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नागरिकता संशोधन बिल के विरोध में असम का तीखा होता स्वर देशव्यापी हो सकता है

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Faisal  Anurag

बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन, कर्फ्यू, सेना की तैनाती, सुरक्षाबलों की गोली से तीन छात्रों के मारे जाने के बाद भी असम का विरोध-प्रदर्शन और प्रतिरोध लगातार तीखा होता जा रहा है. त्रिपुरा और अब मेघालय में भी प्रतिरोध के स्वर बहुत तेज हो गये हैं.

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इसके साथ ही पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी तनाव है. सिक्किम भी उबलता हुआ नजर आ रहा है. सीमा से लगे आठ राज्यों के इन हालात ने यह बता दिया है कि नागरिकता कानून और एनआरसी को ले कर लोगों की नाराजगी तेवर में है. देश के सभी बड़े शहरों और कस्बों में भी जबरदस्त प्रदर्शन हुए हैं.

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जामिया मिलिया इस्लामिया के हजारों छात्रों के संसद मार्च पर पुलिस ने लाठी चार्ज किया. जिसमें दर्जनों छात्र छात्राएं घायल हुई हैं. अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के भी छात्र और शिक्षकों का नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन तीन दिनों से जारी है. असम और अलीगढ़ के छात्रों ने परीक्षा का बहिष्कार किया. छात्रों के उग्र प्रदर्शन को देखते हुए असम में तमाम परीक्षाओं को रद्द कर दिया गया है.

असम के आंदोलनकारियों ने घोषणा की है कि अगले दस दिनों तक केवल दिन में ही प्रदर्शन होंगे. इन लोगों ने हिंसा से बचने की घोषण की है. शुक्रवार को तो कर्फ्यू के बाद भी कई शहरों में भारी संख्या में नागरिक सड़कों पर आये. और साहित्यकारों ओर कलाकरों ने भी उनका साथ दिया. मेघायलय की स्थिति भी गंभीर हो गयी है. इन तमाम प्रदर्शनों ओर विरोध में छात्र अगुवा हैं.

गुवहाटी के कॉटन कालेज गर्ल्स हॉस्टल और आसपास के पीजी में देर रात सेना ने प्रवेश कर हॉस्टल खाली करने का नोटिस थमाया है. इंटरनेट बंद कर दिये गये हैं. और केंद्र सरकार ने चैनलों के लिए एडवाइजरी जारी कर विरोध की खबरों को सेंसर करने को कहा है.

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बांग्ला देश के विदेशमंत्री और गृहमंत्री ने भारत का दौरा रद्द कर दिया है. जापान के प्रधानमंत्री के भी भारत दौरे के रद्द होने का खतरा है. सीएबी के खिलाफ एक आईपीएस अफसर ने विरोध करते हुए अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया है.

पूर्वोत्तर के, खासकर असम के हालात तो 1985 के पहले के असम आंदोलन से भी भयावह दिखने लगे हैं. असम में मुख्यमंत्री समेत कई मंत्रियों के घरों पर तोड़फोड़ की गयी है. असम ने संस्कृति, भाषा और अस्मिता के सवाल को एकबार फिर से बहस में ला दिया है. असम का प्रतिरोध कैब के प्रावधानों को ले कर है.

जिसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्ला देश से भारत आये गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने की बात की गयी है. अमित शाह कह रहे हैं कि इस प्रावधान से भारत के नागरिकों को डरने की जरूरत नहीं है. लेकिन भारत का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय ही नहीं बल्कि असम के निवासी भी इससे आशंकित हैं. जिस तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, उनसे जान पड़ रहा है कि विरोध करने वाले खामोश होने की स्थिति में नहीं है.

एक अमरीकी सिनेटर ने भी जिस स्वर में इस विधेयक का विरोध किया है. वह बेहद गंभीर टिप्पणी है. पूर्वोत्तर में यह धारणा बन रही है कि केंद्र को उनके इलाके की कोई चिंता नहीं है. और उनकी सांस्कृतिक अस्मिता की परवाह नहीं की जा रही है. अनेक युवा इस तरह की बातें कह रहे हैं.

