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क्या गठबंधनों की डोर कमजोर हो रही है?

Faisal Anurag

क्या गठबंधनों की डोर कमजोर हो रही है? लोकसभा चुनाव के पहले जिस तरह गठबंधन राजनीति ने अपना जोर दिखाया था उसमें पड़ती दरार का लब्बोलुआब तो यही है. चुनावी हार की भयावहता के साये से विपक्ष निकल नहीं पा रहा है और हार के बाद दलों के भीतर एक दूसरे दल को लेकर गहराते अविश्वास के कारण भविष्य में विपक्ष के बड़े गठबंधन की संभावना भी धूमिल है.

दूसरी और सत्तापक्ष के गठबंधन में भी हलचल है और मंत्रिमंडल में शामिल न किये गये गठबंधन दलों की बेचैनी भी दिखने लगी है. हालांकि एनडीए में बिखराव की कोई संभावना दूर तक नहीं है जबकि विपक्ष का गठबंधन बिखरता हुआ दिख रहा है. चुनाव के दौरान भी गठबंधन दलों के नेताओं ओर कार्यकर्ताओं का तालमेल लचर ही था.

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उन चार राज्यों में जहां इस साल के अंत तक चुनाव होने हैं, वहां भी विपक्षी दल के गठबंधन को लेकर आशंका का माहौल है. ये चार राज्य हैं झारखंड, हरियाण, महाराष्ट् और जम्मू-कश्मीर. इस बीच उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन बिखरता नजर आ रहा है.

बसपा सुप्रीमो मायावती ने विधानसभा के उपचुनावों में अकेले लड़ने का मन बना लिया है. मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा है समाजवादी पार्टी यदि सुधार नहीं करती है तो अकेले चुनाव लडना ठीक रहेगा.

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उन्होंने यह भी कहा है कि लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव अपनी पत्नी डिंपल यादव को भी चुनाव नहीं जीता पाये.  मायावती ये भी कहा है कि सपा का कोर वोट यादव भी उसके साथ नहीं रह गया और सपा वोट का ट्रांसफर नहीं करा सकी.

झारखंड में गठबंधन को लेकर विपक्षी दलों में आशंका का माहौल है. झारखंड मुक्ति मोरचा की समीक्षा बैठक  में अकेले दम पर विधानसभा चुनाव लड़ने की बात उठी. हालांकि हेमंत सोरेन ने कहा है कि झामुमो गठबंधन का नेतृत्व करते हुए सबसे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगा.

झारखंड में कांग्रेस की दिशाहीनता गहराती जा रही है. झारखंड के कांग्रेस अध्यक्ष ने इस्तीफा दे दिया है. हालांकि ये अभी तक स्वीकृत नहीं हुआ है. कांग्रेस नेतृत्व ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि झारखंड में कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष कौन हो सकता है. और आंतरिक व्यवस्था क्या है. कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता न केवल अध्यक्ष बदलने को ले कर बयान दे चुके हैं बल्कि उनमें कई ने विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ने की बात जोरशोर से कही है.

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इस गठबंधन का एक अन्य दल झारखंड विकस मोरचा के दोनों शीर्ष नेताओं की करारी हार के बाद से विधानसभा चुनाव के पहले पार्टी को फिर से  खड़ा होने की चुनौती है. महराष्ट्र में विपक्ष 2014 का वोट शेयर और सीट भी बचाने में कारगर नहीं है.  एनसीपी और कांग्रेस, विधानसभा चुनाव के पहले आपसी तरालमेल किस तरह बनाये रखेंगे, यह गंभीर सवाल है क्योंकि कांग्रेस में आपसी टकराव तेज है.

चुनावी पराजय के बाद बिखराव तो आम परिघटना होती है और उन दलों के लिए फिर से उठ खड़ा होने की जद्दोजहद भी चुनौती भरी होती है. लेकिन चुनाव में भारी कामयाबी के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए में भी कई घटक नाराज हैं. 2014 में भाजपा ने यूपी में जिस तरह अपना दल को तरजीह दिया था उसे नये मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गयी है.

इसी तरह राजस्थान में जाट नेता हनुमान बेनीवाल के दल से भाजपा ने समझौता किया था. लेकिन मंत्रिमंडल में उन्हें शामिल नहीं किया गयी. अनुप्रिया पटेल को बाहर रखा गया है. अनुप्रिया पटेल भाजपा के सामाजिक इंजिनियरिंग बनाने में बड़ी भूमिका निभाती रही है.

लेकिन बिहार कथा तो बेहद संजीदा राजनीतिक परिघटना है. नीतीश कुतार ने जदयू के लिए कैबिनेट में दो लोगों को शामिल करने के लिए भाजपा अध्यक्ष से बात की थी. भाजपा जदयू को केवल एक राज्य मंत्री का पद ही देने को तैयार थी. शिवसेना के 18 लोकसभा सदस्यों में दो को कैबिनेट में जगह दी गयी है. जबकि 16 सदस्यों वाले जदयू को मात्र एक. इससे नीतीश नाराज है. गठबंधन में सबकुछ ठीक होने की बात करते हुए उन्होने बिहार में जिस तत्परता से अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया है, वह सामान्य नहीं है.

इस बीच बिहार की राजनीति में परदे के पीछे कई तरह की गतिवधियों की चर्चा है. हालांकि नीतीश भाजपा का साथ छोडेंगे यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन भाजपा नेतृत्व उनके नेतृत्व को कितने दिनों तक स्वकार करता रहेगा इसे लेकर कई चर्चाएं हैं.

नीतीश कुमार ने यह कह कर की लोकसभा चुनराव में वोट केवल एक चेहरे पर नहीं पड़ा है, बहुत कुछ संकेत दिया है. तात्कालिक तौर पर भाजपा ने कदम उठाते हुए कहा है कि यह समय के साथ चलने का समय है. नीतीश कुमार की राजनीति को लेकर किसी भी तरह का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है.

नीतीश कुमार ने बिहार में एक ऐसा वोट आधार बना लिया है जो अकेले तो चुनाव नहीं जीत सकता है,  लेकिन बिहार में गठबंधन कर बड़ी जीत की गारंटी करता है. महिलाओं ओर अति पिछड़ों के साथ दलितों में भी नीतीश की पैंठ मजबूत है.

हार के बाद भी विपक्ष चुनाव नतीजों और वोट प्रवृति का आकलन गहराई से नहीं कर पा रहा है. वह उन परिघटनाओं को समझने से अनदेखा कर रहा है जो वोटरों के राजनीतिक सामूहिक मत का निर्माण करता है. खास कर युवा और महिला मतदाओं के रूझान ओर प्रवृति में कई नये बदलाव का संकेत 2014 के चुनाव से ही दिखा रहा था.

जो 2019 के चुनाव में और पुष्ट हुआ है. सामाजिक न्याय के घटक समूहों में भी बदलाव साफ है. विपक्ष को इस बदलाव के समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हिस्सेदारी की रोशनी में समझने की जरूरत है. 1990 के बाद की भारत की राजनीति बदली हुई है और जो नये सामाजिक उभार के संदर्भ हैं, उन्हें अनदेखा करना किसी भी राजनीतिक समूह के लिए घातक है.

सारी दुनिया में धुरदक्षिणपंथी उभार है और भारत के मतदाताओं पर भारत की इस प्रवृति का असर जिन कारणों से गहरा रहा है, उसकी पहचान किए बिना विपक्ष चुनौती का समना नहीं कर सकता है.

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