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खेरबाड़ी में बंगाली हिंदुओं की हत्या के बाद असम की बदलती तस्वीर और भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा

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HARSH MANDAR/ JOHN DEYAL 

बात पिछले नवंबर की है. असम में ब्रह्मपुत्र तट पर मृत्यु की निराशाजनक परछाई पसर गयी. एक नवंबर को युद्ध जैसी पोशाकें पहने हुए बंदूकधारियों ने पांच बंगाली हिंदूओं को उनके गांव से उठा लिया और उनकी गोली मारकर हत्या कर दी. इनके परिवार 1964 में पूर्वी पाकिस्तान के सिलहट जिले को छोड़कर यहां आकर बस गये थे. लेकिन एक छठा आदमी बच गया, जिसने बाद में याद करते हुए बताया कि बंदूकधारियों ने आपस में एक-दूसरे के साथ तो असमिया में बातचीत की, लेकिन पीड़ितों से हिंदी में बात कर रहे थे.

संभवतः एक राजनीतिक मुद्दा बनाने के लिए सरासर आकस्मिक और बेरहम अनियमितता से बिल्कुल निर्दोष और असहाय लोग मारे गये, जो फिर से हिंसा और इसकी करनी की एक भयावह चेतावनी है.

तिनसुकिया जिले का खेरबारी गांव, जहां यह नरसंहार हुआ था. हम दोनों 20 दिन बाद कारवां-ए-मोहब्बत की एक छोटी सी टीम के रूप में यहां पहुंचे थे. हमने इस भयानक सामूहिक हत्या के पीछे के कारणों को गहराई से जानने की कोशिश की, जब राज्य आम होती जा रही जातीय और सांप्रदायिक घृणा-प्रेरित हिंसा की कई त्रासदियों के बीच सुन्न खड़ा है. इलाके में हथियारों से लैस जवानों को फिर से घूमते देखे जाने जैसी अफवाहों के मद्देनज़र राज्य प्रशासन ने हमें एक सशस्त्र अनुरक्षण की सुरक्षा प्रदान की.

हम डिब्रूगढ़ के निकटतम हवाई अड्डे से दो घंटे की दूरी तय कर खेरबारी गांव पहुंचे थे. यह गांव उन सैकड़ों गांवों में से एक है, जहां बड़े पैमाने पर फैला कृषि क्षेत्र हर मानसून में ब्रह्मपुत्र के जल प्रलय की चपेट में आ जाता है.

वहां हमारी मुलाकात मोहन रॉय विस्वास से हुई, जिन्होंने इस नरसंहार में अपने दो बेटों और भाई को खो दिया. हमें देखकर इतनी पीड़ा में बूढ़े आदमी के आंसू बह निकले. रोते हुए उन्होंने पूछा, “हम क्या करेंगे? क्या हमारी किस्मत में यही लिखा है, हमारे दिलों का सड़ना”.

विस्वास याद करते हुए बताते हैं,” वह गुरुवार की शाम थी. सूर्यास्त के बाद मैं उस शाम अपने घर के अंदर आराम कर रहा था, और आँगन में मेरे लड़के अगले दिन गाँव के बाजार में बेचने के लिए खेतों से लाई गयी मूलियां धो रहे थे, उनका दोस्त सहदेव इस काम में मदद कर रहा था.”

उनके बेटे कभी-कभी खेतों में काम करते थे, और उनके घर में एक छोटी सी मोबाइल फोन मरम्मत की दुकान भी चलाते थे.

लड़ाई में थके से लग रहे पांच हथियारबंद लोग अंदर घुसे और तीनों लड़कों को उनके साथ चलने के लिए कहा. उन्हें लगा कि ये सेना के जवान हैं जो उनकी मदद चाहते हैं. बंदूकधारियों ने घर के बाहर खड़े तीन अन्य लोगों को भी अपने साथ ले लिया जो उनकी मोबाइल की दुकान के पास खड़े होकर बातचीत कर रहे थे. उनमें से एक मोहन रॉय विस्वास के भाई थे.

वे इन छः पीड़ितों को गाँव के प्रवेश द्वार के पास बह रही एक धारा के पास ले गये. वहां उन्होंने उन्हें एक लाइन में खड़े होने का आदेश दिया. उस समय अंधेरा गहरा गया था, लेकिन बंदूकधारियों ने उन्हें अपने मोबाइल फोन की रोशनी का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी. बिना किसी चेतावनी के फिर उन्होंने गोलियां बरसा दीं. सभी छह के छह नीचे गिर गये, लेकिन संयोग से छठा गोलियों से बचकर धारा की ढलान से बेहोश होकर लुढ़क गया. भगदड़ और अंधेरे में बंदूकधारियों को लगा कि वह भी मर गया होगा. फिर वे रात में वहां से निकल गये.

