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अटल बिहारी की हालत पहले जैसी गंभीर, कवि-राजनेता हर रूप में दमदार वाजपेयी

NewDelhi: देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की हालत अब भी गंभीर बनी हुई है. एम्स की ओर से गुरुवार को जारी ताजा अपडेट में डॉक्टर्स का कहना है कि वायपेयी की हालत अब भी बीती रात जैसी नाजुक बनी हुई है. और फुल लाइफ सपोर्ट पर रखा गया है.

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बीजेपी को शून्य से शिखर तक पहुंचाने वाले वाजपेयी जी के स्वास्थ्य को लेकर हर कोई चिंतित है. सुबह से ही कई राजनेताओं का एम्स आना जारी है. फिर चाहे वो पक्ष का हो या विपक्ष का. हर कोई अटल बिहारी के स्वास्थ्य लाभ की कामना कर रहा है. देशभर में उनके लिए दुआओं का दौर जारी है.

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अटल बिहारी वाजपेयी, वो शख्सियत हैं, जिन्होंने अपने काम और व्यक्तित्व से व्यापक स्वीकार्यता और सम्मान हासिल किया. अटल-आडवाणी की जोड़ी ने तमाम बाधाओं को पार करते हुए 90 के दशक में बीजेपी को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई थी. एक सजग राजनेता होने के साथ-साथ अटल बिहारी वाजपेयी को प्रखर वक्ता माना जाता है. उनकी वाक पटुता की वजह से उनके धुर विरोधी नेता भी उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाते हैं.

12 बार सांसद बने वाजपेयी

25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी 1951 से भारतीय राजनीति का हिस्सा रहे. 1955 में उन्होंने पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा था, हालांकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. इसके बाद 1957 में वह सांसद बने. अटल बिहारी वाजपेयी कुल 10 बार लोकसभा के सांसद रहे. वहीं वह दो बार 1962 और 1986 में राज्यसभा के सांसद भी रहे.

प्रखर वक्ता वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी की वाक पटुता की वजह से उनके धुर विरोधी नेता भी उनकी तारीफ किए बिना नहीं रह पाते हैं. अपनी भाषणकला, मनमोहक मुस्कान, लेखन व विचारधारा के प्रति निष्ठा तथा ठोस फैसले लेने के लिए वाजपेयी विख्यात है.

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कांग्रेस से इतर किसी दूसरी पार्टी के देश के सर्वाधिक लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहने वाले वाजपेयी को अक्सर बीजेपी का उदारवादी चेहरा कहा जाता है. हालांकि उनके आलोचक उन्हें आरएसएस का ऐसा मुखौटा बताते रहे हैं, जिनकी सौम्य मुस्कान उनकी पार्टी के हिंदूवादी समूहों के साथ संबंधों को छुपाए रखती है.

तीन बार बने प्रधानमंत्री

बीजेपी के चार दशक तक विपक्ष में रहने के बाद वाजपेयी 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन पर्याप्त संख्याबल नहीं होने के कारण उनकी सरकार महज 13 दिनों में ही गिर गई. दूसरी बार 13 महीने बाद 1999 में उनके नेतृत्व वाली दूसरी सरकार भी गिर गई. अन्नाद्रमुक प्रमुख जे जयललिता द्वारा केंद्र की बीजेपी की अगुवाई वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने की पृष्ठभूमि में वाजपेयी सरकार धराशायी हो गई. लेकिन 1999 के चुनाव में वाजपेयी एक अधिक स्थिर गठबंधन सरकार के मुखिया बने, जिसने अपना कार्यकाल पूरा किया.

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वाजपेयी के शासन में परमाणु परीक्षण

11 और 13 मई 1998 को भारत ने पोखरण में पांच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट कर सबको चौंका दिया. इस कदम के पीछे अटल बिहारी वाजपेयी का साहसिक निर्णय था. यह भारत का दूसरा परमाणु परीक्षण था. इससे पहले 1974 में पोखरण 1 का परीक्षण किया गया था. दुनिया के कई संपन्न देशों के विरोध के बावजूद अटल सरकार ने इस परीक्षण को अंजाम दिया, जिसके बाद भारत को कई तरह की पाबंदी झेलनी पड़ी. अमेरिका, कनाडा, जापान और यूरोपियन यूनियन समेत कई देशों ने भारत पर कई तरह की रोक भी लगा दी थी. जिसके बावजूद अटल सरकार ने देश की जीडीपी में बढ़ोतरी की.

दुनिया में बजाया हिंदी का डंका

1977 में मोरार जी देसाई की सरकार में अटल विदेश मंत्री थे, वह तब पहले गैर कांग्रेसी विदेश मंत्री बनें थे. इस दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया था और दुनियाभर में हिंदी भाषा को पहचान दिलाई, हिंदी में भाषण देने वाले अटल भारत के पहले विदेश मंत्री थे.

हार नहीं मानूंगा…

भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एक सफल नेता होने के साथ ही एक कवि भी रहे. वे हमेशा अपने भाषणों में अपनी कविताएं सुनाया करते थे. उन्होंने कई कविताएं लिखीं और समय-दर-समय उन्हें संसद और दूसरे मंचों से पढ़ा भी.  उनकी कविताओं का संकलन ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ खूब चर्चित रहा जिसमें..हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा..खास चर्चा में रही.

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