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बंगाल चुनावः खेला होबे या असोल पोरिबर्तन

Baijnath Mishra

बंगाल में विधानसभा चुनाव के प्रचार की गर्मी के बीच यह कयास लगाना मुश्किल है कि ऊंट आखिर किस करवट बैठेगा. हालांकि जो हालात बन रहे हैं, उनसे इतना स्पष्ट हो गया है कि मुकाबला आमने-सामने का है. यानी भाजपा-टीएमसी के बीच झकझूमर हो रही है.

वाम मोर्चा-कांग्रेस और आईएसएफ गंठबंधन इस चुनावी तपिश में हांफता नजर आ रहा है. चुनाव प्रचार की सरगर्मी में ऐसा लग ही नहीं रहा है कि तीसरा मोर्चा भी अपनी गंभीर उपस्थिति दर्ज कराने की स्थिति में है. ओवैसी की पार्टी का तो पता ठिकाना ही नामालूम है.

इससे टीएमसी और भाजपा का जोड़-घटाव, गुणा-भाग गड़बड़ा गया है. टीएमसी को फायदा यह है कि कांग्रेस-वाम मोर्चा-आईएसएफ गंठबंधन के कमजोर होने से उसे एकमुश्त मुस्लिम मतों के मिलने की संभावना प्रबल हो गयी है. लेकिन इसी के साथ उसे यह खतरा भी सता रहा है कि यदि भाजपा के उग्र हिंदुत्ववाद के वेग में समानांतर गोलबंदी हो गयी तो तृणमूल तिनके की तरह बिखर जायेगी.

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अगर तीसरे मोर्चे की कमजोर मौजूदगी से टीएमसी को मुस्लिम मतों का फायदा होगा तो मोर्चे के हिंदू समर्थक भाजपा की ओर भी मुखातिब हो सकते हैं. इसलिए ममता बनर्जी स्वयं को सबसे बड़ा हिंदू साबित करने के लिए चुनावी सभाओं में चंडीपाठ कर रही हैं. और स्वयं को ब्राह्मण कन्या बता रही हैं. उनका हिसाब यह है कि यदि उनकी इस चुनावी तरकीब से भाजपा के पक्ष में हिंदू मतों का ध्रुवीकरण कमजोर पड़ गया तो फिर खेला हो जायेगा.

उधर, भाजपा का एक मात्र सहारा हिंदू ही हैं. वह हिंदुत्व की धारा को प्रखर और चटक बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रही है. वह हिंदुत्व को बंगाल की सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रवादी विचारधारा से जोड़ कर एक ऐसा कॉकटेल तैयार करने में लगी है, जिसके रसास्वादन से वृहत बंगाली समाज को कमल के सिवा कुछ दिखाई ही न दे.

भाजपा टीएमसी के भ्रष्टाचार, कुशासन, हिंसक राजनीति पर भी जोरदार हमले बोल रही है और इसका असर भी दिख रहा है. दरअसल भाजपा ऐसा माहौल बनाने में जुटी है, जिससे टीएमसी के खिलाफ बहुसंख्यक समाज में घृणा का भाव पैदा हो और वह ममता को सत्ता से बेदखल करने के लिए एकजुट हो जाये.

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भाजपा जानती है कि उसे बंगाल के चुनावी इतिहास में 2019 से पहले भाजपा को कभी भी चालीस प्रतिशत वोट नहीं मिले हैं. वह यह भी जानती है कि तब चुनाव के केंद्र में नरेंद्र मोदी थे, जिनके मुकाबले विपक्ष के किसी भी दल के पास कोई कद्दावर नेता नहीं था.

इसलिए वह इस लड़ाई को ममता बनाम मोदी बनाने में लगी हैं. लेकिन उसकी समस्या यह है कि वह अपने चालीस फीसद पिछले वोट बैंक को बरकरार कैसे रखे और इसमें पांच-छह फीसद का इजाफा कैसे करे. दूसरी ओर टीएमसी को हर चुनाव में चालीस से पैंतालीस फीसद वोट मिलते रहे हैं. उसे इस बार वोट बैंक को बरकरार रखने के लिए हर तरह का खेल करना पड़ रहा है, करना ही होगा. वरना असोल पोरिबर्तन हो जायेगा.

