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आयुष्मान भारत : झूठे आंकड़े पेश कर खोखला ढोल पीट रही है झारखंड सरकार

Ritesh Sarak

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Giridih : केंद्र सरकार की महत्वकांक्षी प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना पर झारखंड सरकार और राज्य भाजपा भले ही अपना ढोल पीटकर इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है, हकीकत में यह उतना ही खोखला और कमजोर है. राज्य सरकार पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा झारखंड में इस योजना की ऐतिहासिक शुरूआत को आजतक की अपनी सबसे बड़ी जनकल्याणकारी कदम साबित करने पर तुली हुई है. लेकिन आंकड़ें और इसके सही कार्यान्वयन नीति का अभाव इस योजना की सफलता पर अभी से सवाल खड़े कर रहे हैं. आत्मप्रचार और वाहवाही बटोरने के चक्कर में सरकार झूठे आंकड़ों की बाजीगिरी में खुद उलझती जा रही है.

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 राज्य की 80 फीसदी आबादी को लाभ देने का दावा झूठा

झारखंड भाजपा में अपने प्रचार में यह दावा किया है कि राज्य की 80 प्रतिशत आबादी इस योजना से जुड़ चुकी है. यह सरासर फर्जी आंकड़ा है. सरकार के मुताबिक राज्य के कुल 57 लाख बीपीएल आबादी को इस योजना से लाभ मिलेगा. इसमें लाल और पीला राशन कार्डधारी आबादी शामिल है. अब सवाल उठता है कि क्या झारखंड की 80 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे है. अगर यह आंकड़ा सही है जो सरकार खुद बता रही है तो स्थिति और भी भयावह है. क्या झारखंड में गरीबी घटने के बजाए बेतहाशा बढ़ी है. तो फिर सरकार के सभी विकास कार्यों का लाभ किसे मिला.

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80 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं तो कई सवाल खड़े होते हैं

अब चलिए यह भी बताते हैं कि दरअसल सरकार ने इसे राज्य की आबादी का 80 फीसदी कैसे माना. 2011 की जनसंख्या रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड की कुल जनसंख्या लगभग 3 करोड़ 30 लाख है. सरकार ने इस संख्या से राज्य की कुल बीपीएल आबादी लगभग 2 करोड़ 63 लाख का प्रतिशत निकाल लिया, जो कि आंकड़े के मुताबिक 80 फीसदी ही निकलता है. लेकिन राज्य सरकार यह भूल गई कि उसने कुल आबादी के जो आंकड़े लिए हैं वो 2011 के थे और बीपीएल जनसंख्या के आंकड़े सितंबर 2018 के हैं.

अगर 2011 में राज्य में बीपीएल आबादी की बात करें तो यह कुल आबादी की लगभग 39 फीसदी थी. जाहिर है 2011 से 2018 तक राज्य की आबादी बढ़ी होगी. लेकिन फिर भी जनसंख्या का 80 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे होना बहुत सारे सवाल खड़े करता है. अगर यह आंकड़े सही है तो फिर यह जांच का विषय है कि आखिर बीपीएल परिवार घटने के बजाए तेजी से बढ़ कैसे गए. यह बात बड़े पैमाने पर फर्जी बीपीएल घोटाले की ओर इशारा करती है. सवाल यह है कि इसी फर्जी आंकड़ों के सहारे भाजपा सरकार कितने योग्य जरूतमंदों को नि:शुल्क और कैशलेश चिकित्सा दे पाएगी.

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बड़े निजी अस्पतालों ने इस योजना से पल्ला झाड़ा

हर बीपीएल परिवार को हर साल 5 लाख रुपये का चिकित्सा बीमा देने की बात इस योजना में कही जा रही है. जाहिर है कि हर गरीब परिवार को इस योजना से जरूरत के समय बड़े निजी अस्पतालों में फ्री चिकित्सा का ख्वाब सरकार दिखा रही है. लेकिन हकीकत यह है कि बड़े और प्रतिष्ठित निजी अस्पतालों ने ही इस योजना को खारिज कर दिया है.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर ने पहले ही इस योजना में निजी अस्पतालों को मिलनी वाली राशि को कम बताते हुए अपनी मंशा सरकार को साफ बता दी है. हकीकत यह है कि सरकार के दावों के विपरित देशभर का कोई भी बड़ा अस्पताल समूह इस योजना से अभी तक नहीं जुड़ा है. इनमें झारखंड के मेडिका, मेदांता, ऑरचिड समेत कई बड़े अस्पताल शामिल हैं. सरकार भी बड़ी होशयारी से इस बात को छुपा रही है. आयुष्मान भारत योजना के आधिकारिक वेबसाइट के प्राइवेट हॉस्पिटल इम्पैनलमेंट वाले सेक्शन में आपको एक भी निजी अस्पताल का नाम नहीं मिलेगा. अब लाख टके का सवाल यही है कि आयुष्मान भारत का कार्ड लिए मरीज आखिर इलाज के लिए जाएगा कहां.

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