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हर चुनाव में भावनात्मक सवालों पर मतदाताओं को रिझाने का प्रयास भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरा

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Faisal Anurag

शायद भारत इकलौता ऐसा लोकतंत्र है, जहां चुनाव के समय केवल भावनात्मक सवालों पर मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया जाता है. सांप्रदायिकता, पाकिस्तान और मुसलमान चुनावों के केंद्र में रखने की रवायत संविधान के मूलभूत मूल्यों के विपरीत है.

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दिल्ली के चुनाव को विकास, शिक्षा और स्वस्थ्य की पटरी से उतारने की जो कोशिश दिनरात हो रही है, उसका निहितार्थ तो यही है. चुनाव को संपन्न कराने वाली संस्थाएं के रुख  के कारण इस तरह की प्रवृति बढ़ती जा रही है.

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आमतौर पर चुनाव के लिए बनी आचार संहिता को पालन कराने का अधिकार चुनाव आयोग को है. चुनाव आयोग के पास यह अधिकार है कि वह किसी भी तरह के भेदभाव फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठा सकता है. उसे तो उम्मीदवारी तक रद्द करने और पार्टियों की मान्यता खत्म करने तक का अधिकार है.

लेकिन पिछले कुछ समय से चुनाव आयोग को लेकर देश भर में यह राय बनी है कि वह सत्ता के खिलाफ किसी भी तरह का सख्त कदम उठाने से खुद को बचाता है. दिल्ली के चुनाव में जिस तरह अल्पसंख्यकों के खिलाफ नेता बयान दे रहे हैं उस पर अब तक किसी भी तरह की सख्ती नहीं दिखायी गयी है.

एक मंत्री ने गोली मारने का नारा लगाया और एक संसद ने मस्जिदें गिरा देने और शाहीनबाग के प्रदर्शन पर घरों में घुस  कर रेप तक करने की बातें कहीं. लेकिन चुनाव आयोग ने दोनों को केवल नोटिस ही दिया है.

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कपिल मिश्रा जिन्होंने पाकिस्तान बनाम भारत का चुनाव की बात कही, 48 घंटे के बाद नफरत वाली बातें करते हुए प्रचार अभियान में फुर से जुट गये हैं.

नरेंद्र मोदी ने 26 जनवरी को अहिंसा पर अमल करने का आह्वान मन की बात रेडियो कार्यक्रम में की थी. लेकिन इस तरह के हिंसक बयानों पर उनकी रहस्यमय चुप्पी बनी हुई है. अमित शाह के भाषणें में तो उग्रता चरम पर हे. ऐसा लगता ही नहीं कि वे देश के गृहमंत्री भी हैं.

जिनकी मुख्य जिम्मेवारी आंतरिक शांति बनाये  रखने की है.

न्यूज चैनल खोलते ही जिन मुद्दों पर चर्चा सुनायी पड़ती है, उससे हिंसक भीड़ का ही निर्माण हो रहा है. आखिर नफरत को इस हद तक सार्वजनिक मंचों से प्रोत्साहित किया जाना या मीडिया में दिखाया जाना  सामान्य परिघटना तो नहीं ही है.

यदि विधानसभा चुनावों के पिछले कुछ सालों का ट्रेंड देखा जाये तो साफ महसूस होता है कि वे सभी एक ही तरह के प्रचार के शिकार बना दिये गये हैं. इनमें मीडिया की एक बड़ी भूमिका भी रही है. कोई भी लोकतंत्र मीडिया के इस तरह की भूमिका को स्वीकार नहीं कर सकता है.

लेकिन भारत में इस तरह की मीडिया का ही प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है.

वोटरों की समस्या यह है कि वह तथ्यात्मक सूचना और मुद्दों से बेदखल कर दिया गया है. सत्तापक्ष के लिए यह सबसे मुफीद माहौल है. क्योंकि वह विकास और रोजमर्रा के सवालों को वोट का अधार नहीं बनने देना चाहता है.

भारत की अर्थव्यवस्था की सच्चाई सामने है. बेरोजगारी चरम पर है. पिछले तीन सालों में लगभग साढ़े तीन करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया है. विकास का कोई ऐसा मानक नहीं है जो राहत दे रहा हो. अब केवल यही कहा जा रहा है कि इस संकट से अर्थव्यवस्था जल्द निजात पा लेगी. और ग्रोथरेट भी हासिल कर लेगी.

बांग्लादेश जहां 8 प्रतिशत की दर से विकास रेट बनाये हुए है, वहीं भारत की विकास दर 5 प्रतिशत से कम हो गयी है. अगले वित्त वर्ष के जो अनुमान वित्तीय एजेंसियां लगा रही हैं, वह भी कोई सुकून नहीं दे रहा है. अनेक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था का संकट बेहद गंभीर है.

आइएमएफ जैसी संस्था तो भारत की गिरती विकास दर से विश्व विकास दर के घटने की बात कर रहा है. भारत का आर्थिक संकट वैश्विक आर्थिक विकास के ठहराव को कम कर रहा है. यह गंभीर बात है. यह बात अगर दुनिया की बड़ी एजेंसियां कह रही हैं तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत दस अंक नीचे फिसल कर दुनिया के पचास की सूची से बाहर हो गया है. दुनिया के अनेक देश भारत के लोकतंत्र को ले कर लगातार चिंता प्रकट कर रहे हैं.

बावजूद इसके भारत में गंभीर विकास के मुद्दे पर गंभीरता से बात का नहीं किया जाना और मतदाताओं को इन सवालों के बजाय हिंदू मुसलमान और पाकिस्तान के इर्दगिर्द ले जाने का प्रयास, बड़ी चिंता का विषय है.

मतदाताओं ने कई राज्यों में इस तरह की घेराबंदी को तोड़ा भी है. झारखंड के विधानसभा के चुनाव परिणाम इस बात के सबूत हैं. झारखंड के चुनाव प्रचार को भी सांप्रदायिकता के इर्दगिर्द केंद्रित करने का पूरा प्रयास किया गया था.

नरेंद्र मोदी ने कपड़ों से पहचान करने की बात की थी. और अमित शाह ने 370 और राम मंदिर को ही अपने भाषणों को केंद्र में रखा था. अब दिल्ली का चुनाव सामने है. देश की राजधानी के मतदाताओं के लिए 8 फरवरी परीक्षा की वह घड़ी है, जब वे साबित करेंगे कि वे वोट देने के लिए किन सवालों से प्रभावित हैं.

आज के राजनीतक परिवेश की यह विशेषता नहीं है कि उन्होंने सत्य को छिपा लिया. असल में उनकी विशेषता ये है कि उन्होंने सत्य को अप्रासंगिकता के समुद्र में डुबो दिया है. राजधानी के वोटरों को यह समझना होगा.

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