न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

भाजपा ने चुनाव से पहले जनजातीय आयोग के माध्यम से खेला है बड़ा कार्ड

मुख्यमंत्री ने इस बारे में कहा है कि इस आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य वे आदिवासी होगें जो जन्म से मौत तक आदिवासी रीति रिवाज को मानता है.

60

Faisal Anurag

mi banner add

लोकसभा चुनाव के ठीक पहले राज्य सरकार ने झारखंड में जनजातीय आयोग बनाने की दिशा में विधानसभा से मंजूरी हासिल कर लिया है. झारखंड अनुसूचित जनजाति आयोग विधेयक 2019 को संशोधन के साथ विधानसभा ने मंजूर कर लिया है. इसके अध्यक्ष और सदस्य आदिवासी होंगे. मुख्यमंत्री ने इस बारे में कहा है कि इस आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य वे आदिवासी होगें जो जन्म से मौत तक आदिवासी रीति रिवाज को मानता है. इस तरह भाजपा सरकार ने इस आयोग से उन आदिवासियों को बेदखल कर दिया है, जो इसाई धर्म को मानते हैं लेकिन जिनकी संस्कृति आदिवासी ही है. इस तरह भाजपा ने चुनाव के ठीक पहले एक बड़ा कार्ड इसके माध्यम से खेला है. उसका मकसद आदिवासी वोटों को अपने पक्ष में करने का है. धर्मांतरण विधेयक के बाद गैर इंसाई आदिवासियों को अपने पक्ष में करने का भाजपा का यह कदम कितना करगर होगा यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इससे विवाद जरूर खड़ा हो गया है. विवाद यह है कि सरकार के इस कदम से भी आदिवासियों की एकजुटता प्रभावित होगी और उन्हें धर्म के आधार पर विभाजित करने का प्रयास किया जा रहा है.

इस तरह के तमाम आरोपों की भूमिका और उपयोगिता को लेकर भारत में कई धारणाएं मौजूद हैं. होना तो यह चाहिए कि एसटी और एससी आयोग आदिवासियों और दलितों के हित में तन कर खड़ा  हो और उनके सामाजिक इंसाफ का वह स्वर बने. खास तौर पर पिछले साल दो अप्रैल के आदिवासी दलितों के भारत बंद के बाद इस तरह के आयोगों को लेकर देशभर में सवाल उठते रहे हैं. आयोगों को मान्य न्याय के पहलू के हिसाब से अपनी गतिविधियों को चलाने की अपेक्षा की जाती है. लेकिन भारत में देखा यह जाता है कि आदिवासी दलितों के इंसाफ का सवाल इन आयोगों की प्राथमिकता में नहीं आ पाता है. दो अप्रैल के आंदोलन में अनेक युवाओं पर मुकदमें दर्ज हुए उन्हें प्रताड़ित भी किया गया. इस बाबत केंद्र के एसटी और एससी आयोग में शिकायत भी की गयी, लेकिन आयोग ने इस संदर्भ में उपेक्षा का ही रूख अपनाया. देश के अनेक राज्यों में इस बंद से जुड़े मामले में अनेक आदिवासी और दलित नौजवान लंबे समय तक जेलों में रहे और उनके के लिए इंसाफ उपलब्ध कराने में भी आयोग विफल रहा.

इसके साथ ही देखा गया है कि इन आयोगों ने इन तबकों के अन्य सवाल जो राजनीति को प्रभावित करते हैं इसके बारे में उनकी भूमिका नकारात्मक ही रही है. जानकार बार-बार इन आयोगों को ज्यादा कारगर बनाने की मांग करते रहे हैं. यह मांग भी रही है कि इन आयोगों को इतना कारगर बनाया जाए कि वह उन लोगों को दंडित भी कर सके जो आदिवासी दलितों का उत्पीड़न करते हैं और उनके हकों की राह में बाधा बनते हैं. संविधान की विभिन्न धाराएं और अनुच्छेद दलितों और आदिवासियों को अध्कार संपन्न बनाने की गारंटी करता है, लेकिन व्यवहारिक धरातल पर इसकी राह में अनेक बाधाएं खड़ी कर दी जाती हैं. इस तरह देखा जाए तो संविधान की मूल भावना और गांरटी को भी पूरा नहीं किया जाता रहा है. सरकार चाहे जिसकी भी रही हो इन तबकों के इंसाफ का सवाल पेंचीदा  ही बना हुआ है.

पिछले अनेक सालों से देखा जा रहा है कि इन तबकों के संवैधानिक हकों का हनन करने का परोक्ष व प्रत्यक्ष प्रयास सरकारी स्तर पर ही किया जा रहा है. ताजा मामला 13 प्वांइट रोस्टर का है, जिसके कारण उच्च शिक्षा में इन तबकों के साथ ही पिछड़ों की भागीदारी खत्म करने का प्रयास हुआ है. देश के किसी भी राज्य और केंद्र के किसी भी दलित आदिवासी आयोग ने इसपर टिप्पणी करना भी उचित नहीं माना है जबकि देश में इन तबकों के नौजवानों में भारी गुस्सा है और विभिन्न प्रदर्शनों के माध्यम से वह गुस्सा सड़कों पर उतर आया है. ऐसे में सवाल उठता है कि झारखंड सरकार क्या इस आयोग को पूर्ण अधिकार संपन्न बनाते हुए इन्हें कारगर कदम उठाने देगी या यह एक राजनीतिक जुमला ही बनकर रह जाएगा.

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आयोगों में नियुक्तियों में आमतौर पर राजनीतिक दलों के हितों के अनुरूप ही होते हैं. देखा जाता है कि इसके माध्यम से इन तबकों के कुछ नेताओं को संतुष्ट किया जाता है. इन नियुक्तियों के राजनीतिक दबाव के कारण आदिवासी समुदाय को स्वर देने वाले लोग इसमें वंचना के ही शिकार बने रहते हैं. इसकी नियमावली भी इतनी लचर होती आयी है कि वह न तो नौकरशाही पर दबाव बना पाता है. इन आयोगों की ने जाने कितनी ही रपटें अत्यंत महत्वूर्ण हैं लेकिन वे दफ्तरों के गतालखाते में पड़ी रह जाती हैं.

इसे भी पढ़ें – रघुवर दास, सरयू राय, भाजपा और जीरो टॉलरेंस

 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like
%d bloggers like this: