड़ा.

उन्होंने अपनी पहली कहानी कॉलेज की हिंदी मैगजीन के लिए लिखी थी. कुछ समय तक उन्होंने दिल्ली के किसी प्राईवेट कॉलेज में अध्यापन भी किया था.

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कई चेक लेखकों की कृतियों का हिंदी अनुवाद किया

1959 में निर्मल वर्मा को ओरिएंटल इंस्टीट्युट प्राग और चेकोस्लोवाक लेखक संघ द्वारा यूरोप आमंत्रित किया गया. वहां इन्हें आधुनिक चेक लेखकों की कृतियों का हिंदी अनुवाद निकालने की जिम्मेदारी मिली.

इनके निर्देशन में ही कैरेल चापेक, जीरी फ्राईड, जोसेफ स्कोवर्स्की और मिलान कुंदेरा जैसे लेखकों की कृतियों का हिंदी अनुवाद सामने आया.1970 तक निर्मल यूरोप प्रवास पर रहे. इसके पूर्वी-पश्चिमी हिस्सों में खूब भ्रमण किया.

वहाँ रहकर उन्होंने आधुनिक यूरोपीय समाज का गहरा अध्ययन किया. इस अध्ययन का असर उनके भारतीय सभ्यता और धर्म संबंधी चिंतन पर भी हुआ. इनके लेखन और चिंतन को अंतर्राष्ट्रीय आयाम प्राप्त हुआ. यूरोपीय समाज और संस्कृति पर लिखे हुए उनके कुछ लेख टाईम्स ऑफ़ इंडिया में भी प्रकाशित हुए.

यूरोप से वापसी के बाद निर्मल वर्मा इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवान्स्ड स्टडीज, शिमला में फेलो चयनित हुए. यहाँ रहते हुए उन्होंने ‘साहित्य में पौराणिक चेतना’ विषय पर रिसर्च किया.

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यूरोप की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक समस्याओं पर कई लेख लिखे

निराला सृजनपीठ भोपाल (1981-83) और यशपाल सृजनपीठ (शिमला) के अध्यक्ष रहे. 1988 में इंग्लैंड के प्रकाशक रीडर्स इंटरनेशनल द्वारा उनकी कहानियों का संग्रह ‘द वर्ल्ड एल्सव्हेयर’ प्रकाशित हुआ. इसी समय बीबीसी द्वार उन पर एक डाक्यूमेंट्री फ़िल्म भी प्रसारित हुई.

निर्मल वर्मा को हिंदी और अँग्रेज़ी पर समान अधिकार था. आपने टाइम्स ऑफ़ इंडिया तथा हिदुस्तान टाइम्स के लिए यूरोप की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक समस्याओं पर अनेक आलेख और रिपोर्ताज लिखे जो निबंध संग्रहों में संकलित हैं. सन् 1970 में भारत लौट आए और स्वतंत्र लेखन करने लगे.

हिंदी कथा-साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान

प्रेमचंद और उनके समकक्ष साहित्यकारों जैसे भगवतीचरण वर्मा, फणीश्वरनाथ रेणु आदि के बाद साहित्यिक परिदृश्य एकदम से बदल गया. विशेषकर साठ-सत्तर के दशक के दौरान और उसके बाद बहुत कम लेखक हुए जिन्हें कला की दृष्टि से हिन्दी साहित्य में अभूतपूर्व योगदान के लिये याद किया जायेगा.

इन रेयर लेखकों में निर्मल वर्मा शामिल हैं. निर्मल वर्मा का मुख्य योगदान हिंदी कथा-साहित्य के क्षेत्र में माना जाता है. वे नई कहानी आंदोलन के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर माने जाते हैं.

बिहार की यात्रा पर आना चाहते थे

निर्मल वर्मा ने प्रसिद्ध आलोचक-लेखक रमेशचंद्र शाह को पत्र लिखे थे. एक पत्र में निर्मल ने लिखा था कि मेरे एक जेसुइट मित्र ने लंबे अर्से से मुझे बिहार आने के लिए कह रखा था, ताकि मैं बिहार के गांवों में मिशनरी लोगों का काम देख सकूँ.

मैं अभी तक बिहार नहीं गया हूँ–वहाँ जाकर बौद्ध गया और नालन्दा देखने का एक अतिरिक्त मोह भी है. मैंने उनसे फ़रवरी के अन्त तक आने का वादा किया था–उस समय–जब लेखक-शिविर की कोई बात नहीं उठी थी. अब मैं एक अजीब धर्म-संकट में फँस गया हूं जिसके बारे में मैंने वात्स्यायन जी को भी लिख दिया है.

वहीं एक अन्य पत्र में निर्मल वर्मा ने हिंदी की प्रसिद्ध मैगजीन का संपादक बनाये जाने की चर्चा पर भी अपनी बात रखी. उन्होंने पत्र में लिखा कि धर्मयुग की एडिटरी के लिए मेरे पास कोई ऐसा ऑफ़र नहीं आया, जिसे अस्वीकार करने का भी सुख मिल पाता; पता नहीं, वह अफ़वाह किसने उड़ाई है?

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मुख्य कृतियाँ

कहानी संग्रह : परिंदे (1958), जलती झाड़ी (1965), पिछली गर्मियों में (1968), बीच बहस में (1973), कौवे और काला पानी (1983), सूखा तथा अन्य कहानियाँ (1995)

उपन्यास : वे दिन (1958), लाल टीन की छत (1974), एक चिथड़ा सुख (1979), रात का रिपोर्टर (1989), अंतिम अरण्य (2000)
यात्रा वृत्तांत : चीड़ों पर चाँदनी (1962), हर बारिश में (1970), धुंध से उठती धुन (1996)

निबंध : शब्द और स्मृति (1976), कला का जोखिम (1981), ढलान से उतरते हुए (1987), भारत और यूरोप : प्रतिश्रुति के क्षेत्र (1991), ‘इतिहास, स्मृति, आकांक्षा’ (1991), ‘आदि, अंत और आरंभ’ (2001), सर्जना-पथ के सहयात्री (2005), साहित्य का आत्म-सत्य (2005)

नाटक : तीन एकांत (1976)

संभाषण/साक्षात्कार/पत्र : दूसरे शब्दों में (1999), प्रिय राम (अवसानोपरांत 2006), संसार में निर्मल वर्मा (अवसानोपरांत 2006)
संचयन : दूसरी दुनिया (1978), प्रतिनिधि कहानियाँ (1988), शताब्दी के ढलते वर्षों से (1995), ग्यारह लंबी कहानियाँ (2000)
अनुवाद : रोमियो जूलियट और अँधेरा, बाहर और परे, कारेल चापेक की कहानियाँ, बचपन, कुप्रिन की कहानियाँ, इतने बड़े धब्बे, झोंपड़ीवाले, आर यू आर, एमेके : एक गाथा

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सम्मान और पुरस्कार

  • 1999 में साहित्य में देश का सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया.
  • 2002 में भारत सरकार की ओर से साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्म भूषण दिया गया.
  • निर्मल वर्मा को मूर्तिदेवी पुरस्कार (1995)
  • साहित्य अकादमी पुरस्कार (1984)
  • उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

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