Opinion

पिस्तौल निकालकर बोले थे अशफाक- किसी ने मंदिर की एक ईंट को भी नुकसान पहुंचाया, तो गोली मार दूंगा

Navin sharma

Jharkhand Rai

Ranchi : ”मैं भी कट्टर मुसलमान हूं, लेकिन इस मंदिर की एक-एक ईंट मुझे प्राणों से प्यारी है. मेरे लिए मंदिर और मस्जिद की प्रतिष्ठा बराबर है. अगर किसी ने भी इस मंदिर की ओर नजर उठायी, तो मेरी गोली का निशाना बनेगा.” ये शब्द अशफाकउल्लाह खान के हैं और वाकया देश की आजादी के पहले का है. उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक बार हिंदू और मुसलमान आपस में झगड़ गये और मारपीट शुरू हो गयी. उस समय अशफाक बिस्मिल के साथ आर्य समाज मंदिर में बैठे हुए थे. कुछ मुसलमान मंदिर पर आक्रमण करने की फिराक में थे. तभी अशफाक ने फौरन पिस्तौल निकाल ली थी.

22 अक्टूबर को उन्हीं अशफाकउल्लाह खान की जयंती है. ऐसे दौर में, जब अंग्रेजों की हिंदू-मुस्लिम को बांटने की नीति सफल हो रही थी, उसमें अशफाकउल्लाह उनके झांसे में नहीं आनेवाले लोगों में शामिल थे. इतना ही नहीं, उन्होंने आजादी की लड़ाई में अपने हिंदू साथियों से कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों को नानी याद दिला दी.

22 अक्टूबर 1900 को हुआ था जन्म

इनका जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में 22 अक्टूबर 1900 को हुआ था. उनके पिता मोहम्मद शफीकउल्लाह खां और मां मजहूरुन्निसा बेगम थीं. अशफाक ने स्वयं अपनी डायरी में लिखा है कि जहां एक ओर उनके बाप-दादों के खानदान में एक भी ग्रेजुएट होने तक की तालीम न पा सका, वहीं दूसरी ओर उनके ननिहाल में सभी लोग उच्च शिक्षित थे. उनमें से कई तो डिप्टी कलेक्टर और एसजेएम (सब जुडीशियल मजिस्ट्रेट) के ओहदों पर मुलाजिम भी रह चुके थे.

Samford

घुड़सवारी और बंदूक चलाने में आता था मजा

बचपन से इन्हें खेलने, तैरने, घुड़सवारी और बंदूक चलाने में बहुत मजा आता था. इनकी कद-काठी मजबूत और बहुत सुंदर थी. वह स्वतंत्रता आंदोलन में बहुत रुचि लेते थे. अपने चार भाइयों में अशफाकउल्लाह सबसे छोटे थे. उनके बड़े भाई रियासतउल्लाह खान पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के सहकर्मी थे. जब मणिपुर की घटना के बाद बिस्मिल को भगोड़ा घोषित किया गया, तब रियासत अपने छोटे भाई अशफाक को बिस्मिल की बहादुरी के किस्से सुनाते थे.

बिस्मिल से मुलाकात

1922 में जब असहयोग आंदोलन शुरू हुआ और जब बिस्मिल ने शाहजहांपुर में मीटिंग रखी थी, यही अशफाकउल्लाह की मुलाकात बिस्मिल से हुई थी. धीरे-धीरे संपर्क बढ़ा, तो उन्होंने बिस्मिल को यह भी बताया कि वह अपने उपनाम ‘वारसी’ और ‘हसरत’ से कविताएं भी लिखते हैं. बाद में उनके दल के भरोसेमंद साथी बन गये.  कई बार तो बिस्मिल और अशफाक मुशायरों में साथ-साथ शायरी भी करते थे.

राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक की दोस्ती

चौरी-चौरा कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था, तब हजारों की संख्या में युवा खुद को धोखे का शिकार समझ रहे थे. अशफाकउल्लाह खां उन्हीं में से एक थे. उन्हें लगा अब जल्द से जल्द भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति मिलनी चाहिए. इस उद्देश्य के साथ वह शाहजहांपुर के प्रतिष्ठित और समर्पित क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के साथ जुड़ गये. आर्य समाज के एक सक्रिय सदस्य और समर्पित हिंदू राम प्रसाद बिस्मिल अन्य धर्मों के लोगों को भी बराबर सम्मान देते थे.

दूसरी ओर एक कट्टर मुसलमान परिवार से संबंधित अशफाकउल्लाह खां भी ऐसे ही स्वभाववाले थे. धर्मों में भिन्नता होने के बावजूद दोनों का मकसद सिर्फ देश को स्वराज दिलवाना ही था. यही कारण है कि जल्द ही अशफाक, राम प्रसाद बिस्मिल के विश्वासपात्र बन गये. धीरे-धीरे इनकी दोस्ती भी गहरी होती गयी.

काकोरी कांड

जब क्रांतिकारियों को यह लगने लगा कि अंग्रेजों से अहिंसक आंदोलनों के बल पर देश से भगाना संभव नहीं है, उन्होंने विस्फोटकों और गोलीबारी का प्रयोग करने की योजना बनायी. इस समय जो क्रांतिकारी विचारधारा विकसित हुई, वह पुराने स्वतंत्रता सेनानियों और गांधी जी की विचारधारा से बिल्कुल उलट थी. लेकिन, इन सब सामग्रियों के लिए अधिकाधिक धन की आवश्यकता थी. इसीलिए राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार के धन को लूटने का निश्चय किया. उन्होंने सहारनपुर-लखनऊ 8 डाउन पैसेंजर ट्रेन में जानेवाले धन को लूटने की योजना बनायी. 9 अगस्त, 1925 को राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाकउल्लाह खां समेत आठ अन्य क्रांतिकारियों ने काकोरी में इस ट्रेन को लूटा.

बौखलायी ब्रिटिश सरकार ने जांच शुरू करायी. एक महीने तक सीआईडी ने सबूत जुटाये और बहुत सारे क्रांतिकारियों को एक ही रात में गिरफ्तार किया. 26 सितंबर 1925 को पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को भी गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन, अशफाक बनारस भाग निकले, जहां से वह बिहार चले गये. वहां वह एक इंजीनियरिंग कंपनी में 10 महीनों तक काम करते रहे. वह गदर क्रांति के लाला हरदयाल से मिलने विदेश भी जाना चाहते थे.

19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में अंग्रेजों ने दे दी थी फांसी

अपने क्रांतिकारी संघर्ष के लिए अशफाक उनकी मदद चाहते थे. इसके लिए वह दिल्ली गये, जहां से उनका विदेश जाने का प्लान था. लेकिन, उनके एक अफगान दोस्त ने धोखा दे दिया और अशफाक को गिरफ्तार कर लिया गया. ब्रिटिश शासन ने उनके ऊपर अभियोग चलाया और 19 दिसंबर सन 1927 को उन्हें फैजाबाद जेल में फांसी पर लटका दिया गया.

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