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सरकार रघुवर की हो या किसी और की, अधिकार पाने के लिए सत्ता से संघर्ष करते रहना होगा : बाबूलाल मरांडी

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Ranchi : आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों और कानून एवं नीतिगत पहलुओं पर रविवार को कार्यशाला का आयोजन किया गया. इस मौके पर झाविमो सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी ने कहा कि राज्य में कानून और संविधान प्रदत्त अधिकारों को पाने के लिए सत्ता से समाज को हमेशा संघर्ष करते रहना होगा. चाहे सरकार रघुवर की हो या किसी और की. उन्होंने कहा कि पिछले चार सालों में आदिवासी अधिकार पर लगातार हमले होते जा रहे हैं. रघुवर सरकार ने आदिवासियों को बांटने का काम किया है. अब समय आ गया है कि हम अपने आधिकारों को लेकर एकजुट हों और एकजुटता के साथ रघुवर सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकें.

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आदिवासी समाज के समक्ष खड़ी चुनौतियों पर हुआ विमर्श

कार्यशाला में आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों और कानून एवं नीतिगत पहलुओं पर विचार-विमर्श करते हुए गंभीर विषयों पर विचार-मंथन हुआ. इसमें आदिवासियों की जमीन आदिवासियों के हाथ से गैर कानूनी ढंग से गैर आदिवासियों को हस्तांतरित करने, पांचवीं अनुसूची का सही ढंग से अनुपालन नहीं करने, महागठबंधन में झारखंड मुक्ति मोर्चा का रुचि न लेना, राजनीतिक स्वार्थ के लिए भूमि कानूनों में संशोधन का अनुमोदन करने जैसे गंभीर विषयों पर चर्चा की गयी. साथ ही आदिवासी समाज के समक्ष चुनौतियों पर विचार-विमर्श कर भावी रणनीति तैयार की गयी.

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भाजपा सरकार ने धर्म को लेकर आदिवासी समाज को बांटने की कोशिश की : बंधु तिर्की

इससे पहले कार्यशाला का विषय प्रवेश कराते हुए पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि आज राज्य में संविधान प्रदत्त अधिकारों पर हमला तेजी से हो रहा है. इससे जल, जंगल, जमीन के समक्ष बड़ा संकट खड़ा हो गया है. पिछले चार सालों में भाजपा सरकार ने धर्म को लेकर आदिवासी को बांटने की कोशिश की. फिर कुर्मी, तेली को  आदिवासी बनवाने के लिए आंदोलन शुरू किया गया. जमीन से जुड़े कानून को भी बदलने की कोशिश हुई, नौकरियों में स्थानीय लोगों को दूर रखने की साजिश की गयी. ऐसे कई विषय हैं, जिनपर आदिवासियों को हशिये पर लाने की साजिश की गयी. ऐसे में आदिवासी समाज को गहन चिंतन-मंथन करने की जरूरत है, ताकि आनेवाले समय में झारखंडी विरोधी सरकार को राज्य में बनने न दिया जाये. इस कार्यशाला में बड़ी संख्या में शिक्षाविद, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ताओं और रजनीतिक कार्यकता मौजूद थे.

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एकजुटता के साथ संघर्ष करने की जरूरत : करमा उरांव

प्रेमचंद मुर्मू ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि रघुवर सरकार की उपलब्धियों को अगर हम गिनेंगे, तो पायेंगे कि जमीन से संबंधित कानूनों में संशोधन के हिडेन एजेंडा पर ही यह सरकार काम करती रही है, जिससे आदिवासियों का अस्तित्व मिट जायेगा. करमा उरांव ने कहा कि देश की आजादी के बाद से ही संवैधानिक कानूनों को आदिवासी इलाके में लागू नहीं किया गया. आज देश में 12 से 13 करोड़ आदिवासी हैं, जो कि पूरी तरह हाशिये पर चले जा रहे हैं. जरूरत है एकजुटता के साथ सत्ता में बैठे लोगों के खिलाफ संघर्ष करने की.

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झारखंडी सरकार बनाने की पहले करें : दयामनी बरला

दयामनी बरला ने अपने संबोधन में कहा मजबूत इच्छाशक्तिवाली सरकार का राज्य में गठन हो, इसके लिए हमें प्रयास करना चाहिए. संघ और भाजपा के शासन में राज्य की आम अवाम हाशिये पर चली गयी है. अब हम सबों को मिल-बैठकर झारखंडी सरकार बनाने की पहल करनी चाहिए. वहीं, पूर्व सांसद रामेश्वर उरांव ने कहा कि कानून का पालन कराने के लिए समाज को सशक्त होना होगा. जब तक हम सशक्त नहीं होंगे, कानून को ऐसे ही नजरअंदाज किया जाता रहेगा.

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भाजपा और संघ की सरकार को उखाड़ फेंकने की है जरूरत : ग्लैडसन डुंगडुंग

ग्लैडसन डुंगडुंग ने अपने संबोधन में कहा कि अब भाजपा और संघ की सरकार को देश और राज्य से उखाड़ फेंकने की जरूरत है. ऐसे में अगर विपक्षी दलों का गठबंधन नहीं होता है, तो राजनीतिक लड़ाई हम हार जायेंगे. झारखंड मुक्ति मोर्चा महागठबंधन से क्या दूर भागना चहता, हेंमत सोरेन को यह बताना चहिए. महागठबंधन में जेएमएम अगर शमिल नहीं होता है, तो यह सफ हो जायेगा कि वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का राज्य में शासन चहता है, जहां आदिवासी-दलितों की जमीन की लूट निरंतर होतत रहेगी. कार्यशाला को पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव, शिक्षाविद डॉ कर्मा उरांव,  पूर्व मंत्री थिओडोर किड़ो, प्रकाश चंद्र उरांव सहित कई वक्ताओं ने संबोधित किया.

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