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बीजेपी में वापसी से उभरी बाबूलाल की छवि राजनीति की त्रासदी ही है

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Faisal Anurag

झारखंड की राजनीति को दल बदलने वाले तीन नेता कितना बदल पाएंगे. बाबूलाल मरांडी ने अपने ही दल और विचारों को भारतीय जनता पार्टी के साथ विलय किया, तो उन्हीं के दल के दो अन्य विधायकों प्रदीप यादव और बंधु तिर्की ने कांग्रेस का दामन थामा.

2019 के झारखंड विधानसभा चुनाव में झारखंड के लोगों ने दो टूक जनादेश दिया था. इससे यह उम्मीद बनी ही थी कि झारखंड अपनी ही राजनीतिक दलबदल की विरासत का पीछा छोडेगा. लेकिन इस घटनाक्रम ने लोगों के निर्णय को एक बार फिर झटका दिया है.

बाबूलाल मरांडी ने विलय समारोह में इस रहस्य से परदा तो उठा दिया कि ठीक चुनाव के बाद ही उन्होंने फैसला क्यों लिया है, लेकिन इसके साथ ही भाजपा के खिलाफ की राजनीति को लेकर बाबूलाल ने जो कुछ कहा, उससे उभरी उनकी छवि, राजनीति की त्रासदी ही है.

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मरांडी ने कहा कि 2009 के बाद से ही कई बार भाजपा में वापसी के लिए दूतों ने संपर्क किया.  2014 में ही भाजपा में जाने का इरादा भी बना चुके थे. लेकिन चुनाव की हार के बाद उन्होंने नहीं जाने का फैसला किया. उनसे अलग हो भाजपा में गये छह विधायकों ने भी तो यही कहा था. लेकिन बाबूलाल मरांडी ने इसका खंडन किया था.

उनकी बातों और घटनाक्रम का यह भी संकेत है कि 2019 के चुनाव के दौरान ही भाजपा में वापसी या तालमेल के लिए वे तैयार हो चुके हैं.  जिससे राजनीति की पूरी प्रक्रिया ही संदेहास्पद बनती है.

एक तरफ तो चुनावों में जनता के बुनियादी सवालों को केंद्रित करने की बात की जा रही है. वहीं परदे के पीछे जो खेल होता है, वह बताता है कि राजनीति में कॉरपोरेट वर्चस्व और नई अर्थनीति ने विचारधारा रहित राजनीति की जमीन तैयार कर दी है.

दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद एक नई उम्मीद तो जरूर पैदा हुई है, लेकिन झारखंड का घटनाक्रम बताता है कि राजनीतिक दल अभी भी विचारधारात्मक और बुनियादी सवालों पर राजनीति के लिए तैयार नहीं हैं. इसी कार्यक्रम से यह भी संकेत साफ हुआ है कि भारतीय जनता पार्टी उग्र हिंदुत्व के अपने एजेंडे को दिल्ली चुनाव की हार के बाद और भी तेज करेगी.

आरएसएस ने भी इसके संकेत दिये हैं. दिल्ली में वे चुनाव जरूर बुरी तरह हार गये, लेकिन भाजपा को इस बात का संतोष है कि उसके उग्र प्रचार के कारण उसके वोट शेयर में छह प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है.

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भाजपा ने हिंदु बनाम मुसलमान का इस चुनाव का इस्तेमाल किया. हालांकि दिल्ली ने बुनियादी सवालों शिक्षा,स्वास्थ्य,बिजली पानी को प्रमुख्ता दिया. लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता है कि जिस जनता ने केजरीवाल को वोट दिया है. उसने 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने निर्णय पर पश्चाताप किया है.

लोकसभा चुनाव के बाद हुए तीन चार राज्यों के चुनावों में भाजपा एक को छोड कहीं सरकार नहीं बना सकती है. हरियाण में भी उसने अपने ही खिलाफ चुनाव लड़ा, चौटाला की पार्टी के साथ तालमेल कर सरकार में वापसी किया, तो बीजेपी की पुरानी सहयोगी शिवसेना महाराष्ट्र में उससे अलग हो गयी.

लेकिन झारखंड का चुनाव इस अर्थ में बिलकुल अलग है, क्योंकि यहां भाजपा की हार सामान्य नहीं है. उसके वोट शेयर में भी इजाफा नहीं के बराबर ही हुआ. भाजपा की राजनीति के खिलाफ जनादेश होने के बाद भी बाबूलाल मरांडी का भाजपा के साथ जाना बताता है कि राजनीति में पादर्शी नेतृत्व और वैचारिक दृढता वाले नेतृत्व की आकांक्षा अब भी दूर का ही सवाल है.

प्रदीप यादव और बंधु तिर्की का कांग्रेस में जाना भी इन्हीं सवालों को खड़ा करता है. यह तो सही हे कि उन दोनों की जीत भाजपा के खिलाफ पड़े वोट के कारण हुआ. लेकिन उन्हें कांग्रेस से संबंध बनाने का जनादेश भी नहीं था. भाजपा विरोधी मार्चे के वे हिस्सा भी नहीं थे, लेकिन चुनाव के पहले तक कई आंदोलनों में वे विभिन्न भाजपा विरोधी दलों के साथ मार्च में शामिल थे.

बावजूद जिस हड़बड़ी और जल्दबाजी में इस तरह के विलय का कदम उठाया गया है, वह कई नैतिक सवाल तो खड़े करता ही है. जाहिर है झारखंड का राजनीतिक भविष्य इससे उज्ज्वल नहीं दिखता है.

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