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बैभव सिन्हा की हालत पर रोना आया…

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Dhanbad: हो सकता है कि आप बैभव सिन्हा को नहीं जानते हों. वह इन दिनों धनबाद मंडलकारा में बंद हैं. कोयलांचल धनबाद का इतिहास जाननेवाले बीपी सिन्हा को जानते हैं. जिनका दशकों तक कोयलांचल में एकछत्र राज था. सब उनकी हुक्म से चलता था.

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आज कोयलांचल की राजनीति में जो दबंग परिवारों से आनेवाले विधायक, सफेदपोश और कोलियरियों में हैसियतवाले लोग हैं, सबकी तरक्की सिन्हा साहब की कृपा से ही हुई. उनके जिंदा रहने तक कोयलांचल में कोई दूसरी ताकत नहीं थी. सब सिन्हा साहब के ही मोहरे थे. उसकी हत्या से उनके एकछत्र शासन का अंत हुआ. राजदेव राय जैसे कुछ बाहुबलियों ने उनका नाम ढोया तो सिर्फ इसलिए कि उनकी तरह दबदबा कायम कर सकें.
लेकिन, समय के साथ लोग भूल गये कि सिन्हा साहब कोयलांचल की बड़ी शक्ति थे. उनके एकमात्र पुत्र राजनीति प्रसाद सिन्हा ने भी राजनीति में घुसपैठ की कोशिश की. मगर, सफल नहीं हो पाए. सिन्हा साहब के बूते राजनीति में मुकाम पाए मंत्री रहे एसपी राय ने ही इस परिवार पर नकेल कस दी. बाद में राजनीति प्रसाद सिन्हा की पतोहू डा. उर्मिला सिन्हा ने भी धनबाद नगर निगम के मेयर का चुनाव लड़कर राजनीति में जगह बनाने की कोशिश की.

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मगर, काफी पूंजी लगाकर भी वह इसमें नाकाम रहीं. सिन्हा साहब का मशहूर व्हाइट हाउस और अंग्रेजी मैम इतिहास की बात है. अब तो वहां टेस्ट ऑफ एशिया नाम का रेस्टोरेंट है, जिसे डा. उर्मिला सिन्हा का पुत्र बैभव सिन्हा चलाता है. कुछ वर्षों से बैभव रेस्टोरेंट के साथ कांग्रेस की राजनीति का जायका ले रहा है. राजनीति में इसकी बड़ी महत्वाकांक्षा को कोई बर्दाश्त नहीं करता. स्थिति है कि दर्जनभर किराये के लोगों के साथ बैभव ने अपनी पहचान के लिए रणधीर प्रसाद वर्मा चौक पर कभी डिबरी जलाकर पढ़ाई की तो कभी कुछ और किया.

अपनी खास पहचान के लिए रखे कुछ बाउंसर

बैभव सिन्हा ने राजनीति में कदम रखने से पहले ही अपने साथ कुछ बाउंसर अपनी खास पहचान के लिए रख लिए. इन बाउंसरों ने नेताओं की भीड़ में इनको किसी कार्यक्रम में बड़े नेताओं के साथ फोटो खिंचवाने में मदद की. बैभव ने मीडिया के लोगों से खास संबंध बनाकर खुद को राजनीति में स्थापित करने की भरसक कोशिश की. इनकी बढ़ती महत्वाकांक्षा के बीच घटनाक्रम कुछ ऐसा हुआ कि आज बैभव अकेले पड़ गये हैं.

खुद को चमकाने की कहानी महंगी पड़ी

बता दें कि कुछ दिन पहले इनके रेस्टोरेंट में एक युवती के साथ कुछ लोग एकांत में थे. यहीं कुछ बात हुई. मामला बढ़ा. बैभव ने खुद पर हमले की कहानी बनायी. अपनी और अपने लोगों की बहादुरी बताई. खुद पर गोली चलने की बात की. पिस्तौल छीनने की बात कही और उसे पुलिस के सुपुर्द भी किया. पहले तो पुलिस ने इसी कहानी को मान लिया. मान लिया कि प्रतिबंधित मांस मांगने पर बखेड़ा हुआ पर जब दूसरा पक्ष अड़ गया तो कहानी ही पलट गयी. मारपीट, लड़की से छेड़छाड़ के बाद अभी हाल में अवैध आग्नेयास्त्र रखने का मामला भी जुड़ गया.

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परिवार के लोग अलग-थलग पड़े

जिस दिन बैभव को पुलिस ने गिरफ्तार किया. उसी दिन खबर आयी कि गिरफ्तारी का विरोध करने के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डा. अजय कुमार धनबाद आएंगे. लेकिन दूसरे दिन खबर आयी कि वह नहीं आएंगे. एक जांच कमेटी बना दी गयी. अब तो कांग्रेस के लोग इस प्रसंग की चर्चा भी नहीं करते हैं. कोई बैभव की बात भी नहीं करता. गिरफ्तारी का ब्रह्मर्षि समाज ने शुरुआत में विरोध किया था. इसके बाद गिरफ्तारी के विरोध में जब धरना देने की बात हुई. बैभव की पत्नी और घर के सदस्यों के सिवा कोई साथ नहीं आया. ऐसा नहीं कि यह सिर्फ बैभव के साथ हुआ है. ऐसा होते आया है. बहरहाल, बैभव के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्न चिह्न लग गया है.

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