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चुनाव के पहले साड़ी और गैस बांटने के लिए सरकार बहा रही अरबों, लेकिन दो लाख लोगों की सैलेरी के लिए नहीं हैं पैसे

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Ranchi: राज्य में कितनी खुशहाली है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सूबे के दो लाख से ज्यादा लोगों को वेतन नहीं मिल रहा है. लेकिन सरकारी शानो-शौकत में कोई कमी नहीं है. चुनाव के मद्देनजर अरबों रुपए लाभकारी योजनाओं पर खर्च हो रहे हैं. साड़ी बांटने के लिए टेंडर निकाला जा रहा है.

उज्ज्वला योजना के तहत गैस बांटने का कार्यक्रम हर जिले में हो रहा है. सरकारी योजना के प्रचार-प्रसार पर भी करोड़ों खर्च हो रहे हैं. लेकिन सरकार सैलेरी देने से परहेज कर रही है.

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पारा टीचरों का तीन महीने का वेतन रोका

राज्य के 67 हजार पारा शिक्षकों का मानदेय तीन माह का रुका है. इनमें फरवरी, मार्च और अगस्त हैं. पारा टीचरों का कहना है कि उनके वेतन के लिए केंद्र की ओर से मिलनेवाली 40 प्रतिशत राशि का उपयोग राज्य सरकार ने चुनाव में किया था. जिसके बाद से इनका मानदेय रोक-रोक कर दिया जा रहा है.

जेटेट पास और कक्षा छह से आठ में कार्यरत पारा शिक्षकों को लगभग 15 हजार और जो पारा शिक्षक टेट पास नहीं हैं और कक्षा एक से पांच में कार्यरत हैं उन्हें 14 हजार मानदेय दिया जाता है. झारखंड राज्य शिक्षा परियोजना की ओर से पिछले दिनों आठ हजार पारा शिक्षकों का बायोमैट्रिक्स एटेंडेंस नहीं बनाने के कारण मानदेय रोक दिया गया है. हालांकि अपने स्थायीकरण और 17 जनवरी 2018 को मुख्यमंत्री के साथ हुए समझौते को लागू करने के लिए पारा शिक्षक फिर से आंदोलरत हैं.

5 सितंबर से इस आंदोलन की शुरुआत कर दी गयी. 12 सितंबर को प्रधानमंत्री रांची में रहेंगे. उनके कार्यक्रम के दौरान पारा शिक्षकों की ओर से तिरंगा के साथ न्याय मार्च निकाला जायेगा. पारा शिक्षकों के लिए स्थायीकरण नियमावली और वेतनमान तय करना है.

आंगनबाड़ी कर्मी वेतन की वजह से हड़ताल पर

राज्य को कुपोषण मुक्त बनाने में मुख्य भूमिका निभानेवाली आंगनबाड़ी सहायिका, सेविका और पोषण सखी का मानदेय सरकार ने जनवरी से रोक रखा है. पिछले साल हुए आगंनबाड़ी कर्मियों के आंदोलन के बाद मुख्यमंत्री ने सहायिका के मानदेय में 15,00 रुपये, सेविका के मानदेय में 750 रुपये बढ़ाने की बात की थी, लेकिन लगभग दस माह हो जाने के बाद भी इनका मानदेय इन्हें नहीं मिल पाया.

यहां तक कि राज्य सरकार ने पूर्व में जो मानदेय दिया जा रहा था वो भी रोक दिया. पूर्व में सहायिका को 4400 रुपये मिलते थे, बढ़ने के बाद 5900 मिलते, सेविका को 2200 रुपये और बढ़ने के बाद 2950 रुपये मिलते और पोषण सखी को इनकी नियुक्ति के समय से ही 3000 दिया जा रहा है. जो जनवरी से रुका है.

झारखंड राज्य आंगनबाड़ी कर्मचारी संयुक्त संघर्ष मोर्चा की ओर से राजभवन के समक्ष 21 अगस्त से आंदोलन जारी है. सेविकाओं की संख्या 38,432, सहायिका की संख्या 38,400 और पोषण सखी की संख्या 12 हजार है. कुल मिला कर लगभग 88 हजार. इनकी मुख्य मांग जनवरी 2018 को मुख्यमंत्री की ओर से किये गये समझौते को लागू करना है.

पंचायत सचिवालय कर्मियों को भी डेढ़ साल से कुछ नहीं मिला

राज्य में डेढ़ हजार पंचायत सचिवालय कर्मियों की नियुक्ति की गयी, वो भी प्रोत्साहन राशि के एवज में. अब स्थिति ये है कि सरकार पिछले डेढ़ साल से इन्हें ये प्रोत्साहन राशि भी नहीं दे पा रही है.

पंचायत सचिवालय कर्मियों को यह प्रोत्साहन राशि सरकार आपके द्वार कार्यक्रम में बने जाति, आवासीय आदि प्रमाण पत्रों के देने थे. जो प्रत्येक प्रमाण पत्र प्रत्येक व्यक्ति महज दस रुपये है. प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत तीन माह में एक आवास पूरा होने पर 12,000 रुपये और एक किसान के सर्वे पर 50 रुपये है.

