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राज्य की जनता के राशन पर हो रहा आधार का प्रहार, राजनीतिक दल चुनाव में मशगूल

तत्कालीन मुख्य सचिव राजबाला वर्मा के आदेश से 22 मई 2017 को 11.64 लाख राशन कार्ड रद्द किये गये थे

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Pravin Kumar

Ranchi : आधार नहीं था इसलिए जीवन का आधार भी गया. राशन के लिए आंखों की पुतलियों और उंगलियों की छाप सरकार को चाहिए. इसके लिए भले ही आंखें ही क्यों न पथरा जाये, मगर इससे भी उन्हें परहेज न होगा.

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राज्य के विभिन्न जिलों से बीते तीन सालो में संतोषी कुमारी, बुधनी बिरजीया, सुरेश उरांव, एतवरिया देवी, देवघर निवासी रूपलाल मरांडी, वैद्यनाथ दास धनबाद निवासी, पाकुड़ की लुखी मुर्मू, गिरिडीह निवासी बुधीन सोरेन, रामगढ़ के चिंतामन मल्हार, जामताड़ा निवासी मांगा बाउरी, गुमला निवासी सीता देवी, पश्चिमी सिंहभूम निवासी बिरेन दिग्गी जैसे करीब 19 लोगों की मौत भूख, ठंड और भूख जनित बीमारियों से हो गया. लेकिन इन मौतों को सरकारी अमले ने मलेरिया, टाइफाइड के अलावा मौत के लिए कई अन्य वजह बताया.

लेकिन यह सरकारी सिस्टम का एक भद्दा मजाक बन गया. क्योंकि ये भी किसी मजाक के कम नहीं कि, जिसे सरकारी राशन दुकानदार पहचानता हो, उसके पास राशन कार्ड भी हो. सबसे बड़ी बात की वह गरीब भी है और गांव के लोग उसे पहचानते भी हों, लेकिन सिर्फ एक मशीन उसे नहीं पहचान पा रही है.

जिसकी वजह से परिवार राशन से वंचित हुई परिवार के सदस्यों की मौत भूख से हो गयी.सूबे में भूख से 19 मौतों को बाद भी यह राज्य में चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है. प्रत्याशी लोकसभा चुनाव की घोषणा के बाद सिर्फ अपनी टिकट के जुगाड़ में लगे हैं.

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राज्य में कब किया गया था बड़े पैमाने पर राशन कार्ड रद्द

22 मई 2017 को झारखंड की मुख्य सचिव राजबाला वर्मा द्वारा सरकार के पदाधिकारियों के साथ एक वीडियो कांफ्रेंसिंग की गयी. जिसमें जिले के जिला आपूर्ति पदाधिकारियों को आदेश दिया गया कि जिनके राशन कार्ड आधार से लिंक नहीं हैं, उनके नाम राशन कार्ड की सूची से हटा दिए जाएं. आदेश के बाद झारखंड सरकार द्वारा 11.64 लाख राशन कार्ड को सिर्फ इसलिए खत्म कर दिया गया, क्योंकि वह आधार से लिंक नहीं थे. 1000 दिन की उपलब्धि गिनाते हुए खाद्य आपूर्ति विभाग ने यह तो बता दिया कि 11.64 लाख ”फर्जी” एवं ”अयोग्य” लोगों के राशन कार्ड रद्द कर दिए गए हैं. 2 मई 2017 को झारखंड के खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने लिखित आदेश दिया था, कि आधार नहीं होने की वजह से राशन कार्ड रद्द नहीं होगा. लेकिन बावजूद इसके आधार नंबर नहीं जुड़ने की वजह से राशन कार्ड रद्द कर दिया गया.

