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BIG ISSUE : एक्सपर्ट्स से जानिये वो वजहें जिनके चलते असल जिंदगी में बिखर जाते हैं टॉपर्स

Avinash

Jamshedpur : देश में टॉपरों की कहानी भी उस रियलिटी शो की तरह हो गयी है, जिसमें कोई नया कलाकार रातोरात धूमकेतु की तरह तो छा जाता है मगर कुछ महीनों में ही वह इस कदर गुमनामी में चला जाता है कि उसके बारे में कहीं चर्चा तक नहीं होती. विभिन्न बोर्ड के टॉपरों की बात हो या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं के टॉपर की. ये अखबारों की सुर्खियां तो बन जाते हैं, मगर असल जिंदगी की चुनौतियां जब सामने आती है तो वे बिखर जाते हैं.

जीवन की सफलता में सामूहिकता का भाव होना जरूरी : विपिन शर्मा

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शहर की शिक्षाविद और विद्या भारती चिन्मया विद्यालय की प्रिंसिपल रही विपिन शर्मा कहती हैं – आप किताबें पढ़कर टॉपर तो बन जाते हैं, मगर जब असल जिंदगी की चुनौतियां सामने आती है तो आप उसका सामना नहीं कर पाते. कई बार ऐसे स्टूडेंट्स जिंदगी से निराश होकर गलत कदम भी उठा लेते हैं, क्योंकि टॉपर होने के बाद उनकी महत्वाकांक्षा काफी बढ़ जाती है. यही नहीं पेरेंट्स, रिश्तेदार और जान-पहचान वालों की अति महत्वाकांक्षा का भी वह कई बार शिकार हो जाता है. बकौल शर्मा, स्कूली शिक्षा में पहले हम सीखते हैं, फिर परीक्षा देते हैं, जबकि असल जिंदगी में पहले हम परीक्षा देते हैं फिर सीखते हैं. जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए बच्चों में दो चीज होना बेहद जरूरी है. पहला-कंसिस्टेंसी (निरंतरता) और दूसरा वैल्यू (मूल्य). परीक्षा की सफलता और जिंदगी की सफलता में यह अंतर है कि परीक्षा की सफलता एकांगी होती है जबकि जीवन की सफलता में सामूहिकता का भाव होना बेहद जरूरी है. आप केवल किताबें पढ़कर परीक्षा में सफल हो सकते हैं, लेकिन जीवन में सफल होने के लिए बुद्धिमता के साथ ही इमोशनल और स्पिरिचुअल डायमेंशन भी होना चाहिए. यह आता है आपके वैल्यू सिस्टम और कंसिस्टेंसी से. वैल्यू सिस्टम को आप सरल शब्दों में संस्कार भी कह सकते हैं. जो बच्चे अपने वैल्यू सिस्टम या संस्कार से जुड़े होते हैं, वे जिंदगी के हर तरह के  झंझावातों को झेल जाते हैं, जबकि बिना संस्कार वाले बच्चों के लिए जीवन की चुनौतियों का सामना कर पाना मुश्किल होता है. इसलिए बच्चों के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए पढ़ाई के साथ ही खेल और संगीत का होना बेहद जरूरी है.

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टॉपर होना सफलता की गारंटी नहीं है : डॉ संजय अग्रवाल  

टाटा मेन हॉस्पिटल (टीएमएच) के मनोचिकित्सक डॉ संजय अग्रवाल कहते हैं-किसी एक परीक्षा में सफल होने का कतई मतलब नहीं है कि आप जिंदगी में भी सफल हो जायेंगे. इस पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी समेत दुनिया भर में अध्ययन हुए हैं और उसका निष्कर्ष यही रहा है कि टॉपरों की तुलना में औसत छात्रों का सक्सेस और हैप्पीनेस इंडेक्स बेहतर रहा है. इसकी वजह यह है कि टॉपर एक विषय में बेहतर हो सकता है लेकिन जिंदगी में सफल होने के लिए मानवीय संबंधों को, भावनाओं को हैंडल करना आना चाहिए. जिंदगी में कई तरह के कांफ्लिक्ट आते हैं, उसका समाधान करने के लिए किसी विषय में बेहतर होना जरूरी नहीं है. आप लोगों से कैसे बात करते हैं, अपने आप को कैसे प्रेजेंट करते हैं, इसकी खास अहमियत होती है. सब्जेक्ट एक क्राइटेरिया है, वह जिंदगी में सफल होने की गारंटी नहीं देता है. दुनिया में गोल्डमैन नाम के बहुत बड़े मनोवैज्ञानिक हुए हैं, उन्होंने कहा है कि जिंदगी में सफल होने के लिए इंटेलीजेंस कोशंट (आईक्यू) से ज्यादा इमोशनल कोशंट जरूरी है. आप इंटेलीजेंस कोशंट के जरिए बड़े संस्थानों में पढ़ाई कर सकते हैं, गूगल में नौकरी कर सकते हैं मगर असल चुनौतियां का सामना इमोशनल कोशंट के जरिए ही हो सकता है. कई बार औसत स्टूडेन्ट्स अपनी जिंदगी में टॉपर से बेहतर परफॉमेंस करता है, क्योंकि उसका इंटेलीजेंस कोशंट भले ही कम होता है लेकिन इमोशनल कोशंट ज्यादा होता है. यही कारण है कि आजकल बड़े बड़े संस्थान कर्मचारियों को ट्रेनिंग देते हैं ताकि वे दुनियादारी को बेहतर तरीके से समझ सके. घर में दो भाई में एक पढ़ाकू होता है, जबकि जो दूसरा होता है पढ़ता कम है, मगर दुनियादारी बेहतर जानता है. मुझे लगता है कि इन दोनों में संतुलन बहुत जरूरी है. यह तभी होगा जब स्कूल के साथ ही पैरेन्ट्स भी अपनी सोच में बदलाव करेगा और मार्क्स को ही जीवन का अंतिम सच नहीं मानेगा.

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