राज्य में इनकी संख्या 18,000 है. आठ सितंबर से ये फिर से आंदोलन करेंगे. जिसके तहत सभी विधायकों को ज्ञापन दिया जायेगा. 19 सितंबर को मोरहाबादी से भिक्षाटन करते हुए पंचायत सचिवालय कर्मी भाजपा कार्यालय आयेंगे और जमा की हुई राशि भाजपा कार्यालय में दे देंगे. इनकी प्रमुख मांग प्रोत्साहन राशि हटा के मानदेय देना है.

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12 हजार शिक्षकों को नहीं मिल रहा वेतन

अनुदान की राशि भी राज्य सरकार नहीं दे पा रही है. राज्य में अनुदान से संचालित स्कूलों की संख्या 848 है, जिसमें लगभग 12 हजार शिक्षक कार्यरत हैं. ये ऐसे शिक्षक हैं, जिन्हें सरकार से मिलनेवाली अनुदान राशि से ही वेतन दिया जाता है. ये स्कूल और शिक्षक दोनों ही योजना मद अंतर्गत आते हैं.

साल 2018-19 के लिए राज्य सरकार ने इन स्कूलों के लिए 85 करोड़ राशि आवंटित की. लेकिन शिक्षा विभाग की ओर से मात्र 33 करोड़ रुपये ही इन स्कूलों को दिया गया. जबकि छात्रों और कक्षाओं के अनुसार इन स्कूलों को राशि दी जाती है. विभाग की ओर से कम राशि मिलने पर न ही स्कूलों में संसाधनों की पूर्ति हो रही और न ही शिक्षकों को वेतन.

राज्य भर के वित्त रहित शिक्षक वर्तमान में हड़ताल पर हैं. पिछले वित्तीय वर्ष में भी विभाग की ओर से एक भी राशि इन स्कूलों को आवंटित नहीं की गयी.

पैक्स व लैम्पस कर्मियों को दो साल नहीं मिला एक भी रुपया

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के कार्य में सहयोग करनेवाले पैक्स व लैम्पस कर्मियों के लिए विभागीय आदेश होने के बाद भी सरकार ने दो वर्ष से राशि रोक रखी है. फसल बीमा करने में कृषि विभाग को पैक्स और लैम्पस कर्मी सहयोग करते हैं. इनके द्वारा किसानों से फार्म भरवाये जाते हैं.

इसके एवज में पैक्स कर्मियों को प्रति फार्म 10 रुपया भुगतान करने सम्बंधी पत्र विभाग की तरफ से अगस्त 2018 में निकाला गया था. लेकिन दो वित्त वर्ष गुजर जाने के बाद भी पैक्स व लैम्पस कर्मी की मजदूरी का भुगतान राज्य सरकार ने नहीं किया.

राज्य में लगभग 4300 के करीब लैम्पस हैं जो फसल बीमा का कार्य करने में सहयोग करते हैं, किसानों का फसल बीमा करने से लेकर धान आदि की खरीद का कार्य भी लैम्पस के माध्यम से राज्य में किया जाता है.

व्यावसायिक शिक्षकों की नियुक्ति हुई पर वेतन नहीं

झारखंड के सरकारी स्कूलों में व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए व्यवसायिक शिक्षकों की नियुक्ति की गयी. यह सत्र 2016 से चालू किया गया है. राज्य में फिलहाल 388 हाई और प्लस टू के स्कूलों में चल रहा है. सभी 388 स्कूलों में दो-दो विभिन्न ट्रेडों की पढ़ाई करायी जा रही है.

पिछले 16 महीनों का मानदेय उन्हें नहीं दिया गया है. उन्होंने बताया कि सरकार की तरफ से उन्हें कहा जाता है कि निजी कंपनियां आपको वेतन का भुगतान करेंगी. वहीं निजी कंपनी से मांगने पर काम से निकालने की धमकी दी जाती है. व्यावसायिक शिक्षकों का कहना है कि शिक्षा विभाग की लापरवाही और निजी कंपनी के साथ मिली भगत से उन्हें वेतन का भुगतान नहीं किया जा रहा है.

विभाग कहता है कि कंपनी को वेतन रिलीज कर दिया गया है, पर कंपनी इससे इनकार कर देती है. व्यावसायिक शिक्षकों की नियुक्ति सुंदरलाल शर्मा केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान भोपाल के जरिये की गयी है.

सरकार का प्रचार करनेवाले एपीआरओ को भी वेतन नहीं

आइपीआरडी की तरफ से राज्य के हर जिले के लिए एपीआरओ नियुक्त किया गया है. एपीआरओ की नियुक्ति भी प्राइवेट एजेंसी से की गयी है. यह एक ऐसी एजेंसी है जो नियुक्ति देने के बाद एपीआरओ से जीएसटी वसूलती है. कंपनी इस मामले पर कुछ भी कहने से बचती है.

एपीआरओ कई बार कंपनी के सामने इस बात को रख चुके हैं. लेकिन कोई फायदा नहीं है. ऐसा मैसेज दिया जाता है कि नौकरी करनी है तो कंपनी के रूल के हिसाब से ही चलना होगा.

दूसरी तरफ इन एपीआरओ की भी सैलेरी सरकार ने तीन महीने से रोकी हुई है. रोजगार का संकट ऐसा है कि बिना सैलेरी के ही लोगों को काम करना पड़ रहा है.

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