LITERATURE

आज के समय में प्रासंगिक बेर्टोल्ट ब्रेख्त की कविता – अगली पीढ़ी के लिए

अगली पीढ़ी के लिए

 

✍ Bertolt Brecht

 

सचमुच मैं अंधेरे युग में जी रहा हूं

सीधी-सादी बात का मतलब बेवकूफी है

और सपाट माथा दर्शाता है उदासीनता

वह, जो हंस रहा है

सिर्फ इसलिए कि भयानक खबरें

अभी उस तक नहीं पहुंची हैं

 

कैसा जमाना है

कि पेड़ों के बारे में बातचीत भी लगभग जुर्म है

क्योंकि इसमें बहुत सारे कुकृत्यों के बारे में हमारी चुप्पी भी शामिल है.

वह जो चुपचाप सड़क पार कर रहा है

क्या वह अपने खतरे में पड़े हुए दोस्तों की पहुंच से बाहर नहीं है?

यह सच है: मैं अभी भी अपनी रोजी कमा रहा हूं

लेकिन विश्वास करो, यह महज संयोग है

इसमें ऐसा कुछ नहीं है कि मेरी पेट-भराई का औचित्य सिद्ध हो सके

यह इत्तफाक है कि मुझे बख्श दिया गया है

(किस्मत खोटी होगी तो मेरा खात्मा हो जायेगा)

वे मुझसे कहते हैं: खा, पी और मौज कर

क्योंकि तेरे पास है

लेकिन मैं कैसे खा पी सकता हूं

जबकि जो मैं खा रहा हूं, वह भूखे से छीना हुआ है

और मेरा पानी का गिलास एक प्यासे मरते आदमी की जरूरत है.

और फिर भी मैं खाता और पीता हूं.

 

 

मैं बुद्धिमान भी होना पसन्द करता

पुरानी पोथियां बतलाती हैं कि क्या है बुद्धिमानी:

दुनिया के टंटों से खुद को दूर रखना

और छोटी सी जिन्दगी निडर जीना

अहिंसा का पालन

और बुराई के बदले भलाई

अपनी इच्छाओं की पूर्ति के बजाय

उन्हें भूल जाना

यही बुद्धिमानी है

यही सब मेरे वश का नहीं

सचमुच मैं अंधेरे युग में जी रहा हूं.

 

2-

मैं अराजकता के दौर में आया शहरों में

जब भूख का साम्राज्य था

बगावतों के दौरान मैं लोगों से मिला

और मैंने भी उनमें शिरकत की

इस तरह गुजरा मेरा वक्त

जो मुझे दुनिया में मिला था.

 

कत्लेआम के बीच मैंने खाना खाया

नींद ली हत्यारों के बीच

प्रेम में रहा निपट लापरवाह

और कुदरत को देखा हड़बड़ी में

इस तरह गुजरा मेरा वक्त

जो मुझे दुनिया में मिला था.

 

मेरे जमाने की सड़कें दलदल तक जाती थीं

भाषा ने मुझे कातिलों के हवाले कर दिया

मैं ज्यादा कर ही क्या सकता था

फिर भी शासक और भी चैन से जमे रहते मेरे बगैर

यही थी मेरी उम्मीद

इस तरह गुजरा मेरा वक्त

जो दुनिया से मिला था.

 

ताकत बहुत थोड़ी थी लक्ष्य था बहुत दूर,

वह दीखता था

साफ, गो कि मेरे लिए पहुंचना था कठिन

इस तरह गुजरा मेरा वक्त

जो मुझे दुनिया में मिला था.

 

3-

तुम जो कि इस बाढ़ से उबरोगे

जिसमें कि हम डूब गये

जब हमारी कमजोरियों की बात करो

तो उस अंधेरे युग के बारे में भी सोचना

जिससे तुम बचे रहे

जूतों से ज्यादा देश बदलते हुए

वर्ग-संघर्षों के बीच से हम गुजरते रहे चिन्तित

जब सिर्फ अन्याय था और कोई प्रतिरोध नहीं था.

 

हम यह भी जानते हैं कि

कमीनगी के प्रति घृणा भी

थोबड़ा बिगाड़ देती है

अन्याय के खिलाफ गुस्सा भी

आवाज को सख्त कर देता है

आह हम

जो भाईचारे की जमीन तैयार करना चाहते थे

खुद नहीं निभा सके भाईचारा

लेकिन तुम जब ऐसे हालात आएं

कि आदमी, आदमी का मददगार हो

हमारे बारे में सोचना

तो रियायत के साथ!

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