शुरूआत में मोहन रॉय विस्वास और अन्य ग्रामीणों ने सोचा कि उन्होंने आतिशबाजी सुनी है. मगर गाँव में न कोई त्यौहार था और न कोई शादी. इसलिए वे एकदम चौंक गये. लेकिन जल्द ही वहां शोरगुल सुनाई दिया तो विस्वास घबराकर पुलिया की ओर भागे. उन्होंने वहां अपने बेटों, उनके दोस्त और अपने भाई को पुलिया के चारों ओर बेतरतीबी से पड़े हुए पाया. उनके गोली के जख्मों से खून रिस रहा था.

पीड़ितों में उनका बेटा आनंद विस्वास सबसे कम उम्र का था. उसकी उम्र महज 18 साल थी और उनके भाई अविनाश विस्वास 22 वर्ष के थे. छोटे वाले के गले और बांह में गोली लगी थी. बड़े भाई को उसके धड़, छाती और पेट के निचले हिस्से में गोली लगी, जिसमें से एक गोली उसके शरीर के आर-पार हो गयी थी.

सुबोल दास के शरीर में चार गोलियां लगीं, जिनकी उम्र 50 वर्ष से अधिक थी. उनकी विधवा और दो बेटियों याद करते हुए बताती हैं कि वह अपने खेतों से धान ले जाने के लिए किराए पर ली गयी गाड़ी से वापस लौटते वक्त उस मोबाइल मरम्मत की दुकान के बाहर बातचीत के लिए रुके थे. एकाएक हथियारबंद लोगों ने उन पर अपनी बंदूक तान दी और उन्हें और उनसे बातचीत कर रहे दो अन्य लोगों को अपने साथ चलने को कहा.

उन्होंने उन्हें घुटने, कूल्हों और पेट के निचले हिस्से में गोली मारी. स्थानीय निवासियों की स्मृतियों  के अनुसार, वह कुछ देर तक जीवित रहे. (कुछ लोग बताते हैं कि वह 20 मिनट के लिए सांस ले रहे थे). गोलीबारी के बारे में जब ग्रामीणों को पता चला तो वे उसे वहां से उसी गाड़ी से दूर ले गये, जिस गाड़ी से वह वापस लौट रहे थे. लोगों ने तत्काल वाहन से उसे निकटतम चिकित्सा सुविधा तक ले जाने की व्यवस्था करने के लिए फोन किया, लेकिन वाहन के पहुंचने से पहले ही उन्होंने दम तोड़ दिया.

सुबोल दास के बड़े भाई सुनील दास उस घटना को याद करते हैं, “उन्होंने अपना सिर उठाया और मुझे अपने बच्चों की देखभाल करने के लिए कहा.” “उनकी छह बेटियाँ हैं और कोई बेटा नहीं है. अपनी बेटियों को अच्छी पढ़ाई करवाने की उनकी चाहत थी. उनकी तीन बेटियों की शादी हो चुकी है. हम नहीं चाहते कि मौत के साथ राजनीति हो. यह एक त्रासदी है. सरकार हमें मुआवजा देगी लेकिन हमने अपनों को खो दिया है. ”

22 वर्ष के धनंजय नमोसुद्रा को दाहिनी आंख और उसके पैरों में गोली लगी थी. उसने मौके पर ही प्राण त्याग दिए थे. उसके भाई सुबल नमोसुद्र बताते हैं “वह एक किसान था. उस दिन मोबाइल मरम्मत की दुकान पर रोज़मर्रा की बातों में मशगूल था. मुझे कुछ नहीं कहना है सिवाय इसके कि शांति कायम हो. हमें सांत्वना और शांति की जरूरत है. मैंने अपने भाई को खो दिया है और वह अब कभी वापस नहीं आने वाला. ”

अपराधी कौन ?

राष्ट्रीय जांच एजेंसी हत्याओं की जांच कर रही है. किसी भी संगठन ने मौतों की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन लोगों को असम उप-राष्ट्रवाद या जतियोदाबादी के लिए लड़ने वाले एक उग्रवादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम के होने का संदेह है.

