LITERATURE

आजादी के “मायने” बताती देवब्रत सिंह की बांग्ला कविता – स्वाधीनता

विज्ञापन

झूठी नहीं हैं ये बातें

लालगढ़ के जंगलमहल के तमाम लोग जानते हैं

डुमुरगडा, बेनाचापरा, बांकिशोल, हातिगोसा, शालडांगा

advt

मोहनपुर, कोलाईमुड़ी सभी जानते हैं

दिन में पुलिस

रात में वे लोग

पुलिस कहती है स्वाधीनता

adv

वे लोग कहते हैं झूठ है सब

फिर पुलिस कहती है स्वाधीनता

फिर वे लोग कहते हैं झूठ है सब

हम गरीब लोग हैं

हम निरे मूर्ख लोग हैं

भूख समझ में आती है

प्यास भी समझ में आती है

इन सब बातों की तो समझ नहीं है हमलोगों में

फिर भी दिन के समय पुलिस आती है

“हापोन  है रे ?”

बोल उठता हूं, “जी हुजुर हूं.”

“मैं हापोन  मांडी

बाप तिलका मांडी.”

जंगलमहल में जब रात उतरती है

मेरे ताड़-पत्तों के छत वाले मिट्टी के घर में

श्मशान की बुझी हुई लकड़ी जैसा अंधेरा रहता है

न किवाड़ है और न ही सांकल

उस समय वे लोग आते हैं

“कॉमरेड हापोन  हैं?”

बोल उठता हूं “ जी हूं,

मैं हापोन  मांडी

बाप तिलका मांडी”

इसी तरह दिन कट रहे हैं

और इसी तरह रातें कट रही हैं

इस बीच पिछले साल

बांकिशोल का कलभट बम से उड़ा दिया गया

उस समय मैं मजूरी करने गया था खड़गपुर के मुर्गी फ़ार्म में

वो दिन बाबू लोगों के झंडा फहराने का दिन था

हम हतभागा मनुष्य

हम निरा मुर्ख मनुष्य

भूख समझते हैं , प्यास समझते हैं, झंडा तो नहीं समझते

इसलिए तसल्ली से देख रहा था

कैसे तिरंगे को फहरा रहे हैं बाबू लोग

खड़गपुर शहर के बाबू

देखते ही देखते पुलिस गाड़ी आ गई

पुलिस ने पूछा, “तेरा नाम क्या है ?”

बोला, “हापोन  मांडी

बाप तिलका मांडी”

“गांव ?”

बेंचापाड़ा

“ब्लाक ?”

लालगढ़, जंगलमहल

बोल उठा, “अब बताने की ज़रूरत नहीं है.. चल चल”

उसने कहा, “भला जाऊंगा कहाँ?”

बोला “लॉक अप में”

वो क्या होता है हुजुर ?

वो तुम समझ जाओगे , थाना पहुँचते ही समझ जाओगे

“अरे! मैं तो हापोन  मांडी हूं

गरीब आदमी.”

भूख समझ में आती है , प्यास समझ में आती है

इन सब बातों की तो समझ नहीं है मुझमें

मारांग बुरु का किरिया खाकर बोल रहा हूं

बम क्या चीज़ है भला

बाप जनम में भी आँखों से नहीं देखा

बोलते ही बोलते उन्होंने मेरे हल जोतने वाले उन ठेले पड़ चुके हाथों में

लोहे की बेड़ियाँ डाल दी

उसके बाद उन्होंने गले में हाथ डालकर जीप गाड़ी में धक्का देकर ठूँस दिया

गाड़ी के अन्दर बंदूक के नाल सटाकर इधर भी पुलिस – उधर भी पुलिस

उन सबों के बीच मैं हापोन मांडी

बाप तिलका मांडी

वो दिन था बाबू लोगों के झंडा फहराने वाला दिन

थाने में उस समय झंडा फहरा रहे हैं दरोगा बाबू

हम गरीब लोग हैं

हम निरा मूर्ख लोग हैं

भूख समझ में आती है

प्यास भी समझ में आती है

इन सब बातो की तो समझ नहीं है हमलोगों में

इसलिए उनसे पूछा था

ये क्या है भला ?

ये झंडा क्या चीज़ है हुजूर ?

झंडा फहराने से हमारा क्या होगा ?

बस इतनी ही बात थी

कसम से बोल रहा हूं

उस बात को सुनकर फिर क्या बताऊँ

भेड़ के दल पर जैसे हमला करता है बाघ

उसी तरह मेरी गर्दन पर

हमला कर दिए दारोगा बाबू

उसके बाद बूट वाले जूते से

एक ऐसा ठोकर दिया उन्होंने

मैं मुंह के बल ही गिर पड़ा

बोले ..

तुझे पता नहीं है

तुमने देखा नहीं है

नहीं – नहीं

यही तो स्वाधीनता है ..

साला यही स्वाधीनता है

मैं हापोन  मांडी

बाप तिलका मांडी

हम गरीब लोग हैं

हम निरे मूर्ख लोग हैं

भूख समझ में आती थी

प्यास भी समझ में आती थी

अब समझ में आया

किसे कहते हैं स्वाधीनता

और किसे कहते हैं झूठी बातें

 

हिंदी अनुवाद : प्रशांत विप्लवी

advt
Advertisement

Related Articles

Back to top button