अमित शाह ने धार्मिक तौर पर प्रताड़ना के शिकार इन तीन देशों के गैर मुसलमानों को भारतीय नागरिकता की बात कर रहे हैं. 1950 में नागरिकता कानून के संदर्भ में नेहरू भी धार्मिक प्रताड़ना की बात कर रहे हैं. लेकिन तब वे कियी धर्म को आधार नहीं बना रहे थे. यही कारण है कि भारत की नागरिकता में धार्मिक प्रताड़ना के शिकार लोगों की बात कही गयी थी. न कि अमित शाह की तरह केवल गैर मुस्लिमों की.

आइडिया आफ इंडिया, जो कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान विकसित होना शुरू हुआ, को ले कर भी इससे संबंधित बातें की जा रही हैं. इस सीएबी को भारत के उस आइडिया के खिलाफ माना जाता है जो समावेशी  को अपना सबसे बड़ा मानता है.

भारत का संविधान आइडिया आफ इंडिया का दस्तावेज है. सीएबी ने संविधान  के आर्टिकल 14 सहित पांच आर्टिकल में दिये गये धार्मिक स्वतंत्रता और बराबरी के खिलाफ बताया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज के अलावे अधिकांश संविधानवेत्ता यह कह रहे हैं.

असम का ताजा विरोध बताता है कि बीमारी बेहद गंभीर है. पूर्वोत्तर भारत के सभी राज्यों की अपनी सांस्कृतिक विशेषताएं हैं. और एनआरसी के बाद से ही इन राज्यों में असंतोष गहराया है. असम आंदोलन तो असमिया भाषा पर वर्चस्व साबित करने के खिलाफ बड़ा आंदोलन था. असम समझौते में इस बात की गारंटी दी गयी थी कि असम की विशेषताओं और जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए वहां संस्थानिकता की हिफाजत की जायेगी. असमी लोगों को लंबे समय से लगता रहा है कि वे अल्पमत में लाये जा रहे हैं.

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और उनकी भाषा व संस्कृति खतरे में हैं. इसकी अनेक बार अभिव्यक्ति आंदोलनों के रूप में हो चुकी है. त्रिपुरा के आदिवासी भी अल्पसंख्यक बना दिये जाने के खिलाफ उबल रहे हैं. सीएबी को असम के लोगों ने जिस तरह से समझा है, वह उनकी आशंका को और और गहरा कर रहा है. असम ने एनआरसी की मांग की थी, ताकि बाहर से प्रवेश किये गये तमाम लोगों को वहां से बाहर किया जा सके. एनआरसी लिस्ट में छूट गये साढ़े उन्नीस लाख लोगों में से अधिकतर हिंदू हैं.

इस सीएबी के बाद असम को लग रहा है कि उन तमाम लोगों को असम का नागरिक मान लिया जायेगा, जिससे असमी संस्कृति प्रभावित होती रही है. आधार वर्ष (cut off date) का भी नागरिकता कानून में बदला जाना उनकी आशंका को मजबूत बना रहा है.

पूर्वोत्तर के जानकार बता रहे हैं कि कुछ हिस्सों को सीएबी से बाहर रखने की बात करने के बाद भी इन राज्यों में खतरा कम नहीं हो रहा है. पूर्वोत्तर के राज्यों की सांस्कृतिक बहुलता की संजीदगी को नजरअंदाज करना बेहद खतरनाक है. जानकारों का मानना है कि संविधान सभा में इस पर विस्तार से चर्चा के बाद ही पांचवीं और छठी अनुसूची का निर्माण किया गया था. इसकी सांस्कृतिक समझ को और विस्तार दिये बिना आज के सवालों को हल नहीं किया जा सकता है.

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