SMILE

असमिया उप-राष्ट्रवाद के जबरदस्त उफान के शोरगुल में असमिया पहचान को बचाने के नाम पर खूब हत्याएं हुईं. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर भड़काऊ बहस के मद्देनजर वास्तविक भारतीय नागरिकों का एक रोस्टर जो 1951 के बाद वर्तमान में पहली बार असम में नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 के रूप में अपडेट किया जा रहा है. जिसमें राजनैतिक स्तर पर विभिन्न पक्षों के राजनेताओं ने राज्य में जातीय असुरक्षा को खूब हवा दी है, जिसके कारण कभी-कभार बंद, आत्महत्याएं और हत्याएं हुई हैं. उल्फा नेता मृणाल हजारिका, जितेन दत्ता और ऑल असम बंगाली यूथ स्टूडेंट्स फेडरेशन के उदलगुरी जिला अध्यक्ष सुजीत सरकार को भड़काऊ बयान देने के लिए नवंबर में गिरफ्तार किया गया था.

यह सुनिश्चित करना मुश्किल है, लेकिन बंगाली हिंदुओं की लक्षित हत्याएं उल्फा के नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 (और वास्तव में असम में लोगों के बड़े हिस्से) के हिंसक विरोध का मजबूत संकेत है. यह विधेयक पड़ोसी देशों के सभी गैर-मुस्लिम प्रवासियों को शरणार्थी की श्रेणी में रखता है, जो भारतीय नागरिकता के हकदार होंगे. भारत की नागरिकता के लिए एक चौंकाने वाले पुनः परिभाषित सांप्रदायिक आधार पर यह विधेयक धर्म को मापदंड बनाता है कि कौन भारतीय बन सकता है. लेकिन भारत का संविधान इस विचार पर स्थापित है कि विविध धर्मों के लोग भारत के समान नागरिक हैं, जो किसी भी एक धर्म के लोगों की जागीर नहीं हैं.

पिछले वर्ष या उससे पहले भी, भाजपा ने एनआरसी (नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर) को बहुसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण करने और उसका फायदा लेने के लिए एक शक्तिशाली साधन के रूप में इस्तेमाल किया है. असम में अपने 2014 के चुनावी भाषणों में नरेंद्र मोदी ने अपने पक्ष में मतदान करवाने के लिए घोषणा की थी कि हमारे सत्ता में आने के बाद “बांग्लादेशी विदेशियों” को अपने झोले-झंडी उठाने पड़ेगें और भारत छोड़ना पड़ेगा. पिछले साल बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने 1994 में रवांडा नरसंहार के दौरान इस्तेमाल की गयी भाषा जैसे लहजे में इन अप्रवासियों को “दीमक” कहकर उन्मादी(खतरनाक) स्तर तक ले जाने की कोशिश की.

लेकिन जब 40 लाख लोग राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के अधिकारियों को अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए, तो सरकार ने पाया कि उनमें से लगभग आधे हिंदू, बंगाली, नेपाली और उत्तर भारतीय हिंदी भाषी थे. अगर इतने ज्यादा हिंदुओं से नागरिकता के अधिकार छीन लिए गये तो यह भाजपा के लिए एक राजनीतिक आपदा ही नहीं बल्कि आत्महत्या होगी. संभवतः यही कारण है कि भाजपा राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के साथ नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 को आगे बढ़ा रही है.

लेकिन असम के लोग स्पष्ट हैं कि यह उनका असमिया उप-राष्ट्रवाद का एक आंदोलन था, न कि सांप्रदायिक घृणा का. यह आंदोलन उन लोगों के बिल्कुल विरोध में है, जिन्हें वे धर्म की परवाह किए बिना विदेशी मानते हैं

4 जनवरी को असम के सिलचर में एक रैली में, जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर में अपना चुनाव अभियान शुरू किया, उन्होंने राज्य में विरोध के बावजूद विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) विधेयक पारित करने के लिए अपनी सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई. केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा विधेयक को मंजूरी दिए जाने के बाद 7 जनवरी को असोम गण परिषद ने राज्य में भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से अपने-आपको अलग कर लिया. असम और उत्तर पूर्व के अधिकांश हिस्सों में रोष होने के बावजूद 8 जनवरी को लोकसभा में विधेयक पारित करने से केंद्र सरकार रुकी नहीं. विपक्ष राज्यसभा में विधेयक को रोक सकता है, लेकिन नई उग्र लौ(आग) को हवा दे दी गयी है.

