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अटल बिहारी वायपेयीः नाम की तरह ही अटल था उनका वाक्य, 1999 में वादा किया 2000 में पूरा किया

Gyan Ranjan

Ranchi : 15 नवंबर 2000 को जब अलग राज्य के रूप में झारखंड अस्तित्व में आया, तो दक्षिण बिहार के इस हिस्से के करोड़ों लोगों की पचास साल पुरानी मांग पूरी हुई. इस राज्य के गठन में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी का सबसे बड़ा योगदान था. तब बिहार से अलग एक नये राज्य के गठन की राह में कई सियासी पेंच भी थे. इसके बावजूद हर तरह के राजनीतिक विरोध का सामना करते हुए उन्होंने छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के साथ-साथ झारखंड के गठन का भी रास्ता साफ कर दिया.

झारखंड आंदोलन के अगुआ रहे झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन ने झारखंड अलग राज्य बनने के बाद कहा था, हमने जो आंदोलन किया, उसका परिणाम अलग राज्य है लेकिन अटल जी के कारण अलग राज्य का निर्माण हुआ. झारखंड उनकी ही देन है.

दरअसल झारखंड गठन के पूर्व राज्य के नाम को लेकर भी भारी जिच था. भाजपा ने प्रदेश का नाम वनांचल रखने की मांग की थी. संयुक्त बिहार में भाजपा की स्थानीय कमेटी को वनांचल कमेटी कहा जाता था.

1998 में लोकसभा में वनांचल के नाम से विधेयक भी पारित हुआ लेकिन बाद में अटलजी के समक्ष बिहार से अलग होकर बनने वाले प्रदेश का नाम झारखंड रखने का प्रस्ताव आया तो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी इस पल के साक्षी रहे हैं.

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कभी नहीं भुलाया जा सकता झारखंड के प्रति अटल जी का योगदान

भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के झारखंड के प्रति योगदान को यहां के लोग कभी भूल नहीं सकते. उन्होंने ही 50 वर्ष से अधिक समय तक चले झारखंड आंदोलन को मुकाम तक पहुंचा कर झारखंड को अलग राज्य बनाया. यह झारखंड के विकास को लेकर उनकी सोच को दर्शाता है.

वे चाहते थे कि झारखंड क्षेत्र भी अन्य राज्यों की तरह विकास की राह में आगे बढ़ सके. अब उनके निधन से इसपर मंथन करने का समय आ गया है कि जिन सपने और उद्देश्य को लेकर उन्होंने अलग झारखंड बनाया था वे कहां तक पूरे हुए.

निश्चित रूप से राज्य गठन के बाद से अबतक यहां कई क्षेत्रों में व्यापक सुधार हुए हैं. इसके बावजूद अभी भी कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें काफी कुछ किया जाना बाकी है.

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शिक्षा क्षेत्र की ही बात करें तो उनके द्वारा शुरू की गई महत्वाकांक्षी योजना सर्व शिक्षा अभियान के तहत राज्य में स्कूलों के भवन तो बन गए, लेकिन सरकारी स्कूलों में दी जा रही शिक्षा में गुणवत्ता अबतक सुनिश्चित नहीं हो सकी. अभी भी 18-23 आयु वर्ग के 25 लाख बच्चे उच्च शिक्षा से वंचित हैं.

यहां 18-23 आयु वर्ग के एक लाख छात्र-छात्राओं पर महज आठ कॉलेज उपलब्ध हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर एक लाख छात्र पर 28 कॉलेज उपलब्ध हैं.

स्वास्थ्य में टीकाकरण, संस्थागत प्रसव की दरों में काफी वृद्धि हुई है. शिशु मृत्यु कम करने में भी बड़ी सफलता हासिल हुई है. राज्य गठन के बाद से यहां एक भी मेडिकल कॉलेज नहीं खुला था, लेकिन पिछले साल एक साथ तीन मेडिकल कॉलेजों का शिलान्यास हुआ.

इसके बावजूद मातृ मृत्यु दर अधिक होना, कुपोषण व एनीमिया आदि गंभीर समस्या बनी हुई है. राज्य में इन क्षेत्रों में भी व्यापक सुधार करने की आवश्यक्ता है.

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आज भी गरीबी, पलायन और बेरोजगारी का दंश झेल रहा झारखंड

अलग राज्य बने 21 वर्ष होने के बाद आज भी झारखंड गरीबी, पलायन और बेरोजगारी की दंश झेल रहा है. ऐसा नहीं है कि अलग राज्य बनने के बाद इन क्षेत्रों में काम नहीं हुए. लेकिन जिस तेजी के साथ काम होना चाहिए था नहीं हुआ.

वर्तमान सरकार में इन क्षेत्रों में तेजी से काम करने की ललक दिख रही है. इसे लेकर कई योजनाएं शुरू की गई हैं तो कई पाइप लाइन में हैं. जरूरत इन्हें शीघ्र धरातल पर उतारने की है. इसमें सरकार के अलावा बुद्धिजीवियों, समाज के अन्य वर्गो को भी अपनी भूमिका निभानी होगी.

