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सालों से रोरो क्षेत्र में पड़े हैं एस्बेटस के अवशेष, नहीं हटाने पर एस्बेस्टॉसिस के शिकार हो सकते हैं ग्रामीण  

Chhaya

  • साल 2018 में एनजीटी की ओर से राज्य सरकार को दिया गया था दिशा निर्देश,
    वन विभाग ने बनाया डीपीआर लेकिन नहीं हटायें गये अवशेष.
  • क्षेत्र के 16 गांव प्रभावित, पिछले दिनों 75 लोगों में एस्बेस्टॉसिस के लक्षण पायें गये.

Ranchi: खनिज बहुल इलाका होने के कई फायदे राज्य को मिले हैं. लेकिन पर्यावरण और ग्रामीण जन जीवन के लिये इससे कई समस्याएं भी उत्पन्न हुई हैं. पश्चिमी सिंहभूम के खूंटपानी प्रखंड में भी बरसों से लोग इस तरह की परेशानी से जुझ रहे हैं.

क्षेत्र में क्रोमियम और एस्बेस्टस की अधिक मात्रा में पायी जाती है. 1963 में हैदराबाद एस्बेस्टस सीमेंट लिमिटेड प्रोडक्ट्स की ओर से प्रखंड के रोरो नदी के किनारे एस्बेस्टस माइनिंग शुरू की गयी.

कपंनी की ओर से लगभग 20 साल इस क्षेत्र में माइनिंग की गयी. साल 1983 में लीज समाप्त हुआ और कंपनी ने माइनिंग बंद किया. लेकिन माइनिंग बंद करने के साथ इस कंपनी ने एस्बेस्टस के अवशेष को साफ नहीं किया. नतीजा ये है कि रोरो नदी के सटे लगभग 16 गांव इसके प्रभाव में है. कई लोगों में एस्बेस्टस से होने वाली एस्बेस्टॉसिस के लक्षण भी पायें गये.

नियमत माइनिंग के अवशेषों का निष्पादन लीज वाली कंपनियों की ओर से किया जाना चाहिये. लेकिन इस क्षेत्र में बरसों से ये अवशेष पड़े हैं. हैदराबाद एस्बेस्टस सीमेंट लिमिटेड प्रोडक्ट्स का बाद में नाम बदल कर हैदराबाद इंडस्ट्रीज लिमिटेड कर दिया गया. जिसका मालिकाना हक आदित्या बिड़ला ग्रुप के पास है.

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एनजीटी के आदेश के बाद वन विभाग ने बनाया था डीपीआर

इस क्षेत्र ने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का ध्यान एस्बेस्टस के अवेशष के कारण खींचा. साल 2003 से लेकर 2014 तक में इन संस्थाओं की ओर से कई बार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में अपील की गयी.

14 अगस्त 2018 को एनजीटी की ओर से राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि स्थानीय नदी और लोगों को ऐसे अवशेष से किसी तरह की परेशानी न हो इसके लिये उचित योजनाएं बनायी जाए. लोगों को ऐसे अवशेष से होने वाले हानिकारक बीमारियों की जानकारी दी जाए. प्रभावित क्षेत्र का घेराव समेत बड़े पैमाने में पेड़ लगाये जाने कई और आदेश दिये गये.

इसके साथ ही खान मंत्रालय भारत सरकार के वरीय अधिकारी के अंतर्गत एक कमेटी बनाने का निर्देश दिया गया. जिसमें राज्य खान विभाग, वन विभाग, चाईबासा के अधिकारी समेत अन्य अधिकारियों को शामिल किये जाने का आदेश मिला.

इस कमेटी को राज्य के मुख्य सचिव की ओर से सहयोग करने की बात कही गयी. इस कमेटी को क्षेत्र से अवशेष हटाने की योजना बनाने के लिये एक माह का समय दिया गया था. जिसके बाद वन विभाग की ओर से डीपीआर तैयार किया गया. लेकिन इसके बाद भी क्षेत्र में एस्बेस्टस के अवशेष पड़े हैं.

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रोरो गांव में 75 लोगों में पाये गये एस्बेस्टॉसिस के लक्षण

पिछले साल नवंबर माह में पूणे के डाॅक्टरों की टीम ने इस क्षेत्र के प्रभावित ग्रामीणों के स्वास्थ्य की जांच की. जिसमें पूणे के डाॅक्टर अभिजीत प्रमुख थे. राज्य में बिरसा एचआरटीसी की ओर से डाॅक्टरों को सहयोग किया गया.

बिरसा एचआरटीसी के उमेश नजीर ने बताया कि इस जांच में सिर्फ रोरो गांव के 75 लोगों में एस्बेस्टॉसिस के लक्षण पाये गये. जबकि लगभग दो सौ लोगों की जांच की गयी थी. ये सिर्फ रोरो गांव में हुए जांच के आंकड़े हैं. जबकि एस्बेसटस के अवशेष से 16 गांव और रोरो नदी प्रभावित हैं. क्योंकि क्रोमियम और एस्बेस्टस के कण बहते पानी से होते हुए लोगों तक पहुंचते हैं. जो बीमारी की प्रमुख वजह है.

गौरतलब है कि एस्बेस्टॉसिस सांस लेने से संबधित एक गंभीर बीमारी है. जो लोगों को तब होती है जब वो हानिकारक खनिजों के अवेशषों के संपर्क में आते हैं. यह हानिकारक खनिज पानी या हवा के जरिये लोगों तक पहुंचते हैं. एस्बेस्टॉसिस के बारे में बताया जा रहा है कि यह रोग कभी-कभी फेफेड़े के कैंसर का रूप भी ले लेता है. अधिक संपर्क में आने पर एस्बेसटस फेफेड़े को ब्लाॅक कर सकता है.

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60 देशों में लगाया गया बैन

19वीं सदी की शुरूआत में एस्बेस्टस के निर्माण कार्य को बेहतर माना गया था. लेकिन 1992 के बाद से लगातार कई देशों ने एस्बेस्टस के खनन पर रोक लगायी. यह बैन 60 देशों में लगया गया. यह बैन इसलिए लगाया गया क्योंकि इसकी वजह से स्वास्थ्य संबधी परेशानियां हो रही थी.

यूरोपिय देशों में इस पर खासकर बैन लगाया गया है. वहीं अगर भारत की बात करें तो यहां अब तक इस पर बैन नहीं लगाया गया है. कुछ संगठनों की ओर से मांग भले की जा रही है लेकिन राजनीतिक पार्टियों की ओर से इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि भारत में इसके उत्पादन में कमी जरूर आयी है.

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