मोदी ने इस विधेयक को “भावनाओं से जुड़ा हुआ” और “अन्याय के खिलाफ एक प्रायश्चित और अतीत में की गयी कई गलतियाँ” घोषित कर दिया है. असम के वरिष्ठ मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने मोदी से एक कदम आगे जाते हुए कहा कि यदि नागरिकता (संशोधन) विधेयक पारित नहीं हुआ, तो असम “जिन्ना” के रास्ते पर चला जाएगा. “उस विधेयक के बिना, हम खुद को जिन्ना के दर्शन के आगे आत्मसमर्पण कर रहे हैं,” उन्होंने 6 जनवरी को कहा, “यह जिन्ना की विरासत और भारत की विरासत के बीच एक लड़ाई है.” “जिन्ना” राज्य के मुस्लिमों के लिए एक बमुश्किल संकेत सदर्भ हैं चूकिं वे भारत के विचार के प्रति अरुचिकर थे. सत्तारूढ़ भाजपा के वरिष्ठ नेताओं द्वारा सामान्य घृणास्पद भाषण के घृणित मानकों का सरमा ने अपनी टिप्पणियों से ओर स्तर गिरा दिया.

असम में आज स्पष्ट रूप में निंदनीय और खतरनाक रूप से सांप्रदायिक रेखाएं खींची गयी हैं, जिनसे पैदा हुए भय, घृणा और बहिष्कार से उन्माद फैल रहा है. दिल्ली और असम में भाजपा सरकारें उदासीन हैं और वे असम के लोगों को गर्त में धकेल रही हैं. 1983 में नेल्ली में और 2018 में खेरबाड़ी में बेगुनाहों का खून नफरत के कारण बहा और इन हालातों में बेगुनाहों का ज्यादा खून बह सकता है.

 खेरबाड़ी की बदलती तस्वीर

खेरबाड़ी में बंगाली भाषी हिंदूओं के चुनिंदा नरसंहार की आंच न केवल असम और देशभर तक पहुंची, बल्कि इसने गांव को भी बदल दिया है. खेरबाड़ी में अब लगातार डर का आतंक है. यह गाँव विभिन्न समुदायों के लोगों का घर है – बंगाली, नेपाली, बिहारी और असमिया – जो हमेशा सद्भावना और एकता में रहते आए हैं. स्थानीय निवासी इस बात को मानते हैं कि अतीत में गाँव ने जातीयता पर कोई सांप्रदायिक दुर्भावना या तनाव या अविश्वास नहीं देखा था. वह शांति टूट रही है, शायद हमेशा के लिए.

विडंबना यह है कि मारे गये सभी पीड़ितों और उनके परिवारों के सभी सदस्यों ने शरणार्थी प्रमाण पत्र, मतदाता सूची, स्कूल प्रमाण पत्र, पंचायत प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज बनवाए थे, जिनमें वे एनआरसी की अंतिम मसौदा सूची में शामिल करने के लिए योग्य थे.

नवंबर के तीसरे सप्ताह तक गाँव के प्रवेश द्वार के नजदीक पुलिया के पास पाँच मृतकों की याद में उनके मृत्यु स्थल पर एक स्मारक स्थल का निर्माण किया गया. वहां तुलसी के कुछ नए लगाए गये पौधे और बांस के नई पौध, कुछ बिखरे हुए मिट्टी के बर्तनों के बीच केले के तने और जले हुए बांस पड़े थे, जो हाल ही में आयोजित हिंदू श्राद्ध समारोह के अवशेष थे. पांच समाधियों में पीड़ितों के फोटो लगे हुए हैं, जो उस अंधेरी रात में मारे गये लोगों की याद दिलाते हैं.

गांव के एक साइकिल सवार ने कहा, “उनका यहां अंतिम संस्कार किया गया.” “सभी पाँच जनों का.”

सुरक्षा और आजीविका के वादे पर 1964 में भारत आने के बाद, खेरबाड़ी के बंगाली ग्रामीणों ने विशाल ब्रह्मपुत्र के असंतुलित तटों पर रहने के लिए अपार बाधाओं का सामना किया था, जो एक मौसम में भूमि उपजाऊ बना सकती है, तो अगले मौसम में सब कुछ तबाह.

इस पारिस्थितिक रूप से नाजुक और राजनीतिक रूप से विस्फोटक गाँव के परिवारों को अब एक बार फिर से संभावित विस्थापन की गंभीर संभावना का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि वे केवल बंगाली होने के कारण भर से भयभीत हैं. ये सभी हिंदू स्थानीय असमी हिंदूओं से ही घिरे हुए हैं, फिर भी इन लोगों में अचानक डर बैठ गया हैं.

मोहन राय विश्वास गमगीन होकर कहते हैं, “हमने हमेशा खुद को असम के निवासी माना था,” वह सुबकने लगते हैं और उनके मुंह से बस इतना ही निकलता है, “तो फिर क्यों, क्यों, क्यों?”

अनुवाद : मनदीप सिंह

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