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संताल परगना में बाहा पर्व की धूम, तीन दिन तक चलता है त्योहार

बाहा का अर्थ फूल होता है, प्रकृति से जुड़े इस पर्व में लोगी पानी से खेलते है होली

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Dumka: संताल परगना में इन दिनों संताल समुदाय बाहा पर्व मनाने में जुटा है. बाहा आदिवासी बाहुल्य गांवों में हिन्दुओं के प्रमुख त्योहार होली की तरह मनाया जाता है.

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लेकिन यहां रंगों की जगह सिर्फ पानी का प्रयोग होता है. तीन दिनों तक चलनेवाले बाहा पर्व को लेकर संताल के लोगों में उमंग और उत्साह देखने को मिल रहा है. बाहा शब्द का अर्थ फूल होता है. ये प्रकृति और मानव के संबंधों से जुड़ा एक त्योहार है.

बाहा पर्व में संथाल समाज के लोग होली तो खेलते हैं, लेकिन कोरे पानी से. पर्व में साल वृक्ष के फूलों का विशेष महत्व होता है. जामा प्रखंड के अधिकांश गांव में यह त्योहार संताल समुदाय के द्वारा मना लिया गया है. लेकिन अभी भी कुछ गांवों में इस त्योहार को मनाया जा रहा है.

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तीन दिनों तक मनाते हैं बाहा

बाहा पर्व का पहला दिन बहुत धूमधाम और हर्षोल्लास से गांव के जाहेर थान में मनाया जाता है. पर्व के दूसरा दिन को बोंगा माह कहते हैं. पहले दिन को ही जाहेर थान में जाहेर की छावनी (पुआल की छत) बनाते हैं, जिसे जाहेर दाप माह कहते हैं.

बाहा पर्व का दूसरा दिन बोंगा माह है. इसपर ग्रामीण गांव के नायकी (पुजारी) को उसके आंगन से नाच-गाने के साथ सम्मान के साथ जाहेर थान ले जाते है. वहां पहुंचने पर नायकी बोंगा दारी (पूज्य पेड़) सारजोम पेड़ (सखुवा पेड़) के नीचे पूज्य स्थलों का गेह-गुरिह किया जाता है. अर्थात गोबर और पानी से सफाई/शुद्धिकरण किया जाता है.

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उसके बाद उसमें सिंदूर लगा कर, मातकोम (महुआ) और सारजोम (सखुआ) का फूल चढ़ाते हैं. बाहा पर्व में जाहेर ऐरा, मारांग बुरु, मोड़ेकू-तुरुयकू धोरोम गोसाई आदि ईष्ट देवी-देवताओं के नाम पर बलि दी जाती है. नायकी सभी महिला-पुरुष और बच्चों भक्तों को सारजोम पेड़ (सखुआ पेड़) का फूल देते हैं.

फूल ग्रहण करने पर सभी ग्रामीण नायकी को डोबोह करते हैं. जिसे पुरुष भक्त कान में और महिला भक्त बाल के खोपा में लगाते हैं. बाद में अखड़ा नायकी के द्वारा बाहा गान के माध्यम से मानव सृष्टि की कहानी सुनायी जाती है. ग्रामीणों ने टमाक, तुन्दाह आदि बजाकर बाहा नाच-गान करते हैं.

नाच-गान और प्रसादी ग्रहण करने के बाद सभी ग्रामीण नायकी को फिर से नाच-गान करते हुए गांव ले जाते हैं. जहां नायकी गांव के सभी घरों में सारजोम (सखुआ) का फूल देते हैं और सभी ग्रामीण घर वाले नायकी के सम्मान में उनका पैर धोते हैं. फूल मिलते ही ग्रामीण एक-दूसरे पर पानी की बौछार करते हैं और इसका आनंद लेते हैं.

शरदी माह होता है पर्व का आखिरी दिन

तीसरे और अंतिम दिन को शरदी माह कहते हैं. इस दिन भी सभी ग्रामीण एक-दूसरे पर पानी डालते हैं, नाचते-गाते हैं और एक-दूसरे के घर जाते हैं और खाना-पान करते हैं. संताल आदिवासी बाहा पर्व सृष्टि के सम्मान में मनाते हैं.

इसका प्रकृति और मानव के साथ सीधा संबंध है. इसी समय सभी पेड़ों में फूल आते हैं. बाहा का शाब्दिक अर्थ फूल होता है. बाहा त्योहार में प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव दिखता है. इस त्योहार को आदिवासी समुदाय विभिन्न नाम से मनाता है.

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