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आचार संहिता खत्म होते ही सीएम इलेक्शन मोड में, विपक्ष अब तक फंसा है अंतर्कलह में

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Akshay/Nitesh

Ranchi: सात मई को जब देश में चुनाव हो रहे थे, उसी वक्त मुख्य सचिव ने अधिकारियों के साथ बैठक की और सीएम की घोषणाओं को तेजी से पूरा करने का निर्देश दिया. आचार संहिता खत्म होते ही सीएम खुद रेस हुए. राज्य के सभी उपायुक्तों और तमाम विभागों के सचिवों के साथ बैठक की. योजनाओं को तेजी से पूरा करने का निर्देश दिया. प्रेस विज्ञप्ति में बाकायदा कहा गया कि आनेवाले चार महीनों में विकास की आंधी आनेवाली है. विधानसभा चुनाव से चार महीने पहले पता नहीं विकास की आंधी आयेगी या नहीं, लेकिन यह तय हो गया कि सीएम रघुवर दास फुल इलेक्शन मोड में चले गये हैं. वहीं दूसरी तरफ देखा जाये तो लोकसभा चुनाव में चारों खाने चित हुआ विपक्ष अपने ही उधेड़बुन में लगा हुआ है. इतनी बुरी तरह हारने के बावजूद न तो किसी रणनीति पर काम हो रहा है, उलटे जेएमएम और कांग्रेस अपने ही अंतर्कलह में फंसे हुए हैं.

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सरकार की साफ-सुथरी छवि पेश करने की कोशिश

इलेक्शन मोड में जाते ही सरकार ने चौतरफा वार करना शुरू कर दिया है. एक तरफ योजनाओं को पूरा करने के लिए सीएम लगातार अधिकारियों को रेस कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ सरकार की साफ सुथरी छवि बनाने पर भी काम हो रहा है. सरकार की साफ-सुथरी छवि का आकलन सरकार के लिए काम कर रहे अधिकारियों से होता है. अभी जिन अधिकारियों की फौज खड़ी की जा रही है, उन सभी अधिकारियों की एक साफ सुथरी छवि है. मुख्य सचिव डीके तिवारी अपने काम करने के तरीके और एक साफ सुथरी छवि वाले अधिकारियों की फेहरिस्त में शामिल हैं. वहीं विकास आयुक्त के साथ-साथ गृह विभाग का कमान भी एकदम साफ-सुथरी सीनियर आइएएस अफसर सुखदेव सिंह को देने के पीछे भी यही मकसद है. राज्य का हर राजनीति करनेवाला और बुद्धिजीवि जानता है कि सुखदेव सिंह किस तरह के अधिकारी हैं. डीजीपी डीके पांडेय के कार्यकाल में उन पर कई तरह के आरोप लगे हैं. बकोरिया से लेकर तमाम जगहों पर उन्हें आरोपों का सामना करना पड़ा है. फिलहाल उन पर एक जीएम लैंड को गलत तरीके से बंदोबस्ती कराने का आरोप लग रहा है. ऐसे में केएन चौबे को राज्य का डीजीपी बना कर सरकार पुलिस की छवि भी साफ-सुथरी करनी चाह रही है. केएन चौबे को ब्यूरोक्रेसी में एक साफ और स्पष्ट छवि वाला अधिकारी माना जाता है.

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क्या कर रहा है जेएमएम

चुनाव में मुंह की खाने के बाद जिस तरीके से दूसरे ही दिन से किसी पार्टी को हार से उबरना चाहिए था, वैसे हालात जेएमएम के नहीं लग रहे हैं. उलटा जेएमएम पर आरोप लग रहा है कि हेमंत को उनके ही करीबी इस कदर घेरे हुए हैं कि हेमंत को पार्टी के दूसरे लोगों की बात ही नहीं सुनाई देती. दो तारीख से जेएमएम की समीक्षा बैठक शुरू होनेवाली है. जेएमएम के ही कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि बैठक में होना-जाना कुछ नहीं है, सिर्फ कहा जायेगा कि फैसला शिबू सोरेन लेंगे. लेकिन फैसला हेमंत और उनके करीबी ही लेंगे. ऐसी बातें सामने आने के बाद साफ तौर से कहा जा सकता है कि जेएमएम अपने अंतर्कलह से घिरा हुआ है.

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क्या कर रही है कांग्रेस

लोकसभा चुनाव में हार मिलने के बाद जो सीन कांग्रेस में देखने को मिल रहा है, उससे तो लग रहा है कि कांग्रेस बिल्कुल दो फाड़ में बंट चुकी है. एक गुट प्रदेश अध्यक्ष डॉ. आजय कुमार के पक्ष में दिख रहा है, तो दूसरा ग्रुप सुबोधकांत सहाय के पक्ष में खड़ा है. कांग्रेस के ही लोगों का कहना है कि अब लड़ाई प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए हो रही है. लोकसभा चुनाव हारने के बाद अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए झारखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने भी इस्तीफा दे दिया था. दूसरी तरफ अपने राजनैतिक पतन को देखते हुए सुबोधकांत सहाय के समर्थन चाह रहे हैं कि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की कमान उन्हें मिल जाये.

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