राजनीतिक दलों को भी दलगत भावना से ऊपर उठकर राज्य के विकास में अपनी भागीदारी निभानी होगी. दिवगंत प्रधानमंत्री के सपने और उद्देश्य को पूरा करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

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1984 के बाद आंदोलन बना BJP का बड़ा राजनैतिक दांव

1984 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा प्रत्येक राज्यों में अपना जनाधार बनाने के प्रयासों में जुट गई थी. राज्यो की वे बड़ी मांग जिनके नाम पर कांग्रेस और अन्य दल जनता को बरगलाते आ रहे थे, BJP उन मांगों को लेकर मुखरता से जनता के बीच आई.

भाजपा ने झारखंड के जनता के सामने दावा किया कि अन्य दलों कि तरह वह इस आंदोलन को बेचेगा नहीं बल्कि अलग झारखंड राज्य के सपने को पूरा करेगा. अलग झारखंड के मांग को लेकर वर्तमान के बिहार और झारखंड के लोगों के अलग-अलग विचार थें.

बिहार के लोग अलग राज्य के मांग के विरोधी थे, वहीं झारखंड के लोग अलग राज्य के मांग को लेकर आंदोलन रत थे. बिहार में कांग्रेस राजद के साथ सत्ता में थी. ऐसे हालात में भाजपा को झारखंड में भरपूर समर्थन मिलना तय था.

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हुआ भी ऐसा ही. वर्ष 1999 के लोकसभा चुनाव से पहले अटल जी ने झारखंड के लोगों से वादा किया कि यदि केंद्र में उनकी सरकार बनी तो अलग झारखंड राज्य का निर्माण होगा. झारखंड की 14 में से 12 सीटें भाजपा को मिली.

अपने वादे के अनुरूप अटल जी ने वर्ष 2000 में अलग झारखंड राज्य का निर्माण किया. राजनैतिक स्तर पर 1938 में जयपाल सिंह के नेतृत्व में झारखंड पार्टी का गठन हुआ था.

1952 के दौरान यह दल तत्कालीन बिहार का सबसे बड़े विपक्षी दल की भूमिका में भी रहा परंतु कांग्रेस के राजनैतिक दाव-पेंच के आगे यह पार्टी अंततः 1963 को कांग्रेस में ही समाहित हो गई.

झारखंड क्षेत्र में भाजपा का जनाधार बढ़ाने के लिए इंदर सिंह नामधारी और समरेश सिंह जैसे नेताओं ने वनांचल अलग राज्य निर्माण के लिए आंदोलन शुरू कर दिया. 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को झारखंड के 14 में से 12 सीटें प्राप्त हुईं और अटल विहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने.

वाजपेयी झारखंड के लोगों से किए वादे निभाने के लिए तैयार थे और प्रक्रिया शुरू कर चुके थें. भाजपा सरकार लोकसभा और राज्यसभा में राज्य पुनर्गठन विधेयक के माध्यम से देश में तीन नए राज्यों-उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड के निर्माण का रास्ता तैयार कर चुकी थी.

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नाम को लेकर खूब चला था विवाद

झारखंड के नाम को लेकर गहरा मतभेद रहा. भाजपा शुरू से ही आदिवासियों के लिए वनवासी और झारखंड के लिए वनांचल जैसे शब्दों का प्रयोग करते आ रही थी. विवाद का राजनीतिक कारण भी था.

झारखंड के नाम से 1938 से ही विभिन्न दलों ने आंदोलन शुरू कर दिया था. ऐसे में जाहिर है कि भाजपा को ‘झारखंड’ नाम रखने से झारखंड गठन का अकेला श्रेय नहीं मिल पाता. लेकिन ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ समेत तमाम दल जो झारखंड नाम का प्रयोग करते आए थे उनके ऐतराज होने पर वाजपेयी जी जनभावना का सम्मान करते हुए उनकी बातों को बड़े सहजता से स्वीकार कर लिया.

लोकतंत्र में बहुमत का सम्मान करना अटल जी की आदत में सुमार था. उनके बारे में कहा जाता था कि वो जो कहते थे वो करते थे. ग्रामीण भारत उनकी प्राथमिकता थी और जब तक सत्ता में रहे ग्रामीण भारत को विकसित करने के लिए अनेक योजनाओं को धरातल पर उतारा.

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देश के सम्मान के साथ कभी नहीं किया समझौता

अटल जी एक ऐसे प्रधानमंत्री थे जो देश के सम्मान के साथ कभी समझौता नहीं किया. पोखरण विस्फोट इसका उदाहरण है.

कारगिल वार के बाद देश की अर्थव्यवस्था पर आये संकट को भी उन्होंने आराम से उबारा था. वे देश के ऐसे नेताओं में शामिल हैं जिनकी तारीफ विपक्षी भी करने से पीछे नहीं हटते थे.

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