भाजपा और तृणमूल, दोनों की कोशिश कोशिश है कि कांग्रेस-वाम मोर्चा-आईएसएफ को कम से कम वोट मिलें. भाजपा चाहती है कि इस गंठबंधन को मिलने वाले हिंदू वोट उसकी तरफ खिसकें. टीएमसी चाहती है कि मुसलमान इस गंठबंधन को हर्गिज वोट न दें. तथा सेक्युलर हिंदू वोट भाजपा को हराने के लिए उसे समर्थन दें. वैसे भी कांग्रेस के परंपरागत मतदाता वाम मोर्चा को पसंद नहीं करते हैं.

क्योंकि वामपंथियों ने कांग्रेसियों को उसी तरह मारा-पीटा है, जिस तरह टीएमसी वाले भाजपाइयों को ठोंकते रहते हैं. स्वयं ममता बनर्जी भी वाम पंथियों के जुल्म-ओ-सितम का शिकार रही हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस समर्थकों ने गंठबंधन के बावजूद वामपंथी उम्मीदवारों के बदले टीएमसी प्रत्याशियों को वोट दिया था. तभी तो टीएमसी विधानसभा में 211 तक पहुंच गयी और कांग्रेस दूसरी बड़ी पार्टी बन कर उभरी.

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वाम मोर्चा तीसरे नंबर पर खिसक गया. भाजपा को तो खैर तीन सीटें ही मिली थीं. अब सवाल यह है कि जब बंगाल में कांग्रेस की हालत खस्ता है, तब उसका समर्थक वर्ग भाजपा के साथ जुड़ेगा या टीएमसी के साथ. यहीं से बंगाल चुनाव में जय-पराजय की राह फूटेगी. वाम मोर्चा के समर्थक दगाबाजी शायद ही करें. वे अपने गंठबंधन के साथ पिछली बार भी थे और इस बार भी रह सकते हैं.

उधर गंठबंधन के साथी आईएसएफ के अब्बास सिद्दीकी अपने असर वाली सीटों पर थोड़ा मुस्लिम वोट बहा ले गये तो खेला बिगड़ सकता है. हालांकि भाजपा को हराने के लिए मुसलमान अमूमन रणनीतिक वोट करते हैं. संभव है कि उसका एक तबका ममता के चंडीपाठ से नाराज हो और उसे समझाया जा रहा हो कि अब ममता भी भाजपा की राह चल पड़ी है.

इस बीच योगी आदित्यनाथ के चुनाव प्रचार में उतरने से नाथ संप्रदाय से जुड़े करीब साठ लाख परिवार अपने हिसाब से सक्रिय हो गये हैं. बंगाल गुरु गोरखनाथ की तपोभूमि है और योगी स्वयं गोरक्षपीठाधीरेश्वर हैं. बंगाल के सांस्कृतिक-सामाजिक परिवेश में नाथपंथियों का अच्छा प्रभाव है. कुल मिला कर चुनाव की इस सतरंगी बिसात पर पांसे फेंके जा रहे हैं.

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कदम-कदम पर शह-मात की तरकीब सोची जा रही है और किसी भी तरफ से कोई गलत चाल चली गयी तो सब उलट-पलट हो जायेगा. वैसे भी मुड़ेर पर बैठे करीब दस फीसद वोटर जिधर रुख करेंगे, विजयश्री उसी का वरण करेगी.

ये वोटर अभी खुले नहीं हैं और शायद खुले भी नहीं. वे चुपचाप जिस छाप पर बटन दबायेंगे, उसकी बांछें खिल जायेंगीं. पहले और दूसरे चरण में जंगलमहल की सीटों पर मतदान के बाद कुछ अंदाज लगेगा कि किसके किले में सेंध लगी है. और किसका दुर्ग ध्वस्त हो गया है.

उसके बाद भी पैंतरेबाजी होगी. चुनाव आठ चरण में हैं. इसलिए अंतिम चरण तक प्रचार के कई रंग दिखायी देंगे और उन रंगों का असर मतदाताओं पर पड़ेगा ही. बंगाल में ऐसा चुनाव कभी नहीं हुआ था. ममता जी खेला करना चाहती हैं तो भाजपा असोल पोरिबर्तन के लिए लामबंद है.

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