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Breaking News : नहीं रहे ऱेणु पर यादगार काम करनेवाले हजारीबाग के साहित्यकार भारत यायावर

साहित्यकार फनीश्वर नाथ  ऱेणु पर शोध कर उनकी जीवनी सहित कई किताबें लिखीं हैं

Naveen Sharma

Ranchi : हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार फनीश्वर नाथ  ऱेणु पर यादगार काम करनेवाले हजारीबाग के साहित्यकार भारत यायावर ने आज इस जहां को अलिवदा कह दिया. यह जानकारी उनके पुत्र ने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से शेयर की है.

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भारत यायावर अपने नाम के अनुरूप ही काम करनेवाले साहित्यकार थे. उन्होंने हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार फनीश्वर नाथ  ऱेणु पर शोध कर कई किताबें लिखीं हैं. इन्होंने अभी हाल में रेणु एक जीवनी किताब लिखी थी जो सेतु प्रकाशन समूह से प्रकाशित हुई है.

भारत यायावर सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय थे. उन्होंने कल ही अपनी तबीयत खराब होने की जानकारी फेसबुक पर पोस्ट की थी. इसके बाद तबीयत में सुधार की भी सूचना आठ घंटे पहले दी थी लेकिन यह उनकी अंतिम पोस्ट होगी ये बात शायद उन्हें नहीं पता थी.

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फेसबुक पर कल लिखा था ये पोस्ट

तबियत भी,तबीयत भी

भारत यायावर

प्रायः बोलचाल में लोग पूछ लेते हैं, आपकी तबियत कैसी है? कोई कहता है, इन दिनों मेरी तबियत ठीक नहीं है . तबियत अर्थात् स्वास्थ्य . सेहत . दूसरे शब्दों में कहें, तन की स्थिति . लेकिन मन की स्थिति के लिए तबीयत लिखा जाता है .

लेकिन एक शेर है :

मेरी हिम्मत देखिए, मेरी तबीयत देखिए

जो सुलझ जाती है गुत्थी, फिर से उलझाता हूँ मैं

यहाँ तबीयत का अर्थ है मन का स्वभाव . दुष्यंत कुमार ने कहा है कि एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो. यहाँ तबीयत का अर्थ है मन के पूरे सामर्थ्य के साथ .

कुछ लोग तबियत का रोना रोते रहते हैं, लेकिन जब तक कोई काम तबीयत से नहीं करेंगे तो उनकी पहचान कैसे बनेगी? तबियत खराब होती है, फिर ठीक हो जाती है लेकिन तबीयत प्रायः बनती ही नहीं . जब तबीयत से यानी मन से युक्त होकर कोई मनुष्य कोई काम करता है, तब वह बेहतरीन होता है .

जहाँ तक बन पड़े तबियत का ध्यान रखिए और अपने तबीयत को बरकरार रखिए .

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भारत यायावर की कविता

कविता सिर्फ बताएगी

तुम कितने नंगे हो

कितने फटेहाल

कितने सिरफिरे

और कितने समझदार

कितने जीवित हो

और कितने मरे हुए

कितने खड़े हो

और कितने पड़े हुए

कविता जब भी प्रकट होगी

तुम्हें कुछ न कुछ बताएगी

और जीवन का बोध कराएगी

वह तुम्हारे साथ भले ही चल न पाए

मगर एक दिशा दिखाएगी

भारत यायावर

 

 

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रेणु की जीवनी

यह बहुत मेहनत से वर्षों बल्कि दशकों में इकट्ठा की गई सामग्री पर आधारित पुस्तक है. सिर्फ रेणु के बारे में नहीं है. उनके पूरे परिवेश और उनके संगी साथियों को पूरा स्थान दिया गया है. कुछ ऐसे प्रसंग हैं जिसके बारे में हिंदी पाठक गण अब सोचते कम हैं. यह देख कर विशेष रूप से अच्छा लगा कि नेपाल क्रांति के प्रसंग पर भोला चटर्जी के काम को भी इस पुस्तक में विशेष स्थान दिया गया है. नर्मदेश्वर प्रसाद, द्विजदेनी जी और अन्य लोगों का जिक्र विस्तार से हुआ है. रेणु के जीवन के बारे में उन लोगों के संस्मरण इस पुस्तक में हैं जो अब जीवित नहीं हैं. इतिहास लिखने वालों के लिए इस पुस्तक का महत्त्व प्राथमिक स्रोत की तरह का भी होना चाहिए.

मैंने रेणु जी के मित्र समीर राय चौधरी से कई बार लंबी बातचीत की थी. उस समय समीर दा स्वस्थ थे और सब बातें वे विस्तार से कर सकते थे. और भी रेणु के बारे में जानकारियां इकट्ठा की थी. मेरे शिक्षक कृष्णचंद्र पांडेय , जिनके कारण ही मेरी रेणु में दिलचस्पी गहरी हुई, भी रेणु के बारे में बहुत सारी बातें बताते थे. अपनी इकट्ठा की गई जानकारियों के आधार पर मुझे लगता था कि रेणु पर गंभीर चर्चा पर्याप्त तथ्यों के आधार पर कम बने बनाए फ्रेम पर अधिक होती है. इस किताब से एक बड़ी कमी दूर हुई.

कितने ही प्रसंग हैं जिसे पढ़ते हुए रोमांच हुआ. रेणु हमारे जोड़ासांको में रवींद्रनाथ को देखने घर से भाग कर आए थे और उन्हें रवींद्रनाथ के ‘महल ‘ के गेट कीपर ने लौटा दिया. उसके बाद वे शरत को देखने के लिए उनके आवास पर गए. देख नहीं पाए …

क्या हुआ देवदास को पढ़ गए और फिर देवदास से हो गए!…एक बार जहर खा लिया.

सतीनाथ भादुड़ी प्रसंग भी अद्भुत है. अगर इस पुस्तक में कोई तथ्यात्मक भूल न सिद्ध हो तो इसे एक बहुत महत्त्वपूर्ण प्रकाशन माना जाना चाहिए.

यह कितना अजीब लगता है कि मैला आंचल की पांडुलिपि लेकर चंदा उगाहकर, बीवी की सेविंग्स के सहारे रेणु इसे प्रकाशित करने के लिए धक्के खाते रहे और विद्वान लोग उनको अपनी भाषा को शुद्ध करने के लिए कहा जाता रहा. वीरेंद्र नारायण जैसे मित्रों ने और समाजवादी मित्र मंडली ने उनका विशेष सहयोग किया. अनूपलाल मंडल का उल्लेख मुझे विशेष रूप से भाया.

और भी कितने ही प्रसंग है.

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