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टीबी रोग से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर जागरुकता जरूरी

रीच ने आयोजित की राउंडटेबल परिचर्चा

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Ranchi: यक्ष्मा रोग नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) के तहत जितने भी काम धरातल पर किये गये हैं, उसके नतीजे अब रोग के नियंत्रण पर स्पष्ट तौर पर दिखायी दे रहे हैं. पहले के मुकाबले इस बीमारी के बारे में न केवल जागरूकता बढ़ी है बल्कि जांच व ईलाज की सुविधा बढ़ने से टीबी के नये मामलों की पहचान में भी सफलता मिल रही है. शुक्रवार को टीबी रोग के लिए कार्य करने वाली स्वंय सेवी संस्था रीच ने रांची प्रेस क्लब में पत्रकारों के लिए राउंडटेबल कांफ्रेंस का आयोजन किया, जिसमें उपरोक्त विचार सामने आये. चर्चा में यह विचार भी उभर कर आया कि इस रोग से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर जागरुकता जरूरी है. रिपोर्टिंग ऑन टीबी विषय पर हुई परिचर्चा में कई पत्रकारों ने टीबी से जुड़े अपने अनुभव और सुझाव को सबके सामने रखा. रीच की कन्सल्टेंट डॉ जया श्रीधर ने टीबी के आंकड़ों और उसके विषलेशण पर चर्चा की. डब्ल्यूएचओ के कंसल्टेंट डॉ राजाभाउ यवले ने झारखंड में टीबी से जुड़े आंकड़ों पर कार्यक्रम में मौजूद पत्रकारों के साथ चर्चा की।. स्टेट टीबी अधिकारी डॉ राकेश दयाल ने कहा कि झारखंड ने टीबी उन्मूलन की दिशा में बेहतर कार्य किए हैं, हालांकि अब भी बीमारी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए सबकी सहभागिता जरूरी है.

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टीबी विजेताओं ने साझा किये अनुभव

कार्यक्रम के दौरान टीबी से जंग लड़कर इसे मात देने वाली गिरिडीह की रेखा वर्मा और गढ़वा, रमना के उपेंद्र कुमार ने अपने संघर्ष की मार्मिक कहानी सुनायी. इस दौरान टीबी पर नियंत्रण के लिए और बेहतर समन्वय की रणनीति तैयार की गयी. कार्यक्रम में दिवाकर शर्मा, मिलन जैकब, रीच के डॉ पंकज ढींगरा, अनुराधा पंडा, लोपामुद्रा के साथ ही कंसल्टेंट डॉ जया श्रीधर ने मुख्य भूमिका अदा की.

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निजी क्षेत्र की सहभागिता से बनेगी बात

टीबी उन्मूलन में निजी क्षेत्र की सहभागिता बेहद जरूरी है. टीबी जैसे धातक रोग के एक बड़े हिस्से (50 प्रतिशत) का ईलाज निजी क्षेत्र में होता है. पिछले साल जहां 1778 लोगों ने टीबी का ईलाज प्राईवेट अस्पतालों में कराया था इस बार यह आंकड़ा बढ़कर 2638 तक जा पहुंचा है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि केंद्र सरकार ने नए नियमों के तहत निजी क्षेत्र से निश्चय पोर्टल पर जानकारी देना अनिवार्य कर दिया है. राज्य में ईलाज व जांच की सुविधा की पहुंच बढ़ी है. रीच के आंकड़ों की मानें तो इस क्षेत्र से 1900 चिकित्सक और 356 केमिस्ट आज टीबी मरीजों का उपचार कर रहे हैं. आरएनटीसीपी में चिकित्सकों व मरीजों व अभियान से जुड़े कर्मियों को भी आर्थिक लाभ दिया जा रहा है जिसका नतीजा कि 10 रोगियों में 9 इस प्रोग्राम के तहत टीबी से निजात पा रहे हैं.

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