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राज्य में राशन वितरण में क्या हो रही समस्या

भोजन अधिकार से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता सिराज का कहना है कि, राशन के अधिकार पर आधार का पहला प्रहार वैसे परिवारों ने झेला, जिनका राशन कार्ड समय पर उनके आधार से न जुड़ने के कारण रद्द कर दिया गया. राशन कार्ड से आधार जुड़वाने के लिए बिचौलियों, राशन डीलरों, प्रज्ञा केन्दों व प्रशासनिक कर्मियों द्वारा पैसे लेना और बार-बार दौड़ाना आम बात है. ऐसे कई परिवार अभी भी अपने राशन से वंचित हैं. 2017 में राशन कार्ड रद्द हो जाने के बाद आज तक हाटगम्हरिया प्रखंड के हाशिये पर रहने वाले वृद्ध आदिवासी पचाए मुंडुईया राशन से वंचित हैं. वहीं हो समुदाय आज भी अपने भोजन के अधिकार के लिए महज़ कंप्यूटर सर्वर की रफ्तार पर निर्भर हो गया है. जनवितरण प्रणाली में आधार की अनिवार्यता के कारण कार्डधारियों को होने वाली समस्याओं का यह एक उदहारण मात्र है.

वहीं इससे आगे सिराज बताते हैं कि पिछले दो वर्षों से राज्य की अधिकांश राशन दुकानों पर पॉश मशीन में आधार-आधारित बायोमिट्रिक प्रमाणीकरण के बाद ही कार्डधारियों को राशन दिया जाता है. बायोमिट्रिक प्रमाणीकरण व्यवस्था के कारण हर महीने व्यापक पैमाने पर लोग राशन से वंचित हो रहे हैं और परेशानियों का सामना भी कर रहे हैं. सिराज कहते हैं कि खुंटपानी प्रखंड के अरगुंडी गांव के लोगों को बायोमिट्रिक प्रमाणीकरण के लिए गांव से 2.5 किमी दूर जाना पड़ता है, जबकि उनके गांव में ही राशन दुकान है. गांव में नियमित इंटरनेट नेटवर्क न होने के कारण वहां पॉश मशीन काम नहीं करती. प्रमाणीकरण के बाद डीलर द्वारा दी गयी अगली तारिख को राशन दुकान जाकर अनाज लेना पड़ता है. कई बार सर्वर की समस्याओं के कारण दिनभर इंतजार करने के बाद भी प्रमाणीकरण नहीं हो पाता और वैसे लोगों को फिर अगले दिन पैसे खर्च करकेराशन लेने आना पड़ता है.जिससे उन्हें दैनिक मजदूरी का भी नुकसान उठाना पड़ता है. केवल आरगुंडी नहीं, बल्कि राज्य के अनेक गावों की भी यही कहानी है. राशन कार्ड में परिवार के सभी सदस्यों का नाम न होना, कई वंचित परिवारों का कार्ड न होने की शिकायत के बाद भी शिकायत निवारण प्रणाली निष्क्रिय होने से राज्य के लोगों को राशन से वंचित होना पड़ रहा है.

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पॉश मशीन लोगों के शोषण का एक नया हथियार बन गया है

जन वितरण प्रणाली में पॉश मशीन लाभुकों को वंचित करने का नया हथियार बन गया है. इस विषय पर अबतक किसी राजनीतिक दल ने आवाज नहीं उठाई है. जनता के सरोकार से जुड़े हुए राशन जैसे मुद्दे पर सत्ताधारी दल से लेकर विपक्षी दल तक सभी कुंभकरण की नींद सोये हुए हैं. वहीं रद्द किये गये राशन कार्ड की वजह से राशन से वंचित होने वाले गरीब परिवार के वोट से चुनाव जीतने वाले राजनेता क्या गरीबों के भोजन के अधिकार के लिए आने वाले चुनाव में खुद को वचनबद्ध कर पायेंगे. ताकि राज्य में कोई दूसरी संतोषी कुमारी देनी आयो भात,दे नी आयो भाज कहते हुए मौत की शिकार न हो. सिराज कहते हैं कि राज्य के इस मुद्दे पर मुख्य विपक्षी दलों का रवैया भी उदासीन है. अब तक कुछ ट्वीट व मीडिया में बयान के अलावा किसी भी दल में जन वितरण प्रणाली में आधार की अनिवार्यता के विरुद्ध स्पष्ट राजनैतिक प्रतिबद्धता नहीं दिखायी है.

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